एरियर फार्मूले पर हरियाणा राजी, पढ़ें पूरी खबर
दिव्य हिमाचल ब्यूरो — शिमला
भाखड़ा ब्यास प्रबंधन बोर्ड (बीबीएमबी) के बकाया भुगतान से जुड़े केस की सुनवाई गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान भारत के एटॉर्नी जनरल ने केंद्र सरकार और संबंधित राज्यों के साथ कई दौर की चर्चा के बाद तैयार प्रस्ताव अदालत के समक्ष पेश किया। अटॉर्नी जनरल ने अदालत को बताया कि प्रस्ताव के तहत बीबीएमबी की बकाया राशि का भुगतान बिजली के रूप में किए जाने का सुझाव दिया गया है। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव तैयार करते समय सभी संबंधित पहलुओं पर विचार किया गया है। मुख्य न्यायाधीश ने इस पर सभी पक्षों से अपनी सहमति देने को कहा। हिमाचल प्रदेश और हरियाणा ने प्रस्ताव पर सिद्धांतत: सहमति जता दी, जबकि पंजाब ने इसका विरोध किया। पंजाब की ओर से दलील दी गई कि प्रस्ताव में हिमाचल प्रदेश पर पूंजीगत लागत (कैपिटल कॉस्ट) तथा संचालन एवं रखरखाव (ओएंडएम) शुल्क की देनदारियों को शामिल नहीं किया गया है।
इसलिए इस पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पंजाब से कहा कि इस मामले में डिक्री पहले ही हिमाचल प्रदेश के पक्ष में हो चुकी है और उसे 15 वर्ष बीत चुके हैं। ऐसे में अदालत महान्यायवादी के प्रस्ताव को लागू कराने के संबंध में अपना निर्णय लेने पर विचार करेगी। हिमाचल प्रदेश की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि जब पंजाब और हरियाणा ने स्वयं कभी भारत सरकार को पूंजीगत लागत का भुगतान नहीं किया, तो हिमाचल प्रदेश से ऐसी राशि मांगने का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि संचालन एवं अन्य खर्चों को महान्यायवादी के प्रस्ताव में पहले ही शामिल किया जा चुका है। सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब को अपने रुख पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई 12 अगस्त, 2026 के लिए निर्धारित कर दी। गौरतलब है कि बीबीएमबी एरियर को किशाऊ प्रोजेक्ट से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री सुक्खू ने हरियाणा के सामने जो शर्त रखी थी, हरियाणा पर उसका खूब असर हुआ है।
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