भारतीय लोकतंत्र में आरक्षण, समानता, हक व चुनौतियां
भारत में आरक्षण का विषय मात्र एक सरकारी या संवैधानिक नीति नहीं है, बल्कि यह देश के सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का सबसे संवेदनशील हिस्सा बन चुका है। हाल के दिनों में सामाजिक माध्यमों पर एक ऐसा संदेश बहुत तेजी से प्रसारित हुआ जिसने देश के कई प्रमुख नेताओं पर सामान्य वर्ग के विरुद्ध राजनीति करने का आरोप लगाया।
इस संदेश में नेताओं पर निशाना साधते हुए सामान्य वर्ग से राजनीतिक रूप से एकजुट होने का आह्वान किया गया। इसके विपरीत, आरक्षण के समर्थकों ने यह स्पष्ट किया कि संविधान द्वारा दी गई इस व्यवस्था का विरोध करना सीधे तौर पर सामाजिक न्याय की मूल भावना का विरोध करना है। इस गहरे वैचारिक टकराव ने एक बार फिर पूरे राष्ट्र को गुटों में बांट दिया है।
-महेंद्र तिवारी, नई दिल्ली
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