धौलाधार के आंगन में बसंत उगाते हैं हंसराज भारती

By: Aug 23rd, 2026 12:02 am

कवि हंसराज भारती अपने प्रश्नों से मुखातिब, परिवेश से हासिल और अनुभवों के खातिर कविताओं के हुजूम के साथ चलते हुए साठ रचनाओं का एक नया संसार ‘इस तपती धूम में’ कई किनारों पर उगी धूप-उगी भूख को छू रहे हैं। कविताओं में जैसे कोई बसंत उग आया हो, नारंगी सायों में जैसे धूप की छाया हो। कविता की व्याख्या में हंसराज भारती आकाश, हवा, पौधों, मिट्टी, पानी की बूंदों, नदी के बहाव-झील के ठहराव, परंपराओं के आगोश, इनसानी फितरत के दोष को महसूस करते हैं, ‘रिमझिम बूंदों के साथ/एक दर्द सा रिसने लगता है/एक कविता भीगने लगती है/जो कुछ सूखा था/नम-नम सा हो जाता है।’ ये पहाड़ की कविताएं हैं, जो बसंत में फूलों की महक, पंछियों की चहक और ऋतुओं के अक्स थामे आगे बढ़ जाती हैं।

धौलाधार के कई आंगन, विरासत के कई महल, भविष्य के कई फलक और पेड़ों के झुरमुट के नीचे हौले-हौले मुस्कान को अंगीकार करती बेचैनियां, लंबी सी नदी के पर्वतीय हिस्से, सृजन की ताकत, परिवेश से संतुलन बनाने की दिनचर्या और महफूज पर्यावरण को निहारते सबब, ‘उन नदियों की कहानी/होना चाहूंगा जो एक/पतली सी धारा के रूप में/निकलती हैं पहाड़ के सीने से और फिर धीरे-धीरे/काटते-चीरते हुए सारे तटबंध/अपना रास्ता और पहचान बनाती हैं।’ सर्दियों में सूखती नदी की आहट सरीखी हैं उनकी कलम, जो पेड़ों पर प्रहार करती कुल्हाडिय़ों, आरियों और दराटों की धार से घायल होकर भी अपनी नोंक पर जमाने से रूबरू है, ‘जहां भी गाड़ोगे/वहीं पर जमा लूंगा जड़ें/फिर से कोंपलें सजाऊंगा/फिर से हरा-भरा हो जाऊंगा, फैलूंगा-फूलूंगा/बसंत का साथ निभाऊंगा।’ कवि के मन में शिकायतों के ज्वारभाटे, ‘जिधर देखो, उधर/बेपनाह भीड़ है, शोर है/आदमी में से आदमी गुम है/दाएं हाथ को बाएं का पता नहीं/सुबह में शाम का मुगालता है’, लेकिन आशावाद का साहस, संपन्नता, पवित्रता और मूल्यांकन भी है, ‘उतर जाएगी तब/धूप की सारी अकड़/सूखे की सूखी, सूनी चादर/मन आंगन में जमीं धूल/बारिश जब बरसेगी/तो लौटेगी/पिता की आंखों की/खोई चमक।’ समय के चक्र में और संवेदना के मरहम में कवि आत्मचिंतन की पहरेदारी में कई चट्टानों-कई दीवारों को लांघ कर पूछते हैं, ‘बहुत कुछ ढहता है/आदमी में से आदमी की/गैर हाजिरी पर/बहुत कुछ बिखर बिखर जाता है, जोर, जुल्म की बह रही आंधी से/कितना कुछ रिसता है।’ संग्रह की हर कविता अपने मौलिक आचरण में शाश्वत उच्चारण कर रही है।

कविता का सादापन, पहाड़ीपन, कहीं-कहीं बांकापन बनकर मर्मस्पर्शी बन जाता है, तो पन्ने दर पन्ने पर कुछ कविताएं बार-बार आमंत्रित करती हैं, हिस्से की छांव, बसंत अब…, दीप जलें, बदल गया है सब, शोहरत की बुलंदी, शब्द अंत तक लड़ेंगे, मेरी जड़ें, कई बार, मेमने, मुमकिन नहीं, हमें भी बताना, मेरे अंदर, मैं कविता लिखता हूं, तुम्हें याद करना और हमारी नदी जैसी अनेक कविताएं पाठक के मन की जागीर बनती हैं और तब हर कविता एक घरौंदा-एक पूरा परिवेश लगती है। भारती की कविताओं का व्याकरण अपने शब्दों की व्याख्या, परिवेश की समीक्षा, अनंत जिज्ञासा, अनुभव की पराकाष्ठा, हकीकत की मिट्टी और सपनों की अभिलाषा से जुड़ा है। वह पहाड़ के चरित्र में पर्यावरण देखते हैं, तो प्रदूषण को खदेड़ते हैं। वह समाज के तराने सुनते हैं, तो किसी फौजी बूट के पदचिन्हों में देश के प्रति तड़प का इजहार करते हैं।

वह खोखले दंभों के नीचे कुचलती मर्यादाओं की आह सुनते हैं, तो षड्यंत्रों की खामोश भाषा में विच्छेदन का विष खोज लाते हैं, ‘इस तपती धूप में/देर व दूर तक चलते हुए मैं/लंबी अंधी सुरंगों तक/बनाऊंगा सूरज के पहुंचने का रास्ता/साथ चलूंगा उनके जो/अंधेरों से मुक्ति के युद्ध/लड़ रहे हैं।’ हंसराज भारती की कलम अपने परिवेश की एक सौगंध में लाखों परिदृश्यों का साथ देती है। वह घाटियों सी विशालता और शिखर से ऊंचाई में भी कच्चे घड़े की मजबूती में माटी का रंग उकेरते हैं और पिंजरे तोड़ कर पगडंडियों पर पांव सहलाते हैं, ‘वो गुल्ली डंडे की पारियां/वो कंचों की जीती-हारी बाजियां/वो डुग्घे नालू, खड़ी कुआलियां।’ इस संग्रह की विशेषता यह कि कवि अपनी ही कविता के बाहुपाश में अपनी कविता से संवाद करता है, ‘कविता की जरूरत आज भी/बची है/उन सबके लिए/ जिनके क्रांति बीज/उनके झोलों में ही/पड़े रह गए।’

-निर्मल असो

कविता संग्रह : इस तपती धूप में
कवि : हंसराज भारती
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, जयपुर
मूल्य : 199 रुपए


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