औरत के नेपथ्य में राजेंद्र राजन का ‘जश्न-ए-बहारां’

By: Aug 30th, 2026 12:01 am

‘जश्न-ए-बहारां’ की कलम से राजेंद्र राजन ने बदलते सामाजिक परिवेश में स्त्री की महत्त्वाकांक्षा, मौकापरस्ती और तरक्की की प्रस्तुति में उसकी उपलब्धियों की तफ्तीश लिखी है। यहां न समाज गला-सड़ा है और न ही मान्यताओं के पिंजरे, बल्कि एक औरत की हस्ती में आकर्षण की तमाम ऐसी सूलियां हैं, जो वक्त-वक्त पर पुरुष समाज को टांग देती हैं। कहानी के कितने ही मजमून हैं, लेकिन मुख्यत: दो व्यक्तित्व यहां एक जान नहीं हो पाए – एक प्रौढ़ शादीशुदा औरत, अपने से कम आयु के पुरुष के प्रति आकर्षण समेटते हुए अपनी प्रसिद्धि की सीढिय़ां सजा लेती है। प्यार के अजीब खंभे-गजब की सीढिय़ां, जहां परिंदों की तरह स्मृति के अपने पंख बदलते हैं और वो ठोकर पर ठोकर मारते हुए, शेष की औकात दो कौड़ी की कर देती है। शेष एक शिकार था या पुरुष के रूप में एक जरूरत, क्योंकि स्मृति अपने व्यक्तित्व को मंजूर करती हुई, पति वेद को भी महज प्रमाणपत्र का एक सफा मानती हुई आकाशबेल की तरह प्रशांत की आभा को लपेट लेती है।

स्मृति के कई नेपथ्य हैं, लेकिन भविष्य को समेटने में लगी यह औरत चर्चाओं के बीच गुलकंद की तरह गुलाब की पंखुडिय़ों को अपने लिए संरक्षित करना जानती है। उपन्यास के भीतर बहस है, सौंदर्य बोध है, व्यावहारिकता की मांग है और फेमिनिस्ट पराकाष्ठा का अपना ही रूप है। प्रेम का न तो कोई डील-डौल, न वक्त, न मर्यादा, बल्कि इसकी टूटन, अपनी प्राथमिकताएं-अपने अनुराग, अपने भटकाव और अलगाव लिए उपन्यासकार अनेक बिंदुओं के संघर्ष को रेखांकित कर रहा है। पहाड़ को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करता उपन्यास, पहाड़ से दोस्ती के मायनों में उभरती कहानी। नायक में पहाड़ की हर विधा, हर अदा और मानवीय जीवन की खोज है, ‘शायद? खुद को खोज रही हूं। हर नए पहाड़ से लौटने के बाद कई रोज तक मैं उसकी गोद में बैठी रहती हूं, किसी बच्चे की तरह।’ मनोविज्ञान के कई अध्याय इस दौरान परत दर परत खुल जाते हैं।

अपने बाह्य माहौल से आंतरित संवेदना के कई संघर्ष रूबरू होते हैं। राजेंद्र राजन जिंदगी की कई खिड़कियां खोलते हुए परिस्थितियों से नकाब हटाते हुए औरतों के अधिकार, भाषायी अनुराग, भाषायी विवाद, मानसिक परिपक्वता, संवाद, बाजारवाद की अनुगूंज पैदा करते इस उपन्यास की प्रस्तुति में नारी विषय को आगे कर देते हैं। उपन्यास प्रेम के कक्ष में मनमौजी, जिज्ञासा के संदर्भ में हरफनमौला, संवाद के स्वरूप में बहता हुआ झरना और विमर्श के दौर में अनवरत सच्चाई को अंगीकार करता है। ऐसा लगता है कि तमाम विषयों की कार्यशाला में ‘शेष’ प्रेम की ‘स्मृति’ में कोई स्मारक खड़ा कर रहा है। कहीं-कहीं आदर्शवाद प्रेम के शब्दकोश से झगड़ा कर रहा है, तो कहीं यह औरत और पुरुष में विभक्त होकर दो पाटों पर खड़ा है, ‘औरत का पहेली बने रहना ही अच्छा है। पुरुष के सामने उसने अपना मन खोला नहीं, कि वह भेडि़ए की खाल ओढ़ लेता है। दबोचने पर उतारू हो जाता है…पर शेष साहिब, मैं तो तुम्हारा वाक्य पूरा करने जा रही थी…।’ प्रेम और शादी के बीच किसका ढिंढोरा ज्यादा पीटा जाता या जहां समाज, संस्कृति की अपेक्षाएं नाप-तोल करती हैं, वहां रिश्तों की पैमाइश मजबूर करती है। शादी के बाद प्रेम कोई अज्ञातवास नहीं, इसलिए शेष अपनी आयु की सीमा रेखा से बाहर अधेड़ हो रही ‘स्मृति’ के आगोश में सपने देख रहा है। प्रेम संवाद में है, निगाहों में है, शारीरिक लगाव या समतल धरा पर समानांतर विचारों का आदान-प्रदान है। उपन्यास में सत्यम् शिवं सुंदरम है, तो प्रेम की मौलिकता में बेपनाह ताकत का इजहार भी। यहां सोच के खाके, संवेदना के उफान, मन के मरहम और पाने की तृप्ति का कोई उपसंहार नहीं। अंतत: पुरुष एक सीढ़ी बनकर वजूद समेटने का मोहताज बन कर महिला सशक्तिकरण की असीम हदों से बाहर फेमिनिस्ट से कवयित्री बन कर मशहूर होने की अदा में विकराल प्रेम गाथा में, स्मृति की महत्त्वाकांक्षा बनाम प्रसिद्धि की उमंग के बीच बुझा हुआ चिराग बन कर रह जाता है। शेष रह जाता है वक्त, शून्यता और संताप।

-निर्मल असो

उपन्यास : जश्न-ए-बहारां
लेखक : राजेंद्र राजन
प्रकाशक : अद्विक पब्लिकेशन, दिल्ली
मूल्य : 190 रुपए


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