मातृभूमि के प्रति आस्था का मंत्र है वंदे मातरम
भारत के इतिहास में अनेक ऐसे क्षण आए हैं, जब गीत, नारे और कला के अन्य स्वरूप सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों की आत्मा बन गए। छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के रणगीत हों, स्वतंत्रता संग्राम के दौरान गाए गए देशभक्ति के अमर गीत हों या फिर आपातकाल के समय युवाओं द्वारा गाए गए प्रतिरोध के स्वर, गीतों ने सदैव भारतीय समाज में सामूहिक चेतना, राष्ट्रीय एकता और जनजागरण का संचार किया है। इन्हीं में भारत के राष्ट्रगीत वंदे मातरम का स्थान अत्यंत विशिष्ट और गौरवपूर्ण है। वंदे मातरम का सरल अर्थ है ‘मां की वंदना’। इस मंत्र का प्रत्येक अंश राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत है। वंदे मातरम मात्र मातृभूमि के प्रति वंदना का उद्घोष नहीं है, अपितु त्याग, शौर्य और राष्ट्र के प्रति सर्वोच्च समर्पण एवं प्रेम का भी प्रतीक है। शुरू में वंदे मातरम की रचना स्वतंत्र रूप से की गई थी और बाद में इसे बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास आनंदमठ (1882 में प्रकाशित) में शामिल किया गया। इसे पहली बार 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया था। 1950 में संविधान सभा ने इसे भारत के राष्ट्रीय गीत के रूप में अपनाया। इस मंत्र में मां की जो स्तुति की गई है, वह सीधे तौर पर कोई प्रथागत धार्मिक देवी नहीं हैं। वह मातृभूमि हैं, जिसमें हम रहते हैं। वह गतिशील है और उसी से हमारा अस्तित्व है। यह मातृभूमि केवल एक भूखंड मात्र नहीं है, बल्कि जीवंत इकाई है, जो अपनी संतान के माध्यम से अपना लक्ष्य प्राप्त करती है।
वंदे मातरम गीत का सर्वोच्च लक्ष्य है प्रत्येक भारतीय के हृदय में देशभक्ति की भावना जागृत करना। यह गीत भारत को मां मानता है और उसकी प्रशंसा के गीत गाता है। बंकिम चन्द्र ने भारत माता में वे सभी सद्गुण देखे, जो कोई भी अपनी मां में देखता है। जैसे हम अपनी मां की वंदना करते हैं, उसी प्रकार यह गीत भी भारत माता की भावभीनी वंदना है। वंदे मातरम गीत को सम्पूर्ण रूप से समझने पर स्पष्ट पता चलता है कि राष्ट्र धर्म की श्रेष्ठता प्रतिपादित करने के लिए ही इस गीत की रचना हुई थी। याद रखना चाहिए कि इसी गीत से निकले नारे ‘वंदे मातरम’ ने पराधीन भारत में स्वाधीनता की भावना को प्रज्वलित किया था। अनेक भारतीयों ने इस नारे को लगाते हुए राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण अर्पित कर दिए।
वंदे मातरम में मां की स्तुति में लिखा गया है, हे मातृभूमि, आपसे ही हमारा ज्ञान, चरित्र तथा धर्म है। आप ही हमारा हृदय तथा चैतन्य हैं। हमारे प्राणों में भी आप ही हैं। हमारी कलाईयों में (मुठ्ठी में) शक्ति तथा अंत:करण में काली माता भी आप ही हैं। मंदिरों में हम जिन मूर्तियों की प्रतिष्ठापना करते हैं, वे सभी आप के ही रूप हैं। अपने दस हाथों में दस शस्त्र धारण करने वाली शत्रुसंहारिणी दुर्गा भी आप तथा कमलपुष्पों से भरे सरोवर में विहार करने वाली कमलकोमल लक्ष्मी भी आप ही हैं। विद्यादायिनी सरस्वती भी आप ही हैं। आपको हमारा प्रणाम है। माते, मैं आपको वंदन करता हूं। ऐश्वर्यदायिनी, पुण्यप्रद तथा पावन, पवित्र जलप्रवाहों से तथा अमृतमय फलों से समृद्ध माता आपकी महानता अतुलनीय है, उसकी कोई सीमा ही नहीं है। हे माते, हे जननी हमारा तुम्हें प्रणाम है।
महर्षि अरविंद के शब्दों में बंकिम बाबू आधुनिक भारत के ऐसे ऋषि थे जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से राष्ट्र की सुप्त चेतना को पुन: जागृत किया। उनका उपन्यास ‘आनंदमठ’ केवल एक साहित्यिक कृति भर नहीं था, बल्कि गद्य के रूप में एक ऐसा मंत्र था, जिसने निद्रामग्न राष्ट्र को अपनी दिव्य शक्ति का पुन: स्मरण कराया। अपने एक पत्र में बंकिम बाबू ने लिखा था ‘यदि मेरी समस्त रचनाएं गंगा में विलीन हो जाएं, तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। केवल यह एक स्तुति-गीत ही अनंत काल तक जीवित रहेगा। यह एक महान गीत सिद्ध होगा और जन-जन के हृदय पर अपना अमिट स्थान बना लेगा।’ वंदे मातरम स्वतंत्रता का गीत, अदम्य संकल्प की अभिव्यक्ति और भारत के राष्ट्रीय जागरण का प्रथम मंत्र है। यह पावन उद्घोष अनंत काल तक गूंजता रहेगा और हमें निरंतर प्रेरित करता रहेगा कि हम अपने इतिहास, अपनी संस्कृति, अपने जीवन-मूल्यों तथा अपनी परंपराओं को भारतीयता की दृष्टि से देखें, समझें और आत्मसात करें।
-डा. रविंद्र सिंह भड़वाल, शिक्षाविद
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