हिमाचल का भौगोलिक पुनर्गठन
पूर्व में मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री रहे शांता कुमार ने पुन: धर्मशाला में हाई कोर्ट की बेंच की स्थापना का मुद्दा रखा है। पिछले चार दशकों से यह मुद्दा गाहे बगाहे सामने आता है, जबकि किसी भी सरकार ने इसे अंजाम तक नहीं पहुंचाया। इस दौरान अदालतों का प्रसार हुआ है। कांगड़ा जिला में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालयों का दर्जा पालमपुर, नूरपुर और देहरा में मिला है। न्याय की परिभाषा में यह तस्वीर उस वक्त पूरी होगी जब हाई कोर्ट की एक पीठ धर्मशाला में स्थापित होगी। इस विषय का संबंध प्रादेशिक राजधानी शिमला से शिफ्ट हो रहे कार्यालयों से है और न्याय के मजमूनों से भी है। इसी तरह की एक अपेक्षा प्रशासनिक जिलों के संबंध में भी है और इसका प्रमुख निशाना भी कांगड़ा ही है, जहां पालमपुर, देहरा व नूरपुर को जिला बनाने की मांग उठती रहती है। अभी हाल ही में नूरपुर और देहरा को पुलिस जिला बनाने से नए जिलों के कयास बढ़े हैं। जाहिर है हिमाचल में संगठनात्मक तौर पर अदालतों और जिलों का पुनगर्ठन करने की दिशा में आगे बढक़र कम से कम एक जिला बढ़ाया जा सकता है। हमारा मानना है कि हर जिला के छह विधानसभा क्षेत्र होने चाहिएं। इस तरह दो कबाइली जिलों को छोडक़र बाकी ग्यारह जिले छह-छह विधानसभा क्षेत्रों के साथ महत्त्वपूर्ण इकाई साबित होंगे। हिमाचल के कई विधानसभा क्षेत्र आपस में मीलों दूर साबित होते हैं। मसलन नयनादेव, दरंग या जसवां-परागपुर विधानसभा क्षेत्रों की भौगोलिक दूरी को मापना आसान नहीं है। यही भौगोलिक दूरी अदालतों के पुनर्गठन की जरूरत पैदा करती है।
मसलन हाई कोर्ट का दरवाजा शिमला में खुलता है, जबकि न्याय की जरूरतें चंबा, कांगड़ा, ऊना व मंडी के कुछ क्षेत्रों में पैदा होती हैं। अगर धर्मशाला के केंद्र में हाई कोर्ट की बेंच स्थापित होती है, तो न्यायिक राहत पाने की बेडिय़ां टूटेंगी। वैसे भी विधानसभा के शीतकालीन सत्र ने जिस तरह क्षेत्रीय प्रश्रों की मिट्टी धर्मशाला में खोजी है, उसी तरह न्याय की जमीन यहां से सशक्त होगी। हिमाचल की जरूरतें कल अगर पूरी की गईं, तो आज उससे भिन्न हैं। भौगोलिक दृष्टि से योजनाओं, परियोजनाओं तथा विभागीय गुणवत्ता दर्ज करने के लिए दफ्तरों का स्थानांतरण, कलस्टर प्लानिंग तथा शहरी एवं ग्रामीण विकास का नजरिया बदलना होगा। दो-तीन शहरों को मिलाकर परिवहन की योजनाएं बनें या इनके मध्य स्थल पर कॉमन सब्जी मंडी, कॉमन अदालत परिसर तथा कर्मचारी नगर बसाए जाएं, तो हिमाचल का सही पुनर्गठन होगा। विडंबना यह है कि प्रशासनिक फैसलों पर भी राजनीति हावी रहती है। इससे सरकारी ढांचे के नतीजे बेहतर नहीं आते। उदाहरण के लिए हिमाचल पथ परिवहन निगम के तीन दर्जन के करीब बस डिपो बना देने का फायदा हिमाचल के परिवहन को नहीं मिला। अब अगर इलेक्ट्रिक बसों की आपूर्ति डीजल बसों के विकल्प के रूप में हो रही है, तो पांच नए बस डिपो जोड़े जा रहे हैं। जोगिंद्र नगर, बैजनाथ, पालमपुर, नगरोटा और धर्मशाला में बस डिपो की संख्या और दूरी का आकलन किया होता तो कांगड़ा में इलेक्ट्रिक बस डिपो की घोषणा नहीं होती। प्रदेश में ढांचागत परिवर्तन के लिए प्रशासन की साझी विरासत चाहिए। हर जगह एक जैसी भूमिका में राजनीतिक विस्तार तो संभव है, लेकिन राजनीतिक जरूरतों में प्रशासनिक विस्तार से परिणाम की बेहतरी नहीं होती। बेशक हिमाचल के सीमांत क्षेत्रों की मांग अलग है, मध्यम क्षेत्र की जरूरतें अलग हैं और ऊंचे क्षेत्रों की खूबियां अलग हैं। हिमाचल अंग्रेजी हुकूमत में अलग था, रियासतों में अलग था और आजादी के बाद अलग नजर आया, लेकिन अब बेहतर शासन-प्रशासन की दृष्टि से होना चाहिए।
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