इंस्पेक्शन कड़ा; फिर भी दवाएं फेल, उठे सवाल
रिस्क-बेस्ड इंस्पेक्शन के बावजूद अपेक्षित सुधार नहीं होने पर एफआईआई ने छोटी फार्मा इकाइयों पर बढ़ रहे अनुपालन का दबाव होने की कही बात
दिव्य हिमाचल ब्यूरो-बीबीएन
फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्रीज (एफआईआई) के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. चिरंजीव ठाकुर ने देशभर में दवाओं के सैंपल लगातार फेल होने के मामलों पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि पिछले तीन वर्षों से फार्मा उद्योगों में रिस्क-बेस्ड इंस्पेक्शन और संशोधित शेड्यूल-एम के अनुपालन को लेकर व्यापक कार्रवाई की जा रही है। इसके बावजूद सैंपल फेल होने के मामले सामने आ रहे हैं तो नियामकीय व्यवस्था की प्रभावशीलता की समीक्षा की जानी चाहिए। डा. ठाकुर ने कहा कि हिमाचल प्रदेश देश के प्रमुख फार्मा हब में शामिल है और यहां छोटे से लेकर बड़े उद्योग दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए प्रयासरत हैं। उन्होंने कहा कि दवाओं के सैंपल फेल होने के अलग-अलग तकनीकी कारण हो सकते हैं और प्रत्येक मामला सीधे तौर पर जनस्वास्थ्य के लिए समान खतरा नहीं दर्शाता। उन्होंने बताया कि प्रदेश का औषधि विभाग लगातार उद्योगों का निरीक्षण कर गुणवत्ता मानकों का पालन सुनिश्चित कर रहा है। वहीं, ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया के निर्देश पर सीडीएससीओ की ओर से पिछले कुछ वर्षों में रिस्क-बेस्ड इंस्पेक्शन किए गए हैं। निरीक्षण के बाद कई इकाइयों में उत्पादन रोका गया, जबकि कुछ उद्योगों को बंद करने जैसी कार्रवाई भी हुई। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री और स्वास्थ्य सचिव से आग्रह किया कि फार्मा उद्योग से जुड़े नीतिगत निर्णय लेते समय जमीनी परिस्थितियों और एमएसएमई की व्यावहारिक समस्याओं को ध्यान में रखा जाए। उन्होंने कहा कि दवाओं की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए केवल दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं है।
नियामकीय व्यवस्था की प्रभावशीलता पर मांगा जवाब
डा. ठाकुर ने सवाल उठाया कि व्यापक निरीक्षण और कड़े नियामकीय कदमों के बावजूद यदि दवाओं के सैंपल फेल होने की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं आया है तो पूरी व्यवस्था का आकलन जरूरी है। उन्होंने कहा कि इसका सबसे अधिक आर्थिक असर सूक्ष्म, लघु और मध्यम फार्मा इकाइयों पर पड़ रहा है, जो पहले से बढ़ती अनुपालन लागत और आर्थिक दबाव का सामना कर रही हैं। उन्होंने केंद्र स्तर पर लिए जा रहे कुछ नियामकीय निर्णयों में छोटे उद्योगों की व्यावहारिक समस्याओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिए जाने का आरोप लगाया। उन्होंने डीसीजीआई से मांग की कि रिस्क-बेस्ड इंस्पेक्शन, उद्योगों पर हुई कार्रवाई और नए प्रावधानों के बाद दवाओं की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार का आंकलन सार्वजनिक किया जाए। डॉ. ठाकुर ने डीसीजीआई के सेवा विस्तार के दौरान जारी विभिन्न अधिसूचनाओं को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लगातार बदलते प्रावधानों से फार्मा सेक्टर, विशेषकर छोटी इकाइयों में असमंजस की स्थिति पैदा हो रही है। इससे छोटे उद्योगों पर असमान रूप से दबाव बढऩे की आशंका है।
‘इंस्पेक्शन फॉर करेक्शन’ नीति की वकालत
डा. ठाकुर ने ‘इंस्पेक्शन फॉर करेक्शन’ की नीति अपनाने की वकालत करते हुए कहा कि निरीक्षण के दौरान सामने आने वाली कमियों को दूर करने के लिए उद्योगों को तकनीकी मार्गदर्शन और सुधार का उचित अवसर दिया जाना चाहिए। इससे दवाओं की गुणवत्ता में वास्तविक सुधार होगा और छोटे उद्योगों को भी प्रतिस्पर्धा में बने रहने का अवसर मिलेगा।
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