स्वस्थ तन के साथ शुद्ध मन

By: Sep 26th, 2026 12:15 am

राजयोगी ब्रह्माकुमार निकुंज जी

‘जैसा खाए अन्न वैसा बने मन’ वाली उक्ति बहुत ही सारगर्भित है और इसी वजह से हमारे शास्त्रकारों एवं उपनिषद्कारों के मतानुसार मन को सात्विक बनाना आत्मोत्कर्ष की दृष्टि से नितांत आवश्यक है और उसके लिए आहार शुद्धि को प्रथम चरण माना गया है। हम सभी इस तथ्य से अच्छी तरह से वाकिफ हैं कि हमारे जीवन में आहार का प्रभाव व्यापक है। आहार से रक्त और मांस ही नहीं अपितु मन भी बनता है तथा उसका हमारी मानसिक कार्यक्षमता पर भी अनिवार्य रूप से प्रभाव पड़ता है। यह ऐसी सच्चाई है, जिसका अनुभव हमारे ऋषियों, शरीर शास्त्रियों के साथ-साथ हम सभी ने अपने जीवन में अनेक बार किया है और आज भी कर रहे हैं और इसी अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि आहार में न केवल रस रक्त निर्माण करने की क्षमता है, बल्कि यह हमारे चिंतन के स्तर को भी प्रभावित करता है।

और इसीलिए ही विद्वानों एवं चिकित्सको ने सात्विक आहार लेने पर सदैव जोर दिया है क्योंकि शुद्ध, सात्विक एवं प्राकृतिक आहार केवल शरीर को स्वस्थ नहीं रखता, किंतु मन को भी शांत एवं स्थिर बनाता है तथा अंत: करण को पवित्र बनाता है। आमतौर पर आहार को सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी इन तीन श्रेणियों के अंतर्गत माना जाता है। जितने उत्तेजक, मादक, बहुत ही चटपटे, गरिष्ठ अर्थात देर से हजम होने वाले, सड़े हुए या निद्रा अथवा आलस्य आदि पैदा करने वाले पदार्थ हैं वे तमोगुणी माने जाते हैं। शराब, बीड़ी, सिगरेट ये सभी तमोप्रधान हैं और मनुष्यात्मा का अधोपतन करने वाले हैं। इस प्रकार के पदार्थ मन को निर्मल तथा संतुलित रखने में बहुत ही बाधक होते हैं।

अत: मनुष्य को चाहिए कि वह इनको त्याग दे।
इसी प्रकार, स्वाद को प्रधानता देकर, जीभ की रसना के लिए बनाए गए, इंद्रियों के वश होकर खाए जाने वाले और जीवन में भोग-विलास की भावना पैदा करने वाले अथवा भारी पदार्थ रजोगुणी श्रेणी के पदार्थ माने जाते हैं। फल, सब्जियां एवं सकारात्मक विचारो के साथ पकाया गया अन्न इत्यादि सतोगुणी आहार माना जाता है। शुद्ध एवं सात्विक आहार के व्यापक प्रभाव का उल्लेख करते हुए छांदोग्य उपनिषद् में कहा गया हैं कि
‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धि रूसत्त्वशुद्धौ धु्रवा स्मृति:। स्मृतिलंभे सर्वग्रंथिना विप्रमोक्ष:।।

अर्थात आहार के शुद्ध होने से अंत:करण की शुद्धि होती है, अंत:करण के शुद्ध हो जाने पर बुद्धि निर्मल होती है, बुद्धि निर्मल होने से सब संशय और भ्रम मिट जाते है और तभी मुक्ति का दिव्य अस्वाद प्राप्त किया जा सकता है। अत: जबकि हमें महान अथवा सतोगुणी स्वभाव का बनना ही है तो फिर हमें सतोगुणी आहार ही ग्रहण करना चाहिए। अमूमन भोजन बनाते समय यह तो ख्याल रखा ही जाता है कि रसोई साफ हो, भोजन के बरतन स्वच्छ हों, वस्त्र साफ हों और पदार्थों को ढककर रखा जाए ताकि उनमें गंदगी न पड़ जाए और उन पर मक्खी न बैठे।

परंतु जैसे यह बाहरी स्वच्छता जरूरी है, वैसे ही भोजन बनाने वालों की मानसिक पवित्रता भी आवश्यक है अर्थात भोजन बनाने वाले के मन में अच्छे विचार होने चाहिए। इसके साथ-साथ कमाने वाले व्यक्ति की पवित्र मनसा, भोजन के लिए खरीदे गए पदार्थ की पवित्रता तथा खाने वाले के भी विचारों की पवित्रता, मन की शांत स्थिति इत्यादि। यह सब बहुत जरूरी है। अत: इन सभी बातों से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि यदि मनुष्य एक अच्छी गुणवत्ता वाला जीवन जीना चाहते हैं, तो उन्हें सर्वप्रथम अपनी स्वादेन्द्रिय को वश में करना होगा और अपने आहार का इस प्रकार से नियमन करना होगा कि जिससे उन्हें पूर्ण मात्रा में शक्ति तो मिले ही परंतु उसके साथ-साथ शरीर भी निरोगी बना रहे। यदि हम सचमुच ही सुखमय और शांतिमय जीवन जीने के इच्छुक हैं, तो उसके लिए हमें अपने आहार में सुधार लाना ही होगा।

हमारा भोजन न्याययुक्त उपायों से उपार्जित, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार का कष्ट न होकर प्राप्त किया हुआ एवं सात्विक गुणयुक्त तो होना ही चाहिए, पर इसके साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह यथासंभव स्वाभाविक और प्राकृतिक अवस्था में भी हो। तो क्या इसका अर्थ यह हुआ कि हम आग पर पकाए हुए भोजन को पूर्णतया त्याग कर केवल फल, मूल और पत्तों का ही उपयोग करे? जी नहीं! इतना अतिवादी बनने की कोई अवश्यकता नहीं है, परंतु अपने स्वास्थ्य के लाभार्थ हम सभी इतना तो अवश्य ही कर सकते हैं कि पके हुए भोजन के परिमाण में कमी करके उसके साथ कच्चे फल, शाक, पत्तों का उपयोग करें और अपनी शारीरिक और आर्थिक परिस्थिति को देखते हुए प्राकृतिक भोजन का परिमाण क्रमश: बढ़ाते जाएं। क्या यह संभव नहीं हैं? तो चलिए आज से सात्विक आहार पद्धति को अपनाएं और अपने जीवन को सात्विकता से भरपूर करें।


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