विशिष्ट काव्य संवेदना का निर्माण करती है हिमाचली कविता
समकालीन कविता का हिमाचली परिदृश्य
कविताओं की महफिल में लेखन का न•ाराना और भाव व्यंजना का समावेश करते कवियों ने हिमाचली प्रसंगों की चित्रावलियां बनाई हैं। कविता जैसे पहाड़ की बर्फ को पिघला कर नदी के रूप में, पाठकों की यादों से गुजरी है। कविता का पहाड़ी कैनवास कई रंगों को सम्मिलित करता हुआ, परिपक्वता की कलम में आज बहुत कुछ कह रहा है, तो हमने इस शृंखला को नाम दिया ‘समकालीन कविता का हिमाचली परिदृश्य’। काव्य रचनाओं के सागर को प्रतिबिंब की गागर में भरने का जहां प्रयास होगा, वहीं मूर्धन्य कवि एवं समीक्षक सतीश धर इस पूरी शृंखला का तराजू थामे बता रहे हैं कि हर कविता का वजन कितना है। काव्य रचनाओं की समीक्षा का फलक ऊंचा करेंगे कई साहित्यकार। प्रस्तुत है इस शृंखला की किस्त-2
सतीश धर
मो.-9582347455
समकालीन हिंदी कविता का परिदृश्य बहुआयामी, गतिशील और बहुसांस्कृतिक अनुभवों से निर्मित है। इस व्यापक परिदृश्य में हिमाचल प्रदेश की कविता एक विशिष्ट स्थान रखती है। हिमाचल की भौगोलिक संरचना- पर्वत, घाटियां, नदियां और दूरस्थ गांव- सिर्फ प्राकृतिक सौंदर्य का ही स्रोत नहीं हैं, बल्कि यह संवेदना, संघर्ष और सांस्कृतिक पहचान का भी आधार हैं। समकालीन हिमाचली कविता इन्हीं अनुभवों को आधुनिक जीवन-बोध के साथ जोड़ते हुए एक विशिष्ट काव्य-संवेदना का निर्माण करती है। प्रारंभ में हिमाचल रियासतों में बंटा था और छोटी-बड़ी 30 रियासतों के विलय से 15 अप्रैल 1948 को हिमाचल प्रदेश अस्तित्व में आया। वर्ष 1966 में पंजाब का कांगड़ा, कुल्लू और लाहौल-स्पीति, और शिमला, ऊना व नालागढ़ क्षेत्र का हिमाचल में विलय किया गया जिसके परिणामस्वरूप हिमाचल के भौगोलिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक स्वरूप में विस्तार हुआ। हिमाचल प्रदेश में भाषा एवं संस्कृति विभाग और अकादमी की स्थापना के बाद हिमाचल की हिंदी कविता के व्यवस्थित डॉक्यूमेंटेशन की ओर सरकारी स्तर पर ध्यान दिया गया और कवि अनिल राकेशी के संपादन में प्रदेश के विभिन्न जिलों से 13 कवियों की रचनाओं के संयुक्त संकलन ‘श्यामला’ का प्रकाशन हुआ। भाषा एवं संस्कृति मंत्री लालचंद प्रार्थी थे, जो स्वयं ‘चांद कुल्लूवी’ उपनाम से $ग•ालें और न•ामें लिखते थे। ‘श्यामला’ में अमिताभ (पदम गुप्ता), कैलाश भारद्वाज, चतुर सिंह, जिया सिद्दीकी, नंदेश कुमार, परमानंद शर्मा, पीयूष गुलेरी, रामकृष्ण कौशल, रामदयाल नीरज, श्रीनिवास श्रीकांत, सत्येंद्र शर्मा, सुंदर लोहिया और अनिल राकेशी शामिल हैं।
‘श्यामला’ की भूमिका में संपादक अनिल राकेशी लिखते हैं : ‘हिमाचल की आधुनिक कविता का यह पहला प्रतिनिधि संकलन है। पिछले तीस-चालीस वर्षों में तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों में हिमाचली हिंदी कविता जैसी कोई चीज रही और पनपी है, तो उसका श्रेय निश्चय ही उन रचनाकारों को जाता है जिनके कृतित्व की बानगी यहां प्रस्तुत है। इसी आधार पर हमने इस संकलन को प्रतिनिधि कहने की धृष्टता की है। हिमाचल की आधुनिक हिंदी कविता की हमारी जानकारी पिछले तीस वर्षों तक ही सीमित है। उससे पहले इस प्रदेश में खड़ी बोली में क्या और कितना लिखा गया, यह शोध का विषय है। एक कवि के विषय में हम जानते हैं : राष्ट्रीय धारा के कवि गोपाल शर्मा। वे अभी जीवित हैं, उनसे उनके समकालीन कवियों के विषय में शायद कोई जानकारी मिल सकती है। इस पहाड़ी प्रदेश में ब्रज भाषा में काव्य रचना होती रही है। अठारहवीं-उन्नीसवीं शताब्दी में रचित कुछेक काव्य-ग्रंथ उपलब्ध भी हैं। हिंदी साहित्य के इतिहासकारों और विश्वविद्यालयीय शोधकर्ताओं की कृपादृष्टि कभी इधर हो तो शायद कुछ और रचनाओं का भी उद्धार हो सके। हिमाचल में आजादी के बाद भी, या कहा जाए कि हिमाचल के निर्माण के बाद, जो काव्य रचना हुई, उसकी मात्रा (और शायद स्तर) की दृष्टि से कुछ भी खास नहीं मान लिया गया है। स्वयं इस प्रदेश के काव्य ग्राहक हिमाचल की हिंदी कविता के नाम पर कंधे उचका देते हैं या एक तरस भरी हंसी हंस कर आगे निकल जाते हैं। जैसे इस बात का अपने आप में कोई महत्व न हो कि जो कुछ जितना कुछ यहां लिखा गया है जिन्हें किसी भी लिहाज से उत्साहवर्धक नहीं कहा जा सकता। ताड़ के पत्तों पर महज स्वांत सुखाय लिखने वालों को बीसवीं सदी के उत्तराद्र्ध में तलाशने वालों से कोई कहे भी तो क्या? साहित्यिक वातावरण के नाम पर यहां कभी-कभार काव्य गोष्ठियां हो जाती हैं या सरकारी सम्मेलन। प्रकाशन सुविधाओं के खाते में एक अर्ध-साहित्यिक सरकारी मासिक ‘हिमप्रस्थ’ है। पिछले इक्कीस वर्षों में यही पत्र हिमाचली काव्य प्रतिभाओं को प्रकाश में लाने की जिम्मेवारी नियमित रूप से निभा रहा है। इस संकलन में जिन तेरह कवियों की कविताएं संकलित हैं, उनमें से कई पहली बार हिमप्रस्थ में ही छपे थे।
इस पत्र के अतिरिक्त कुछ दूसरी पत्रिकाएं भी हैं, किन्तु वे कविता-हिंदी कविता से परहेज करती हैं या फिर कवि उनसे परहेज करते हैं। प्रकाशन संस्थाएं अव्वल तो हैं नहीं, जो एकाध हैं भी वे कविता को हाथ क्यों लगाने लगी? इसके बावजूद दो-चार कविता संग्रह आए हैं। उन्हें पहाड़ी इनसान के जीवट का सबूत मानना चाहिए। यह बात और है कि उन कवि-प्रकाशकों ने अब ऐसा दुस्साहस न दोहराने की कसम खा ली है। सामूहिक संकलन के नाम पर पहली बार अकादमी का यह प्रकाशन आपके हाथ में ही है। ऐसी स्थिति में ‘हिमाचल की हिंदी कविता है कहां?’ इस मासूम सवाल का जवाब हम दें भी तो क्या? बस यही कर सकते हैं कि ‘श्यामला’ आपके हाथ में थमा कर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करें।’ यह उद्धरण छठे दशक तक हिमाचल की हिंदी कविता की एक झलक प्रस्तुत करता है। संपादक श्यामला के इस वक्तव्य में हिमाचल में प्रकाशन की अल्प सुविधाएं और कविताओं के स्तर की चर्चा भी की गई है। वर्ष 1976 के बाद लगभग चार वर्षों तक हिमाचल का साहित्य अपनी दिशा तलाशता रहा। हर तरफ साहित्य में कुछ कर गुजरने की छटपटाहट थी। शिमला में साहित्यिक संस्था ‘अर्पणा’ का गठन किया गया। इस संस्था का दावा था आजादी के बाद पहली बार शिमला में अखिल भारतीय लेखक सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। इस सम्मेलन में हिमाचल सहित देश के विभिन्न भागों से साहित्यकारों ने भाग लिया। महानगर के युवा और दिग्गज साहित्यकारों ने सम्मेलन में भाग लिया था। इस सम्मेलन के बाद हिमाचल की साहित्यिक गतिविधियों में इजाफा होने लगा।
उधर हिमाचल की सांस्कृतिक नगरी मंडी में साहित्यिक हलचल के नाम पर प्रदेश के कवियों ने दूसरे काव्य संकलन की तैयारी की। ‘समय के तेवर’ शीर्षक से इस संयुक्त कविता संकलन का संपादन प्रख्यात कहानीकार/कवि सुदर्शन वशिष्ठ ने किया है, जो उन दिनों मंडी में वरिष्ठ भाषा अधिकारी थे। यह संग्रह गौतम प्रकाशन मंडी द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस संग्रह के प्रारंभ में संपादकीय टिप्पणी में सुदर्शन वशिष्ठ लिखते हैं : ‘संकलन में चार तरह के कवि हैं : पहले वे जो काफी समय से लिख रहे हैं, जिनका कविता के क्षेत्र में प्रभावशाली दखल है। उनका स्थान है भी, फिर भी वह नहीं जो होना अपेक्षित था। दूसरे कवि ऐसे, जिनका अभी स्वतंत्र संकलन नहीं निकला, जो उनकी धीमी ख्याति का कारण बना, जिस कारण उनका चर्चा ‘वगैरा-वगैरा’ में होता रहा। तीसरे, जिन्होंने थोड़ा लिखा, अच्छा लिखा, बाद में लगभग छोड़ दिया। संभवत: वे इस संकलन से प्रेरणा लें अन्यथा यहां संकलित उनका योगदान अंतिम सिद्ध होगा। चौथे, नए जिनकी शुरुआत है अभी।’ संकलन के कवियों का ये वर्गीकरण कितना तार्किक और औचित्यपूर्ण है, यह चर्चा का विषय है, लेकिन संकलन के संपादक ने स्वयं स्वीकार किया है कि यह संकलन (समय के तेवर) ‘श्यामला’ जैसे संयुक्त संकलन की परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास था। इसी टिप्पणी में संपादक लिखते हैं : ‘श्यामला’ के बाद हिमाचली कविता का यह दूसरा महत्वपूर्ण संकलन है या तीसरा, यह स्पष्टत: नहीं कहा जा सकता। आज से दो वर्ष पूर्व (1982) में मैंने ‘विपाशा’ नाम से एक काव्य संकलन का संपादन किया था जिसमें हिमाचल के 30 नए कवि संग्रहित हैं। इसमें इनकी एक-एक कविता भी दी गई है। इस वर्ष (1984) यह भी किसी न किसी प्रकाशन से आ रहा है। ये दोनों संकलन ‘श्यामला’ के बाद दूसरे या तीसरे नंबर पर रहेंगे।
‘श्यामला’ का प्रकाशन हिमाचल कला, भाषा, संस्कृति अकादमी शिमला द्वारा श्री अनिल राकेशी के संपादन में 1976 में हुआ। इसमें प्रदेश के तेरह कवि संग्रहित थे। प्रस्तुत संकलन में ‘श्यामला’ के तेरह कवियों में से किसी की कविता नहीं है। ‘विपाशा’ के तीस कवियों में से इसमें आठ कवि हैं। मेरी जानकारी के अनुसार विपाशा का प्रकाशन नहीं हो पाया था। संपादक ने उन कवियों के नाम भी संग्रह में दिए हैं जो उन दिनों अपने स्वतंत्र कविता संकलन के कारण चर्चा में थे। 11 ऐसे कवियों के नामों का उल्लेख संपादक ने किया है। समय के तेवर में 21 कवि सम्मिलित हैं। समय के तेवर के बाद हिमाचल में संयुक्त कविता संकलनों का सिलसिला जारी रहा। बहुत से कवि मित्रों ने इस दिशा में सार्थक प्रयास किए। आठवें दशक में हिमाचल में प्रगतिशील कविता को पुन: स्थापित करने में मंडी के कवि/उपन्यासकार नागेश भारद्वाज (स्व.) का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा है।
नागेश भारद्वाज के संपादन में हिमाचल बुक सेंटर, स्किपटन विला, शिमला द्वारा ‘समवेत स्वर’ शीर्षक से वर्ष 1987 में प्रदेश की प्रगतिशील कविता का पहला कविता संग्रह प्रकाशित किया गया। इस संग्रह में संपादक नागेश भारद्वाज सहित 10 कवि शामिल थे। वर्ष 1985 में कवि अरविंद रंचन के संपादन में ‘खुल रहे पहाड़’ शीर्षक से संयुक्त कविता संकलन प्रकाशित हुआ, जिसमें नौ कवि सम्मिलित थे। वर्ष 1985 में ही कवि केशव के संपादन में ‘कविता खंड’ शीर्षक से एक संयुक्त संकलन प्रकाशित हुआ जिसमें संपादक सहित हिमाचल के पांच कवि शामिल थे। वर्ष 1986 में कवि/आलोचक श्रीनिवास श्रीकांत के संपादन में ‘एक भूखंड’ शीर्षक से संयुक्त कविता संकलन प्रकाशित हुआ, जिसमें 11 कवि शामिल किए गए थे। इस तरह आठवें दशक के अंत तक इन संकलनों में उपस्थित कवियों ने काव्य-साधना जारी रख अपनी विशेष पहचान प्रदेश के कविता जगत में दर्ज की। वर्ष 2014 में डलहौजी के कवि-मित्र अशोक दर्द ने भी दो सयुंक्त कविता संकलनों का संपादन किया है। ‘मेरे पहाड़ में’ और ‘महकते पहाड़’ शीर्षक से प्रकाशित इन संयुक्त संकलनों में 24 कवि सम्मिलित हैं। कवि रोशन जसवाल विक्षिप्त के संपादन में वर्ष 2023 में हिमाचल के हिंदी कवियों का एक सयुंक्त संकलन ‘लाडो’ प्रकाशित हुआ। इसमें प्रदेश के विभिन्न भागों से 31 कवियों की कविताएं शामिल हैं। लाडो, बिटिया को प्यार से दिया गया संबोधन है। इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है कि सभी सम्मिलित कवियों ने एक ही विषय बेटी पर ही कविताएं प्रस्तुत की हैं। स्वयं संपादक (कवि रोशन जसवाल विक्षिप्त) की कविता भी इस संकलन में शामिल है। इस संयुक्त संकलन में प्रदेश के 31 कवियों की कविताएं सम्मिलित हैं, जिनमें से बहुत सारे कवि आज भी निरंतर कविताएं लिख रहे हैं। इन कवियों ने अपने एकल कविता संकलन प्रस्तुत कर हिमाचल की हिंदी कविता को समृद्ध किया है। इन संयुक्त कविता संकलनों के माध्यम से हिमाचल की हिंदी कविता को कवि रौशन जसवाल ने सार्थक मंच प्रदान किया।
संयुक्त संकलनों की श्रृंखला में कवि रौशन जसवाल के संपादन में अम्मा कहती हैं (जनवरी 2017), पगडंडियां (फरवरी 2017), मां जो कहती थी (अक्टूबर 2022), प्रेम पथ के पथिक (जून 2023) प्रकाशित हुए। जनवरी, 2017 में प्रकाशित संयुक्त संकलन ‘अम्मा कहती हैं’ में 43 कवि सम्मिलित किए गए थे। इस संग्रह में हिमाचल के कवि अपेक्षाकृत कम रहे हैं। फरवरी 2017 में प्रकाशित पगडंडियां संयुक्त संकलन में भारती कुठियाला सहित 16 कवि सम्मिलित थे। कवि जसवाल के संपादन में अक्टूबर 2022 में ‘मां जो कहती थी’ शीर्षक से संयुक्त कविता संकलन प्रकाशित हुआ था। इसमें 15 महिला कवियों सहित 43 कवि शामिल किए गए हैं। संकलन में सम्मिलित सभी कवियों ने मां पर अपने उद्गार कविता के माध्यम से व्यक्त किए हैं। जून 2023 में ‘प्रेम पथ के पथिक’ कविता संकलन का संपादन कवि रौशन जसवाल ने किया। इसमें 41 कवि शामिल किए गए थे। इस प्रकार कवि जसवाल ने 175 कवियों को प्रकाश में लाया। आठवें दशक के बाद हिमाचल की हिंदी कविता खूब फली फूली। प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग के प्रयासों से देश के चर्चित कवि हिमाचल आने लगे और हिमाचल के कवि सरकारी आयोजनों में प्रदेश से बाहर जाने लगे। इस प्रकार परस्पर संवाद से प्रदेश की समकालीन कविता परिपक्व होने लगी। समकालीन कविता के कुछ अधिक चर्चित कवियों ने हिमाचल के विभिन्न स्थलों पर रचनाएं लिखीं। इस प्रकार परस्पर संवाद हिमाचल की हिंदी कविता को समृद्ध करता गया। आठवें दशक से पूर्व हिमाचल के हिंदी साहित्य को प्रकाशित करने का कार्य जालंधर (पंजाब) से प्रकाशित होने वाले समाचारपत्र किया करते थे। प्रदेश में आज के बहुत से प्रतिष्ठित रचनाकारों का प्रारंभिक लेखन इन्हीं समाचारपत्रों से प्रारंभ हुआ है। इन समाचारपत्रों के प्रत्येक सप्ताह साहित्य विशेषांक प्रकाशित होते थे। प्रकाशन हेतु सामग्री डाक द्वारा ही भेजते थे। सरकारी मासिक पत्रिका हिमप्रस्थ के अतिरिक्त प्रदेश में प्रकाशन की सुविधाएं बहुत कम थीं। वर्ष 1980 में साप्ताहिक गिरिराज और वर्ष 1985 में विपाशा के अस्तित्व में आने के बाद प्रदेश की कविता को प्रकाशन के संदर्भ में थोड़ी राहत मिली। भाषा एवं संस्कृति विभाग की द्विमासिक पत्रिका विपाशा के तत्कालीन संपादक तुलसी रमण प्रवेशांक में पत्रिका के उद्देश्य पर टिप्पणी करते हुए ‘बड़ी बिरादरी में अपनी पहचान’ शीर्षक से संपादकीय में लिखते हैं : ‘इस पत्रिका का उद्देश्य केवल क्षेत्रीयता के कूप खोदने के खिलाफ समकालीन साहित्य की सृजनात्मक विधाओं की पूरी व्यापकता के साथ प्रदेश के लेखकों व पाठकों को जोड़ कर इधर के सृजन को एक बड़ी बिरादरी में शामिल करना है।’ इस उद्देश्य में पत्रिका कितनी सफल हुई, यह चर्चा का विषय है। पत्रिका के पहले अंक में हिमाचल के दो कवियों की कविताओं को स्थान मिला। पत्रिका के स्तंभ ‘देशांतर’ में डा. वरयाम सिंह द्वारा निकोलाई रोरिक की तीन कविताओं के अनुवाद को भी प्रथम अंक में स्थान मिला। इस प्रकार हिमाचल के कवियों को विपाशा के माध्यम से एक और विकल्प मिला। कुल्लू से प्रकाशित एक अन्य पत्रिका ‘हिमतरु’ के कविता अंक ने भी हिमाचल की हिंदी कविता की विस्तृत विवेचना की है। विशेषांक में शामिल कवियों पर चर्चा करते हुए एक अंतरंग बातचीत में अतिथि संपादक गणेश गनी बताते हैं, ‘कुछ नए और पुराने शामिल कवियों ने अब लिखना छोड़ दिया है। पिछले एक दशक में हिमाचल की हिंदी कविता जिस तरह से नए प्रतिमान हासिल कर रही है वह उत्साहवर्धक है। अपना लोक स्थापित करने में हिमाचल की कविता हर दृष्टि से सफल रही है।’
इधर एक तरफ हिमाचल की हिंदी कविता अपनी पहचान के लिए संघर्ष कर रही थी, उधर दूसरी ओर हिमाचल विश्वविद्यालय की स्थापना के बाद इस विभाग के हिंदी विद्वानों ने हिमाचल की हिंदी कविता को और अधिक सम्पन्न और समृद्ध बनाने के लिए अपना सार्थक योगदान देना प्रारंभ कर दिया था। डा. बच्चन सिंह, डा. लल्लन राय, डा. विजय मोहन सिंह प्रदेश के ऐसे युवा कवियों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय कविता जगत से परिचय करवा रहे थे जो कवि बनने की प्रक्रिया में आगे बढ़ रहे थे। प्रदेश के प्रगतिशील और जनवादी आंदोलन को राज्य में पुन: जीवित करने में इन विद्वानों का योगदान अविस्मरणीय है। डा. विजय मोहन सिंह की देखरेख में तो अनियतकालीन पत्रिका ‘युवा पर्व’ का भी प्रकाशन हुआ, जिसमें स्थानीय कवि, राष्ट्रीय कवि और अंतरराष्ट्रीय कवि एक साथ प्रकाशित होते थे। इस पत्रिका के कविता अंक निश्चित ही हिमाचल की हिंदी कविता के उस दौर से पाठकों को परिचित कराते हैं। प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र में साहित्यिक अभिरुचि के उच्च अधिकारियों के कारण प्रदेश के भाषा एवं संस्कृति विभाग की साहित्यिक गतिविधियों में लगातार इजाफा होता गया। प्रदेश की समकालीन कविता हिमाचल की सरहदों से बाहर निकलने लगी। यह अवधि 1980-90 की है। प्रदेश में पहली बार पुस्तक मेला आयोजित किया गया जिससे दिल्ली के प्रकाशकों की आमद हिमाचल की ओर हुई। बहुत से कवियों के नए कविता-संग्रह प्रकाशित हुए। इस तरह हिमाचल की हिंदी कविता की ओर राष्ट्रीय धारा का ध्यान गया। कुछ अधिक चर्चित कवि हिमाचल की ओर आने लगे। इस अवधि में गिरिराज साप्ताहिक पत्र के प्रकाशन ने भी प्रदेश की समकालीन कविता को अपने पत्र में स्थान दिया। सरकारी आयोजनों की वार्षिक संख्या में वृद्धि के कारण प्रदेश की हिंदी कविता को मंचीय समर्थन भी मिला। इस तरह से हिमाचल की हिंदी कविता का यह सफर अबाध गति से आगे बढऩे लगा। हिमाचल की हिंदी कविता अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए है। विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां महिलाएं व पुरुष जीवनयापन के लिए एक समान मेहनत करते हैं। समाज की यह विशेषता कविता में विशिष्ट रूपकों के माध्यम से अभिव्यक्त हुई है। अब हिमाचल की हिंदी कविता की आलोचना के क्षेत्र में भी चर्चा होने लगी है। कवि/आलोचक डा. सत्यनारायण स्नेही ने अपनी पुस्तक ‘समकालीन कविता का लोक’ (प्रकाशन संस्थान, दिल्ली, वर्ष 2017) के अंतिम तीन अध्यायों में हिमाचल की समकालीन कविता का व्यापक मूल्यांकन किया है। डा. स्नेही का मानना है- ‘हिमाचल की हिंदी कविता में आदमी की स्थिति समकालीन कविता की मुख्य धारा के समान है। यहां पर आम आदमी समाज से कटा हुआ है। पहाड़ी एवं पिछड़ा प्रदेश होने के कारण आम आदमी विकास की धारा से नहीं जुड़ पाया है। वह भोला, सीधा-सादा, अनजान एवं सभ्यता से दूर है। वह परिश्रमी और ईमानदार है, मेहनत-मजदूरी करता है, पर उपयुक्त मानदेय नहीं मिलता है’ (पृष्ठ-82)। इस स्थिति में पिछले एक दशक में कुछ सुधार अवश्य हुआ है, लेकिन आशातीत परिवर्तन अभी वांछित है। कवि/आलोचक डा. स्नेही का मानना है कि इस प्रदेश के अधिकांश कवि आत्माभिव्यक्ति एवं कल्पनालोक में खोकर कविता लिखते रहे, परंतु कुछ कवि ऐसे भी हैं जिन्होंने समकालीन जीवन में समय, समाज एवं व्यक्ति सापेक्ष कविताएं लिखी। इनमें पहाड़ी गांवों की तकलीफ, पहाड़ी लोगों का जीवन-संघर्ष और ग्रामीण लोगों की अनभिज्ञता विशेष रूप से अभिव्यक्त हुई है। (पृष्ठ-86)। आलोचक का मत है हिमाचल की इन कविताओं में लोक जीवन में निहित समग्र सामाजिक असंगतियों, विषमताओं को पहाड़ी परिवेश और भौगोलिक स्थिति के अनुरूप उपमानों द्वारा व्यक्त किया गया है। अधिकांश कवियों की कविताएं इस विलक्षणता से परिपूर्ण हैं। इन कविताओं पर चर्चा इसी श्रृंखला में आगे की जाएगी। आलोचक ने सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी विवेचना की है।
कविता में मुखरित विरोधी स्वर में कवि की राजनीतिक प्रतिबद्धता अभिव्यक्त हुई है। प्रदेश के जनजातीय क्षेत्रों सहित प्रत्येक जिले में कवियों की तादाद निश्चित ही उल्लेखनीय है। सोशल मीडिया के माध्यम से हिमाचल की हिंदी कविता तक पहुंच आसान हुई है। मंचीय गतिविधियों में बिलासपुर जैसे जिला में तो प्रत्येक माह साहित्यकार मासिक साहित्यिक आयोजन कर प्रदेश के कविता पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं। इस प्रकार हिमाचल की हिंदी कविता विशेष प्रवृत्तियों के साथ राष्ट्रीय कविता धारा को समृद्ध कर रही है। प्रकृति और पर्यावरण चेतना, लोक-संस्कृति का पुनर्सृजन, स्त्री और हाशिए के वर्गों की आवाज, पलायन और विस्थापन की समस्या, सामाजिक-राजनीतिक आलोचना के स्वर आदि हिमाचल की हिंदी कविता की पहचान बन चुके हैं। यह विशेषताएं कविता की क्षेत्रीय पहचान बनाए रखती हैं। हिमाचल की हिंदी कविता की एक और महत्वपूर्ण पहचान उसकी भाषा और शिल्प है। इस क्षेत्र की कविता का शिल्प सरल, संवेदनशील और बिंबात्मक है। कविता में प्रयुक्त पहाड़, नदी, बर्फ, चरवाहा जैसे प्रतीक और रूपक स्थानीय जीवन से लिए गए हैं। मुक्त छंद का प्रयोग अधिकांश कविताओं में है। समकालीन हिमाचली कविता भारतीय हिंदी कविता के व्यापक परिदृश्य का एक महत्वपूर्ण और सशक्त हिस्सा बन गई है। यह कविता अपने क्षेत्रीय अनुभवों को वैश्विक संदर्भों से जोड़ते हुए एक नई संवेदना का निर्माण कर रही है। इस भूभाग की कविता में प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवन का सक्रिय पात्र के रूप में उभरती है। यहां की कविता सामाजिक यथार्थ, स्त्री-विमर्श और बदलते समय की चुनौतियों को भी गंभीरता से प्रस्तुत करती है। हिमाचल की समकालीन कविता परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित करते हुए एक जीवंत और प्रासंगिक साहित्यिक धारा का निर्माण कर रही है।
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