फौजी संदूक में संभाल रखी थी राखियां, मेजर सुधीर कुमार वालिया ने किताबों में संजोया था भाई-बहन का स्नेह
कार्यालय संवाददाता-पालमपुर
अशोक चक्र विजेता शहीद मेजर सुधीर कुमार वालिया की शहादत के बाद जब फौजी संदूकों सहित उनका सामान घर पहुंचा, तो परिवार के लिए उन्हें खोलकर देख पाना आसान नहीं था। शहादत का दर्द इतना गहरा था कि संदूकों को कई वर्षों तक द्वारा खोला ही नहीं गया। लगभग 21 वर्ष बाद, जब 2020 में परिवार ने हिम्मत करके एक संदूक को खोला, तो उसमें रखी चीजों ने सभी को भावुक कर दिया था।
उनकी बहनों द्वारा भेजी गई राखियां, जिन्हें मेजर सुधीर वालिया जी अपनी कलाई पर बांधते थे, उन्होंने उतारने के बाद फेंका नहीं था। उन्होंने उन राखियों को बहुत सहेजकर अपनी किताबों के बीच संदूक में संभालकर रखा था। आमतौर पर राखी कुछ समय कलाई पर बंधी रहती है और फिर उतार दी जाती है, लेकिन सुधीर जी के लिए बहन का प्यार इतना अनमोल था कि उन्होंने उन राखियों को भी एक अनमोल याद की तरह संजोकर रखा था। उनकी बहन आशा वालिया कहती हैं कि जिस कलाई पर देश की रक्षा का संकल्प बंधा था, उसी कलाई की राखियों को उन्होंने जीवनभर की स्मृति बनाकर संभाल कर रखा।
बॉक्स में अटूट प्रेम, रिश्ते की गहराई की थी निशानियां
21 वर्षों बाद जब वही राखियां संदूक से बाहर आईं, तो परिवार के लिए वह केवल कुछ राखियां नहीं थीं, वे भाई और बहनों के बीच अटूट प्रेम, रिश्ते की गहराई और सुधीर वालिया के संवेदनशील व्यक्तित्व की जीवित निशानी थीं। उस क्षण ने परिवार को यह एहसास कराया कि देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाला वह वीर सैनिक भीतर से कितना भावुक और अपने परिवार से कितना गहरा जुड़ा हुआ था। वे राखियां आज भी केवल धागे नहीं हैं, वे एक भाई के प्रेम, बहनों की भावनाओं और एक अमर शहीद की यादों को अपने भीतर समेटे हुए हैं।
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