85 साल के जेसी शर्मा सीपीयू से करेंगे पीएचडी
बिजली बोर्ड से बतौर चीफ इंजीनियर रिटायर हुए हैं जगदीश चंद शर्मा, 1941 में जन्मे है हीरानगर निवासी जेसी शर्मा
दिव्य हिमाचल ब्यूरो – हमीरपुर
अकसर कहा जाता है कि पढऩे की कोई उम्र नहीं होती। हालांकि यह एक पुरानी कहावत है, लेकिन बहुत कम लोग होते हैं जो इसे चरितार्थ करते हैं। इस कहावत को 85 साल के बिजली बोर्ड से बतौर चीफ इंजीनियर सेवानिवृत्त हुए जेसी शर्मा ने चरितार्थ किया है। मूल रूप से हमीरपुर के हीरानगर से ताल्लुक रखने वाले आजादी से पूर्व वर्ष 1941 में जन्मे जेसी शर्मा ने भोरंज स्थित करियर प्वाइंट यूनिवर्सिटी में पीएचडी में प्रवेश लिया है। उन्हें सीविल इंजीनियरिंग में एडमिशन मिली है। ऐसा माना जा रहा है कि उनका यह प्रयास न केवल विद्यार्थियों और युवाओं बल्कि समाज के हर वर्ग को प्रेरित करेगा। शर्मा हिमाचल प्रदेश स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बतौर मुख्य अभियंता सेवाएं दे चुके हैं।
वे काफी वर्ष पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं। जेसी शर्मा ने यूनिवर्सिटी ऑफ रुडक़ी (जो अब आईआईटी रुडक़ी है) से प्रथम श्रेणी में एमटेक की डिग्री प्राप्त की थी। लंबे प्रशासनिक एवं तकनीकी अनुभव के बाद भी उन्होंने अध्ययन और ज्ञान अर्जित करने की अपनी जिज्ञासा को कभी विराम नहीं दिया। इसी निरंतर सीखने की भावना के साथ उन्होंने अब करियर प्वाइंट विश्वविद्यालय में पीएचडी के लिए प्रवेश लिया है। शर्मा का मानना है कि ज्ञान प्राप्त करने की कोई निर्धारित आयु नहीं होती। यदि व्यक्ति के भीतर सीखने की इच्छा, कुछ नया करने का संकल्प और अपने लक्ष्य को हासिल करने का जज्बा हो, तो उम्र कभी उसकी राह में बाधा नहीं बन सकती। 85 वर्ष की आयु में शोध कार्य के लिए निरंतर अध्ययन करना उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, अनुशासन और शिक्षा के प्रति समर्पण को दर्शाता है। करियर प्वाइंट विश्वविद्यालय में शोध एवं नवाचार को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है।
200 से अधिक स्कॉलर के साथ करेंगे शोध
गौर रहे कि विश्वविद्यालयें विभिन्न विषयों में 200 से अधिक शोधार्थी शोध कार्य कर रहे हैं। ऐसे में शर्मा का पीएचडी शोध से जुडऩा यह संदेश देता है कि शिक्षा और शोध केवल युवा अवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह जीवनभर चलने वाली प्रक्रिया है। विश्वविद्यालय के लिए भी शर्मा जैसे अनुभवी एवं समर्पित शोधार्थी का जुडऩा गौरव का विषय है। शर्मा की यह प्रेरणादायक यात्रा विशेष रूप से आज के युवाओं को यह संदेश देती है कि सफलता के लिए उम्र नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति, मेहनत, अनुशासन और सीखने का जुनून महत्वपूर्ण है। 85 वर्ष की उम्र में पीएचडी की दिशा में आगे बढ़ते शर्मा आज उम्र नहीं, जज्बा मायने रखता है का जीवंत उदाहरण बन चुके हैं। उनकी कहानी उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है, जो किसी भी उम्र में अपने अधूरे शैक्षणिक सपनों को पूरा करने का संकल्प रखते हैं।
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