मानसून की तबाही के बीच इस रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता, 177 देशों में भारत को मिला 176वां स्थान
जब भी आसमान काले बादलों से घिरता है और मूसलाधार बारिश का दौर शुरू होता है, तो देश के अलग-अलग हिस्सों से पहाड़ दरकने, नदियां उफान पर आने और बाढ़ के कारण सब कुछ तहस-नहस होने की तस्वीरें सामने आने लगती हैं। हाल के दिनों में जिस तरह से बाढ़ और भूस्खलन ने भारी तबाही मचाई है, उसने एक बार फिर हमारे रोंगटे खड़े कर दिए हैं। लेकिन प्रकृति का यह भयंकर गुस्सा सिर्फ मौसमी बदलाव का नतीजा नहीं हैं, बल्कि ये सीधे तौर पर देश की पर्यावरणीय स्थिति और पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के कमजोर होने की ओर इशारा करती हैं।
और अब हाल ही में जारी येल पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक (EPI) 2026 की रिपोर्ट ने भारत की इन चिंताओं को पूरी तरह से आईना दिखा दिया है। एक तरफ जहां देश तेजी से आर्थिक तरक्की और निर्माण कार्य के नए मील के पत्थर छू रहा है, वहीं दूसरी तरफ पर्यावरण के मोर्चे पर हमारी स्थिति बेहद दयनीय बनी हुई है। वर्ष 2026 के येल पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक में भारत को 177 देशों में से 176वाँ स्थान प्राप्त हुआ है, यानि कि लास्ट से दूसरा स्थान और हमारा कुल स्कोर 22.46 रहा है। इस प्रकार, भारत वैश्विक स्तर पर दूसरा सबसे निचला देश रहा और दक्षिण एशिया के 8 देशों में 7वें स्थान पर है। वहीं दूसरी ओर, एस्टोनिया ने 74.79 अंक के साथ इस सूचकांक में शीर्ष (पहला) स्थान हासिल किया है।
बहुत से लोगों के मन में ये सवाल भी आ रहा आखिर पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक है क्या— दरअसल पर्यावरणीय प्रदर्शन सूचकांक (EPI) एक द्विवार्षिक (हर दो साल में आने वाला) वैश्विक सूचकांक है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2000 में हुई थी। ईपीआई दुनिया के देशों के पर्यावरणीय प्रदर्शन को मापने वाला एक वैश्विक सूचकांक है। इसे येल यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा तैयार किया जाता है। इसका उद्देश्य यह आकलन करना है कि कोई देश पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन से निपटने और नागरिकों के स्वास्थ्य की रक्षा करने में कितना सफल है। 2026 की रिपोर्ट में 177 देशों का मूल्यांकन किया गया। ईपीआई केवल प्रदूषण या जंगलों के आधार पर रैंकिंग नहीं देता, बल्कि 47 अलग-अलग संकेतकों के जरिए किसी देश के समग्र पर्यावरणीय प्रदर्शन का आकलन करता है। इन संकेतकों को 12 श्रेणियों और तीन बड़े नीति उद्देश्यों में बांटा गया है।
पिछले कुछ वर्षों में भारत की रैंकिंग की अगर बात की जाए तो- वर्ष 2016: 141वाँ स्थान—-वर्ष 2018: 177वाँ स्थान—वर्ष 2020: 168वाँ स्थान —वर्ष 2022: 180वाँ स्थान और वर्ष 2024 एवं 2026: 176वाँ स्थान भारत को प्राप्त हुआ है। बड़ी बात यह है कि वर्ष 2022 से भारत लगातार पर्यावरण प्रदर्शन सूचकांक में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले पाँच देशों में शामिल बना हुआ है। भारत पर्यावरणीय स्वास्थ्य, वायु गुणवत्ता और जैव विविधता जैसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में लगभग सबसे नीचे रहा है। इसके अलावा मत्स्य पालन, वृक्षावरण और कीटनाशक प्रदूषण के मामले में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। जोकि चिंता का विषय है।
हालाँकि अब इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय और कई भारतीय विशेषज्ञों ने EPI की कार्य-पद्धति पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि यह रिपोर्ट भारत के विकास-स्तर, विशाल जनसंख्या आकार और ऐतिहासिक उत्सर्जनों को नजरअंदाज करती है। यह ‘समान परंतु विभेदित उत्तरदायित्व’ (CBDR) के सिद्धांत के खिलाफ है। यह पूरी तरह से कुछ अनुमानों और सरलीकृत देश-तुलनाओं पर आधारित है। वहीँ दूसरी ओर येल सेंटर फॉर एनवायरनमेंटल लॉ एंड पॉलिसी के शोधकर्ओं का कहना है कि EPI केवल पर्यावरणीय स्थितियों की वर्तमान अवस्था (Current State) को मापता है, न कि भविष्य की नीतिगत प्रतिज्ञाओं को। उनके मुताबिक, इसका मुख्य उद्देश्य ऐतिहासिक दोषारोपण करना नहीं, बल्कि वास्तविक समय (Real-time) की नीति-निर्णय प्रक्रिया को सही दिशा दिखाना है।
तो कुल मिलाकर स्थिति यह है कि एक तरफ जहाँ भारत तेजी से विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर पर्यावरण के मोर्चे पर हमारे सामने चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं। यह रिपोर्ट और वर्तमान में लगातार बढ़ रही बाढ़, बादल फटने व भूस्खलन की घटनाएं एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। येल EPI 2026 की यह रिपोर्ट साफ कर देती है कि जब तक हम हवा, पानी, जैव विविधता और जंगलों (वृक्षावरण) को बचाने के लिए कड़े और जमीनी कदम नहीं उठाएंगे, तब तक प्रकृति का यह रौद्र रूप यूं ही हमारे विकास की रफ्तार को मात देता रहेगा। अब वक्त आ गया है कि हम अपनी नीतियों की समीक्षा करें, क्योंकि पर्यावरण की कीमत पर मिलने वाला विकास अंततः तबाही का ही दूसरा नाम साबित होता है।
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