Himachal News: आज भी देवता वासुकि नाग को अर्पित होता है लाल धान
मनाली के हलान में पारंपरिक वेशभूषा में ग्रामीण और श्रद्धालु देव आस्था के साथ करते हैं धान की रोपाई
दिव्य हिमाचल ब्यूरो — मनाली
आधुनिकता और तेजी से बदलती जीवनशैली के दौर में जहां अनेक लोक परंपराएं धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही हैं। वहीं पर्यटन नगरी मनाली के समीप स्थित हलान सेरी आज भी अपनी सदियों पुरानी देव परंपराओं को उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ जीवित रखे हुए है। देवता वासुकि नाग की रूहणी में आयोजित पारंपरिक लाल धान की रोपाई ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि हिमाचल की पहचान केवल प्राकृतिक सौंदर्य नहीं, बल्कि उसकी जीवंत देव संस्कृति और सामुदायिक परंपराएं भी हैं। गत रविवार सुबह से ही हलान सेरी में ग्रामीण महिलाओं और पुरुषों का जुटना शुरू हो गया। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे श्रद्धालुओं ने देव आस्था के साथ धान की रोपाई की। मान्यता है कि जिन श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी होती है, वे कृतज्ञता स्वरूप इस दिन स्वयं धान की रोपाई करते हैं। बाद में तैयार होने वाली फसल देवता वासुकि नाग को अर्पित की जाती है।
स्थानीय ग्रामीण रणजीत और राजेश ने बताया कि यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है और आज भी दूर-दराज के गांवों से लोग इसमें भाग लेने पहुंचते हैं। उनका कहना है कि यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज को एक सूत्र में बांधने वाली सांस्कृतिक विरासत है, जिसे नई पीढ़ी भी आगे बढ़ा रही है। धान रोपाई में शामिल महिलाओं ने बताया कि इस दिन का वे पूरे वर्ष इंतजार करती हैं।
मन्नत पूरी होने पर श्रमदान
लोग धान रोपाई के दौरान श्रम दान भी करते हैं। यहां वे लोग भी आते हैं, जिनकी मनोकामना पूरी होती है। देवता का इतना आशीर्वाद रहता है कि लोग धान रोपाई करने के लिए कोसों दूर से भी पहुंचते हैं।
150 महिलाएं-पुरुष साथ रोपते हैं धान
कुल्लू। कुल्लू घाटी में पारंपरिक तरीके से उगाए जाने वाले लाल धान की खेती किसानों के लिए आय का बेहतर माध्यम भी है। हालांकि पिछले कुछ वर्षो से इसकी खपत पहले जैसी नहीं रही है, लेकिन जिस भी क्षेत्र से लाल चावल निकलते हैं। उनकी कीमत बाजारों में 450 से 500 रुपए तक रहती है। ऐसे में प्राकृतिक रूप से तैयार की जाने वाले लाल धान की रोपाई के दौरान यहां आज भी हलान में परंपरा निभाते हुए इसे रोपा जाता है। करीब 150 से अधिक महिलाएं व पुरुष मिलकर धान रोपाई करते है। किसान करीब 20 बीघा भूमि में धान की रोपाई करते हैं। इस धान की खासियत यह है कि इसकी खेती पूरी तरह प्राकृतिक जल स्रोतों के पानी पर निर्भर रहती है। रासायनिक हस्तक्षेप कम होने और प्राकृतिक वातावरण में तैयार होने के कारण इसकी गुणवत्ता बेहतर मानी जाती है।
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