पुस्तक समीक्षा : व्यंग्य की चाशनी में पगे ‘बिखरे हुए लम्हे’
साहित्य वैचारिक संप्रेषण का ऐसा प्रभावशाली माध्यम है, जो कलात्मक सांकेतिकता के साथ किसी भी भाव को व्यक्त करने में सक्षम होता है। कविता अपनी शाब्दिक तरलता एवं संवेदनात्मक भृकृटि से और भी तीव्रता से प्रहार करती है। जब परंपरागत शैली रूढ़ होने लगे तो कवि शिल्प में प्रयोग कर पाठकों को आकर्षित करने का प्रयत्न करते हैं। गत कुछ वर्षों में ऐसे दो-तीन उदाहरण हमारे सामने आए हैं। प्रो. सुरेश कुमार वात्स्यायन ने अपनी कविता को ‘मंत्र कविता’ कह कर अलगाने का प्रयत्न किया, जबकि वरिष्ठ कवि कुमार कृष्ण ने भी पाठकों को चमत्कृत किया। और अब अदित कंसल ने अपनी कविता को ‘सूत्र काव्य’ की संज्ञा से अभिहिति कर एक नया शब्द गढऩे की पहल की है। चार-चार पंक्तियों में कविता को पूर्ण करना या कहें चार पंक्तियों में एक विचार या कथन को लघुता के साथ समेट देना श्लाघनीय है। ‘बिखरे हुए लम्हे’ कविता संग्रह में तीन सौ से अधिक चारक पद्य संकलित हैं, जो कथ्य की स्पष्टता, भाव-प्रवणता तथा व्यंग्य की तीक्ष्णता के कारण पाठक को बांधे रखते हैं।
डा. कृष्ण कुमार खंडेलवाल के शब्दों में, ‘यह कृति जीवन के विविध आयामों-प्रेम, विरह, सामाजिक यथार्थ, मानवीय संवेदनाओं और आत्ममंथन को अत्यंत संक्षेप में प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करती है।’ प्रो. सुरेश ऋतुपर्ण ने ‘दो शब्द’ के अंतर्गत यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि वैदिक मंत्र एवं ऋचाएं भी इसी प्रकार सूत्र वाक्यों में लिखी गई हैं। ‘फूल से खिले आप जब से मिले’, इन सात शब्दों में एक कौंध कवि देता है। यह एक सूत्र है, एक एहसास है, एक उद्बोधन है। आप कोई भी पन्ना पलट लें, कोई न कोई अनुभूति शब्दों में झांकती मिलेगी। विशेषता यह कि कल्पना की उड़ान कम, यथार्थ की अकडऩ-जकडऩ अधिक मिलेगी। कंसल के सभी सूत्रों में रागात्मकता बराबर मिलती है। सांठ-गांठ नहीं शब्दों की, बल्कि भावों का स्वाभाविक उद्वेलन है। आप एक बार संग्रह को पढऩा शुरू करेंगे, तो समाप्त किए बिना नहीं रुकेंगे। इसमें मनोरंजन है, अर्थपूर्ण संदेश हैं, जीवन के अनुभव हैं और कुछ कर गुजरने की चाह है। निखिल पब्लिशर्ज एंड डिस्ट्रीब्यूटर्ज, आगरा से प्रकाशित इस काव्य संग्रह की कीमत 500 रुपए है। -डा. सुशील कुमार फुल्ल
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