पहाड़ी जीवन के खतरे
कृत्रिम बांधों और ग्लेशियरों के खतरे तमाम हिमालयी राज्यों में मंडरा रहे हैं, तो नेपाल की घटना ने हिमाचल को भी सचेत किया है। प्रदेश के बांधों में एक चौथाई गाद का ठहरना जलक्षमता के भंडारण पर असर डाल रहा है, तो सडक़ मार्गों में सुरंगों के अलावा जल परियोजनाओं में सुरंगों के जरिए पानी को ले जाने का प्रबंध किया गया है। जाहिर तौर पर पर्वतीय आंचल में विकास के मायने तेजी से बदले हैं और मानवीय जरूरतों के कारण निर्माण के मानदंड भी औपचारिकता ही निभा रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग ने बांधों में जमती गाद को प्रमुख दुश्मन मानते हुए इसे हर तरह से हानिकारक माना है। प्रदेश की जल वितरण प्रणाली और विद्युत आपूर्ति का खाका भौगोलिक दृष्टि से विभिन्न चुनौतियों को नजरअंदाज कर रहा है। हिमाचल के शहरी इलाकों पर बढ़ता आबादी का घनत्व आधारभूत सुविधाओं के जोखिम बढ़ा रहा है। हर वर्ष नदी-नालों के करीब बस्तियों पर डाका डालती प्रकृति की नजर को न समझे, तो रामपुर के आसपास, सडक़ों के किनारे उठती इमारतों या मैदानी इलाकों में जल भराव के सामने दयनीय स्थिति के कोप भाजक बन जाएंगे। बरसात में बांधों से पानी छोडऩे का गुनाह कई बार नूरपुर के इलाकों को पस्त कर चुका है, तो हर साल ऊना में रुकने वाले पानी से जल प्रबंधन के नई योजनाएं सामने नहीं आई हैं। यह सब इसलिए भी कि हिमाचल में ग्राम एवं नगर योजना कानून के तहत जल निकासी की दिशा में कोई नया प्रयोग नहीं किया। हिमाचल की पारंपरिक नदियों के जल बहाव को हम केवल बरसाती पानी या बाढ़ के दौरान ही देखते हैं, जबकि सबसे बड़ा अध्ययन नदियों के बेसिन्स पर होने चाहिएं। हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से ग्लेशियर तीव्रता से पिघल कर नई झीलों को जन्म दे रहे हैं। सौ के करीब ऐसी संवेदनशील झीलें बन चुकी हैं, जो अपने आकार और पानी के दबाव के कारण विस्फोटक क्षमता रखती हैं।
हिमाचल की सभी नदियों के स्रोत पहले भी पाराछू झील की तरह खतरे पैदा कर चुके हैं। सतलुज नदी के तटीय क्षेत्रों में भूगर्भीय हलचल ने बार-बार खतरे चिन्हित किए हैं, तो बाकी नदियां भी बाढ़ के संकेतों के साथ जल प्रलय का नासूर लेकर चलती हैं। ऐसे में नेपाल की घटना ने हिमालयी राज्यों की नीतियों में खास तवज्जो देने की नसीहत दी है। कायदे से भारतीय संदर्भों में हिमालयी राज्यों के न तो जलाधिकार सुनिश्चित हुए हैं और न ही जल आबंटन के राष्ट्रीय मानक किसी सर्वमान्य आधार पर पुष्ट हुए हैं। हम फसल की प्रतीक्षा में मानसूनी बादलों का हिसाब करते हैं, लेकिन बांधों के जलस्तर से ऊपर पिघलते ग्लेशियरों के नाज नहीं देखते। पानी के सारे खतरे पहाड़ी जीवन के आसपास छोड़ दिए जाते जबकि इसकी राष्ट्रीय विवेचना जरूरी है। देश की अनेकों नदियां उन परिस्थितियों से निकलती हैं, जिनके मध्य भोटेकोशी या त्रिशुली नदी को भयावह आचरण ओढऩे की तोहमत मिली है। केंद्र सरकार द्वारा जल प्रबंधन के नीतिगत फैसले तथा जल सिंचाई की परियोजनाएं मैदानी इलाकों की राजनीति को तृप्त करती हैं, जबकि असली चुनौती छोटी-बड़ी हजार के करीब झीलों तथा नदियों के तटीय आवरण में मानवीय गतिविधियों से है। हिमालयी क्षेत्र के कैचमेंट क्षेत्रों में विस्तृत अध्ययन, चौकसी, अलर्ट सिस्टम के अलावा नदी-नालों का तटीकरण जरूरी हो जाता है। इन खतरों की चुनौतियों से रू-ब-रू हिमालयी क्षेत्रों के लिए केंद्र में स्वतंत्र विभाग तथा मंत्रालय का सृजन करना होगा।
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