कविता का जनवादी स्वर

By: Aug 30th, 2026 12:04 am

समकालीन कविता का हिमाचली परिदृश्य

कविताओं की महफिल में लेखन का नजराना और भाव व्यंजना का समावेश करते कवियों ने हिमाचली प्रसंगों की चित्रावलियां बनाई हैं। कविता जैसे पहाड़ की बर्फ को पिघला कर नदी के रूप में, पाठकों की यादों से गुजरी है। कविता का पहाड़ी कैनवास कई रंगों को सम्मिलित करता हुआ, परिपक्वता की कलम में आज बहुत कुछ कह रहा है, तो हमने इस शृंखला को नाम दिया ‘समकालीन कविता का हिमाचली परिदृश्य’। काव्य रचनाओं के सागर को प्रतिबिंब की गागर में भरने का जहां प्रयास होगा, वहीं मूर्धन्य कवि एवं समीक्षक सतीश धर इस पूरी शृंखला का तराजू थामे बता रहे हैं कि हर कविता का वजन कितना है। काव्य रचनाओं की समीक्षा का फलक ऊंचा करेंगे कई साहित्यकार। प्रस्तुत है इस शृंखला की किस्त-3…

सतीश धर
मो.-9582347455

कविता
सुंदर लोहिया

वरिष्ठ कथाकार/कवि सुंदर लोहिया का पहला कविता संग्रह ‘एक अस्वीकार और अन्य कविताएं’ वर्ष 2022 में 90 वर्ष की आयु में प्रकाशित हुआ। इससे पूर्व वर्ष 1976 में हिमाचल कला, संस्कृति एवं भाषा अकादमी द्वारा प्रकाशित संयुक्त कविता संकलन ‘श्यामला’ में भी कवि सुंदर लोहिया की कविताओं का प्रकाशन हुआ था। इस संकलन से एक कविता : जब लौटूंगा : ‘जीभ लपलपाता, लगातार घूरता, नि:शब्द/लेकिन शब्दातीत बहुत कुछ बोलता/एक दोमुंहा सांप/कुंडली मारे बैठा है मेरी छाती पर।/मैंने डर से होंठ भींच लिए हैं/ठण्डा गीला स्पर्श, लिजलिजापन लिए/मेरा सारा खून जैसे चूस गया है।/चीख अब होंठों के भीतर/दांतों के बीच अटक कर रह गई है।/लिजलिजे ठंडेपन ने/कर दिए हैं कमजोर मेरे हाथ/धकियाना चाहता हूं, धकिया नहीं पाता।/महसूस करता हूं/अब उसका दूसरा मुंह/लपलपाती जीभ के गर्म किन्तु विषाक्त चुम्बन से/मेरे जिस्म के भीतर खून/विपरीत दिशा में दौडऩे लगा/मस्तिष्क में जमी बर्फ पिघलने लगी/और उस समय मुझे/कैबरे नर्तकी के नंगे जिस्म की याद आई/ब्याहता प्रेमिका को पत्र लिखने का मूड बना/सरकारी संकलन में कविता छपाने की इच्छा जागी।/मैं अच्छी तरह जानता हूं/मेरी हत्या हो चुकी है। गर्म विषाक्त चुम्बन से/मुझे मारा जा चुका है।/हत्यारा छाती से उतर बिल में घुसकर/सुरक्षित हो गया है। मैं जानता हूं। अच्छी तरह जानता हूं/कि कैबरे नर्तकी के नंगे जिस्म/और ब्याहता प्रेमिका की याद को/किसी लोहार की धधकती भ_ी में झोंक/जब लौटूंगा/तो बिल उखाड़- उससे लडूंगा/जलता फौलाद छिडक़ूंगा।’

यह कविता केवल भय की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सत्ता, प्रलोभन, आत्मपराजय और अंतत: आत्मसंघर्ष द्वारा मुक्ति की सशक्त कविता है। ‘दोमुंहा सांप’ जैसा तीखा बिंब, सांकेतिक भाषा और मनोवैज्ञानिक गहराई कविता को एक प्रभावशाली रचना बनाते हैं। 18 जुलाई, 1933 को मंडी (हिमाचल) में जन्मे कवि सुंदर लोहिया की पहली कहानी वर्ष 1958 में ‘वसुधा’ में प्रकाशित हुई थी। पहला उपन्यास ‘धार की धूप’ वर्ष 1981 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास धारावाहिक ‘हिमप्रस्थ’ में भी प्रकाशित हुआ था। वर्ष 1992 में उनका कहानी संग्रह कोलतार प्रकाशित हुआ था। उनका कविता संकलन ‘एक अस्वीकार व अन्य कविताएं’ काव्य सौंदर्य का दस्तावेज नहीं, बल्कि जनजीवन की पीड़ा, सामाजिक विसंगतियों, राजनीतिक विडंबनाओं और मनुष्य की जिजीविषा का सशक्त आख्यान है। इस संग्रह की कुछ कविताएं : 1. हलफनामा : ‘मैं वहां हूं/जहां दिनभर कीचड़ सने पांव/रात गए/देहरी तक अपने निशान/छोड़ जाते हैं/जहां रात भर/पसीने की खुशबू/कमरे में गमकती रहती है/जहां छ: जरब आठ में/सारी जिंदगी पसर जाती है/मैं वहां हूं/उन लोगों के साथ हूं/जो दिन भर/दूसरों की जिंदगी ढोते हैं/जहां आधुनिक भरत/कुत्तों के मुंह से रोटी छीनते हैं/जहां शकुंतलाएं उपले बीनते/बीनते/किसी दुष्यंत के दुश्चक्र में/अज्ञात कुशलशील भरतों की/माताएं बन जाती हैं/मैं वहा हूं/अमेरिका के घैटास में/अफ्रीकी स्वेटो में/हिंदुस्तान के रिवासा में/बेलछी, पारसबीघा और पंतनगर में/मेरा घर है/घर जिसे मेरे हमशक्ल अक्सर जला देते हैं/कांगो हिरोशिमा/वियतनाम जेरुस्लम/मेरे जिस्म के जख्म हैं/जिन्हें भरते-भरते/एक विदूषक सदी गुजर गई/नए जख्म देते हुए/यह नपुंसक दौर भी/निकल जाएगा/लेकिन नागफनी उग आती है/पत्थर फोड़ निकल आती है/बस उसी का इंतजार है।’ (पृष्ठ 18-19)। हलफनामा के माध्यम से कवि शोषित, वंचित और श्रमिकों के साथ अपनी प्रतिबद्धता को व्यक्त करता है।

कविता ‘जंगल रह जाएगा दंग’ में ठूंठ उस वर्ग का प्रतीक है जिसकी आवाज छीन ली गई है : 2. जंगल रह जाएगा दंग : ‘जिस दिन सवाल पूछेंगे ठूंठ/जंगल रह जाएगा दंग/और हवा ठिठक/किसी पारदर्शी ठोस पदार्थ में/बदल जाएगी/खून के प्यासे जानवर/ढूंढेंगे अंधेरी मांदें/सुसताने के लिए/फिलहाल/ठूंठ के पास नहीं जुबान/इसलिए जंगल है आक्रामक/हवा मदमस्त/और हिंस्रपशु घूम रहे/घात लगाए/लेकिन जिस दिन/कोई एक ठूंठ/उठा कर अपना कटा हुआ हाथ/पूछेगा सवाल/उस दिन/जंगल करेगा चीत्कार/उखाड़े गए पुराने मकान के/बौखलाये हुए चूहों की तरह/उस दिन ठहाका लगाएंगे ठूंठ/जंगल रह जाएगा दंग।’ (पृष्ठ-57)। ‘तानाशाह के तीन बंदर’ कविता के माध्यम से कवि सुंदर लोहिया राजनीतिक सत्ता की विडंबनाओं और तानाशाही प्रवृत्तियों पर भी तीखा प्रहार करते हैं। 3. : तानाशाह के तीन बंदर : ‘पहला/वह कुछ नहीं देखता/देखता सिर्फ उतना/जितना उसके भीतर/उसके भीतर है डर/डर के भीतर कायरता/और कायरता के भीतर हिंसा/इसलिए वह/बाहर भी यही देखता है/दूसरा/वह कुछ नहीं सुनता/सुनता है सिर्फ भीतर का शोर/हिंसा में मारे गए निरीह की चीख/और हत्यारे का अट्टहास/उसके लिए रचता है सम्मोहन/इस सम्मोहन के सम्मोहन में/वह और कुछ नहीं सुनना चाहता/तीसरा/वह कुछ नहीं बोलता/बोलते सुना ही नहीं उसे किसी ने/वह निरानंद भाव से करता है बलात्कार, हत्या/और इसी भाव से जलाता है घर/अपने हर कृत्य को ईश्वरीय बताते हुए/वह उंगली आसमान की ओर उठा देता है।’ (पृष्ठ 68-69)।

कोमल मानवीय पक्ष प्रस्तुत करती कविताएं : 4. : बच्चे का बस्ता : ‘बच्चे को लगा/बस्ता कुछ पूछ रहा है/आवाज पिता सरीखी/लेकिन घर की तरह घुडक़ नहीं रहा/कान में बुदबुदा रहा है/खूब पढ़ोगे?/मेरा नाम रौशन करोगे?/घर की इज्जत मुताबिक/शादी करोगे?/सच सच बोलो/चुप रहोगे तो सिर फोड़ दूंगा/बच्चे को याद आया बैताल/घबरा कर बोला- करूंगा करूंगा/सहसा लगा कि बस्ते का बोझ/उतर गया है/और बैताल उड़ कर बस की/छत्त पर चढ़ गया है।’ (पृष्ठ-60)। 5. : बच्चा स्कूटर पर : ‘पिता चला रहे हैं स्कूटर/बच्चा पीछे बैठा है/पिता देख रहे आगे/सामने से आती बसें/सडक़ के गड्डे, रोड़े और पदयात्री/सबसे बचा कर ले जाते हैं पिता/बच्चा इतना जानता है/उसे आगे कुछ नहीं दिख रहा/लेकिन जानता है बच्चा/पिता जहां पहुंचा देंगे/वही उसका गन्तव्य होगा।’ (पृष्ठ-61)।

‘बसंत’ कविता में कवि बसंत को जीवन, आशा और नवसृजन का प्रतीक बनाता है : 6. : बसंत : ‘बसंत कोई मिलिटेंट तो नहीं/जो घरों को जलाता/लाशें रौंधता चला आए/ न तो बसंत कोई धर्मयुद्ध है/जो किसी पण्डित, मुल्ला या पादरी के सिफलिसी दिमाग से उतर कर/सडक़ों गलियों को लाशों से पाट दे/बसंत रथयात्री नेता भी तो नहीं/जिसके पहियों से उड़ती धूल/आदमी के लहू से लुहान होकर/सुबह खबरों की सुर्खियों में छा जाए/बसंत नाम है भोर की पहली किरण का/जो वर्षा धुले आकाश से उतर/कलश गुम्बद और मिनारें/छोड़ परनाले तक पसर जाए/बसंत एक छोटी-सी चिडिय़ा है/जो फुनगी पर बैठ पर खुजलाती/फुर्र से उड़ जाती है/बसंत नाम है- अंकुर का/जो धरती की कठोरता फोड़/सिर तान खड़ा हो जाता है/और सूरज से आंख लड़ाता है/या बसंत सिर्फ एक विचार है/जो शब्दों में ढल/कविता बन जाता है/जो शाख पर खिले/तो फूल बन जाता है/बसंत है जिंदगी का वह गीत/जिसे हर कोई खुशी से गुनगुनाता है।’ (पृष्ठ : 20-21)।

कवि सुंदर लोहिया की कविता ‘मौसम और माहौल’ देखें : 7. : मौसम और माहौल : ‘…इस मौसम का क्या करें मेरे दोस्त/जो सावन में हंसता है/फागुन में बरसता है/मौसम और मनुष्य में/आदिम शत्रुता है/इसलिए आओ/माहौल की बात करें/तुम जानते हो/कविता मेरे लिए शौक नहीं/शौकिया श्रोताओं का मनोरंजन करते/कविता पढ़ते/मुझे ईसा के लास्ट सपर का सुख मिलता है/इसके बाद/मुझे मालूम है/अपने कवि की सलीब/अपने कंधों ढोनी होगी/सर्दियों के बदलाए आसमान के/मनहूस माहौल में आदमी/कब तक जी सकता है/जिंदगी की सारी आग जहां/रोटियां सेंकने में खर्च हो जाए/ वहां लोग अब भी/मौसम को गालियां देते/जो सावन में हंसता है/फागुन में बरसता है।’ (पृष्ठ 22-23)। कविता प्राकृतिक मौसम और सामाजिक माहौल के बीच एक महत्वपूर्ण भेद स्थापित करती है।

आत्म कथ्य

सुंदर लोहिया वरिष्ठ साहित्यकार हैं और मंडी जिले से संबंधित हैं। इनका जन्म 18 जुलाई 1933 को हुआ। शुरू के वर्षों में ये कई पत्रिकाओं में छपते रहे, बाद में कुछ किताबें लिखीं। धार की धूप इनका उपन्यास है। कोलतार इनका कहानी संग्रह है। एक अस्वीकार इनका कविता संग्रह है। लेखन के अलावा यह कई सामाजिक कार्यों में भी भूमिका निभाते रहे। यह हिमाचल कला, संस्कृति, भाषा अकादमी से ‘साहित्य अकादमी’ पुुरस्कार तथा शिखर साहित्य संस्कृति मंच से ‘शिखर’ सम्मान से सम्मानित हैं।

टिप्पणियां

आम आदमी से जुड़ी कविता

डा. विजय विशाल
मो.-9418123571

सुंदर लोहिया हिमाचल की जनवादी कविता के प्रतिनिधि रचनाकार हैं। इनकी कविताओं में सामाजिक यथार्थ, राजनीतिक विडंबना, पर्यावरण, श्रम और आम आदमी के जीवन-संघर्ष का गहरा संबंध दिखाई देता है। प्रस्तुत कविताओं में ‘जब लौटूंगा’ कविता लौटने की आकांक्षा को व्यक्तिगत वापसी से आगे सामाजिक प्रतिरोध और परिवर्तन की चेतना से जोड़ती है। हिंसा, भय और दमन के बीच कवि का लौटना बेहतर और न्यायपूर्ण जीवन की पुनस्र्थापना का संकल्प है। ‘हलफनामा’ में कवि शोषित, श्रमजीवी और वंचित मनुष्य के पक्ष में अपनी गवाही दर्ज करता है। कीचड़, पसीना, भूख और हिंसा के अनुभव व्यापक मानवीय पीड़ा में बदल जाते हैं। कविता संघर्ष और परिवर्तन की संभावना में विश्वास व्यक्त करती है। ‘जंगल रह जाएंगे दंग’ में कवि जंगल और ठूंठ के प्रतीक पर्यावरण-विनाश तथा मनुष्य की स्वार्थी हिंसा को उजागर करता है। कटे हुए पेड़ का सवाल प्रकृति के प्रति मनुष्य की जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है। ‘तानाशाह के तीन बंदर’ कविता गांधी के तीन बंदरों की छवि को नया राजनीतिक अर्थ देते हुए सत्ता के अत्याचार और समाज की भयभीत चुप्पी पर व्यंग्य करती है। न देखना, न सुनना और न बोलना तानाशाही को मजबूत करने वाली मानसिकता के प्रतीक हैं। ‘बच्चे का बस्ता’ में बस्ता शिक्षा के साथ अभिभावकीय अपेक्षाओं का बोझ भी ढोता है। बच्चे के अपने सपने वयस्कों की महत्वाकांक्षाओं के नीचे दबते दिखाई देते हैं। कविता बचपन और शिक्षा व्यवस्था की विडंबना को मार्मिक ढंग से सामने लाती है। ‘बच्चा स्कूटर पर’ कविता में पिता का स्कूटर चलाना और बच्चे का पीछे बैठना जीवन-यात्रा का प्रतीक बन जाता है। पिता मार्गदर्शक हैं और बच्चा विश्वासपूर्वक उसी दिशा में बढ़ता है जहां पिता पहुंचते हैं। ‘बसंत’ कविता में कवि बसंत को हिंसा और रक्तपात के विपरीत जीवन, सृजन और उल्लास का प्रतीक बनाता है। चिडिय़ा, अंकुर और फूल जीवन की पुनर्रचना की आशा जगाते हैं। इसी तरह ‘मौसम और माहौल’ कविता प्राकृतिक मौसम से सामाजिक माहौल की ओर बढ़ती है। बेरोजगारी, उदासी, राजनीतिक असमंजस और अंधेरे के बीच ‘माचिस’ जलाने की इच्छा प्रतिरोध और उम्मीद की छोटी किंतु महत्त्वपूर्ण लौ है। सारांशत: कह सकते हैं कि इनमें कोई भी कविता ऐसी नहीं है जिसका हमारे समय और समाज से संबंध न हो। एक गतिशील लेकिन संकटों, संघर्षों और चुनौतियों से भरे समाज की धडक़नें इन कविताओं में सुनी जा सकती हैं।

मानवीय संवेदनाओं को शब्दों से सहलाती कविताएं

मुरारी शर्मा
मो.-9418025190

हिमाचल की बंजर जमीन को साहित्य के श्रम से उर्वरा बनाने वाले रचनाकारों में वरिष्ठ कवि/कथाकार सुंदर लोहिया का नाम बड़े अदब से लिया जाता है। नई कहानी की त्रयी के मशहूर हस्ताक्षर मोहन राकेश के शिष्य रहे सुंदर लोहिया बतौर कहानीकार राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे। लेकिन हिंदी कविता में भी उनका मुहावरा एक नई जमीन को तोड़ता प्रतीत होता है। सुंदर लोहिया ने जनवादी चेतना से सराबोर अपनी कहानियों में जहां आम आदमी के दु:ख-दर्द को महसूस कर उसे कोलतार और मंगलाचारी जैसी कालजयी कहानियों के माध्यम से स्वर दिया है, वहीं पर कविताओं का अपना अलग ही सौंदर्य शास्त्र गढ़ा है। सुंदर लोहिया की कविता में केवल मात्र भय की अभिव्यक्ति नहीं, सामाजिक विसंगतियों, कठोर जीवन संघर्ष के बीच मनुष्य की जिजीविषा का सशक्त आख्यान है। वहीं सुंदर लोहिया की कविताओं में मानवीय संवेदनाओं को शब्दों से सहलाने का कोमल एहसास भी है। उनकी कविता ‘जब लौटूंगा’ में प्रभावशाली बिंब, सांकेतिक भाषा और मनोवैज्ञानिक गहराई लिए कविता को अलग स्तर पर ले जाती है। वहीं ‘जंगल रह जाएगा दंग’ के माध्यम से कवि ठूंठ को हाशिए पर खड़े उस वंचित व्यक्ति के रूप में देखता है…जब वह सत्ताधीशों से सवाल पूछने लगेगा तो सियासत के जंगल में हलचल तो मचेगी ही। सुंदर लोहिया की दृष्टि एक कवि के रूप में वैश्विक है। हलफनामा कविता में वे जहां कीचड़ सने पांव देहरी तक निशान छोडऩे की बात करते हैं, तो वहीं पर भरत, शकुंतला और दुष्यंत के आख्यान को नए सिरे से परिभाषित करते हैं। इसी कविता में अमरीका, अफरीकी स्वेटो, वियतनाम, जेरूस्लम तक के शोषित वंचित तबके के दर्द को साझा करते हैं। गांधी जी के तीन बंदरों से इतर तानाशाह के बंदरों की अलग व्याख्या करते हैं। तो बच्चों पर लिखी कविताओं में कोमल मानवीय पक्ष प्रस्तुत करते हैं। लेकिन बसंत कविता बसंत की रूमानियत को अलग ही ढंग से परिभाषित करती है। जैसे चिली के नोबलजयी कवि पाब्लो नेरूदा कहते हैं बसंत को आने से कोई रोक नहीं सकता है। सुंदर लोहिया का बसंत भी अलग ढंग से आता है। उनके लिए तो बसंत नाम है अंकुर का जो धरती की कठोरता फोड़ सिर तान खड़ा हो जाता है और सूरज से आंख लड़ाता है या बसंत सिर्फ एक विचार है जो शब्दों में ढल कविता बन जाता है, बसंत है जिंदगी का वह गीत जिसे हर कोई खुशी से गुनगुनाता है। उसी प्रकार प्राकृतिक मौसम और सामाजिक माहौल के बीच के भेद को बताती कविता मौसम और माहौल को अलग ही ढंग से उकेरा है। वे कहते हैं- लोग अब भी मौसम को गालियां देते हैं, जो सावन में हंसता है और फागुन में बरसता है। सुंदर लोहिया अपनी कहानियों की तरह कविता में भी जनवादी चेतना के प्रखर हस्ताक्षर हैं।

विद्रूपता का धारदार चित्रण करती कविताएं

प्रियंवदा पांडेय
मो.-7068595353

आदरणीय लोहिया जी की कविताएं अपने समय के विद्रूप का धारदार चित्रण हैं जिसमें वह स्त्री-पुरुष प्रकृति, छोटे-बड़े शोषक और शोषित सभी की बात को बड़ी बेबाकी से करते हैं। मानव जीवन के बहुरूप, उसकी कमजोरी तथा छल और प्रपंच के खेल को बयान करते हुए वह अपना पक्ष भी रखते हैं कि वह इस समाज में इस समय में कहां मौजूद हैं, जब वह हलफनामा कविता में कहते हैं मैं वहां हूं जहां आधुनिक भरत कुत्तों के मुंह से रोटी छीन लेते हैं, जहां शकुंतलाएं उपले बीनते-बीनते किसी दुष्यंत के दुश्चक्र में अज्ञात कुलशील भरतों की माताएं बन जाती हैं। यह पंक्तियां सदियों से हो रहे स्त्री शोषण की सचबयानी हैं। वह देश-विदेश के पारस्परिक वैमनस्य और वर्चस्व की लड़ाई का वर्णन तो करते ही हैं, साथ ही प्रकृति की कोमलता के बीच वह ठूंठ ढूंढ लेते हैं जो समाज में कोढ़ की तरह समाज के रहनुमाओं से प्रश्न करता हुआ खड़ा है तथा अकेले सभी की पोल खोल रहा है। तथा यह भी बताते हैं कि तानाशाह रूपी मदारी ने किस तरह लोगों को अंधा-बहरा और गूंगा बना रखा है। आज के परिदृश्य में लोहिया जी की कविताएं वह सवाल हैं जिसका उत्तर हर वंचित, शोषित और प्रभावित व्यक्ति खोज रहा है।


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