डा. रितेश आर्य को मिली बड़ी सफलता, लद्दाख के न्योमा में मिले साढ़े तीन करोड़ वर्ष पुराने समुद्री जीवाश्म
डा. रितेश आर्य को मिली बड़ी सफलता, सुबाथू से लेकर लद्दाख तक करोड़ों वर्ष पूर्व समुद्र होने का सबूत
स्टाफ रिपोर्टर — सोलन
सोलन जिला के कसौली निवासी व प्रसिद्ध भूविज्ञानी और गिनीज बुक ऑफ वल्र्ड रिकार्ड होल्डर डा. रितेश आर्य ने लद्दाख के चांगथांग इलाके में अपने अभियान के दौरान इओसीन काल (आदिनूतन काल) के समुद्री जीवाश्मों (फॉसिल्स) के संग्रह को खोजा है। न्योमा में चलाए जा रहे इस भूवैज्ञानिक अभियान के दौरान डा. आर्य ने टुरिटेला-टाइप गैस्ट्रोपोड (घोंघे जैसे जीव) खोजे हैं, साथ ही उन्हें बाइवाल्व और सीप जैसे जीव के जीवाश्म भी मिले हैंं। इन जीवाश्मों की उम्र सुबाथू फॉर्मेशन से तुलना करने पर करीब साढ़े तीन करोड़ वर्ष की है। उनकी इस खोज से करोड़ों वर्ष पूर्व सुबाथू के समुद्री इलाके के लद्दाख तक पूर्व की ओर फैले होने की संभावना को बल मिला है। वहीं, उनकी यह ताजा खोज अन्य भूवैज्ञानिकों व इस विषय के विद्यार्थियों के लिए भी काफी मददगार साबित होगी। डा. आर्य ने पहले 2018 में देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी द्वारा आयोजित एक सम्मेलन में न्योमा से मिले समुद्री जीवाश्मों के सुबूत पेश किए थे। मौजूदा अभियान में अब उन्हें और भी बड़ा संग्रह मिला है।
अभियान के दौरान जब उन्होंने पहली बार न्योमा में गैस्ट्रोपोड देखे, तो उन्हें यह कुछ जाने-पहचाने से लगे। वे उन जीवाश्मों से काफी मिलते-जुलते थे, जिन्हें अक्सर सुबाथू फॉर्मेशन से इक_ा किया जाता रहा है। हालांकि न्योमा में इस तरह के जीवाश्म मिलने से वे खुद भी काफी हैरान रह गए। उनकी यह खोज पूर्वी लद्दाख के जीवाश्म इतिहास में एक नया और महत्त्वपूर्ण पहलू जोड़ती है। इससे पहले, प्रो. अशोक साहनी और उनके सहयोगियों ने न्योमा के पास कुकशो फॉर्मेशन से मीठे पानी की मछलियों और मोलस्क के बारे में जानकारी दर्ज की थी। बाद के अध्ययनों में लियान फॉर्मेशन और उससे जुड़ी परतों से पौधों और रीढ़ वाले जीवों (वर्टेब्रेट) के जीवाश्म दर्ज किए गए थे। इस खोज के महत्त्व को जाने-माने जीवाश्म विज्ञानी और डा. आर्य के पीएचडी सुपरवाइजर प्रो. अशोक साहनी ने भी माना है। उन्होंने कहा कि लद्दाख में समुद्री जीवाश्मों की डा. रितेश आर्य की खोज, कसौली में की गई शानदार जीवाश्म खोजों के बराबर है।
प्राचीन टेथिस से आधुनिक लद्दाख तक
यह खोज हिमालय की भूवैज्ञानिक कहानी में एक और शानदार अध्याय जोड़ती है। यह दिखाती है कि कैसे लद्दाख के ऊंचे पहाड़ों में अब दिखाई देने वाली चट्टानें तलछट के भीतर प्राचीन समुद्रों, मीठे पानी के पारिस्थितिक तंत्र, वनस्पति और जीवन के सबूतों को संजोए हुए हैं। इस तरह, आज के न्योमा का बंजर इलाका एक बिल्कुल अलग दुनिया की यादें संजोए हुए है। एक ऐसी दुनिया जहां लगभग चार करोड़ साल पहले समुद्री गैस्ट्रोपोड (घोंघे जैसे जीव) रहते थे और यह सब उस समय से बहुत पहले की बात है, जब लद्दाख ने अपना मौजूदा रूप लिया था।
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