टूलेन-फोरलेन के चक्कर में पुरानी सडक़ों की अनदेखी
मटौर-शिमला एनएच की हमीरपुर में हालत हुई खस्ता, कई जगहों पर तो केवल गड्ढे ही गड्ढे, सफर जानलेवा
दिव्य हिमाचल ब्यूरो – हमीरपुर
हिमाचल प्रदेश में बेशक फोरलेन और टू-लेन जैसे बड़े-बड़े हाई-वे बन रहे हैं और बनने भी चाहिए, लेकिन क्या उन सडक़ों को भूल जाएं जो वर्षों से न जाने कितनी गाडिय़ों का बोझ उठा रही हैं और अनगिनत मुसाफिरों को अपने गंतव्य तक पहुंचाती आई हैं। ऐसा होना तो नहीं चाहिए, लेकिन ऐसा हुआ है। दरअसल पिछले कुछ वर्षों में उन सडक़ों की सुध एक तो ली ही नहीं जा रही और यदि कोई ले भी रहा है, तो थोड़ी से लीपापोती कर ठेकेदार आगे निकल जा रहे, जिनके पास इन सडक़ों की देखरेख का जिम्मा है वो कहीं और ही व्यस्त हैं। जगह-जगह से टूट चुकी इन सडक़ों के कारण वाहन चालकों को तो परेशानी होती ही है, लेकिन सबसे ज्यादा परेशान होते हैं आसपास के वो दुकानदार या लोग जिनके घर या दुकानें इन सडक़ों के किनारे हैं। कुछ ऐसी ही कहानी शिमला-मटौर राष्ट्रीय राजमार्ग की हमीरपुर में देखने को मिल रही है।
इस मार्ग की हालत चील-बाहल से हमीरपुर तक ऐसी है कि पूरी सडक़ जगह-जगह गड्ढों से भरी हुई है। कई जगह पर तो हालात ऐसे हैं कि सडक़ पर पड़े गड्ढे की गहराई का पता नहीं चलता, जिस कारण इनमें पानी भरा होने की स्थिति में वाहन चालक दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। जोलसप्पड़ में निर्माणाधीन हमीरपुर मेडिकल कॉलेज के पास तो इतने बड़े-बड़े गड्ढे पड़ चुके हैं कि कई दोपहिया वाहन चालकों को दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद हॉस्पिटल का रुख करना पड़ा है। पक्का भरो से पीछे डीएवी स्कूल तक तो हालत और भी बदत्तर हो चुकी है। एक तो उतराई ऊपर से टूटी-फूटी सडक़ परेशानी का सबक बनी हुई है। मट्टनसिद्ध के पास बाईपास पर रोड़ की हालत देखकर नहीं लगता कि यह एनएच है। 20 मीटर में ही करीब 50 गड्ढों से खस्ताहल इस पैच पर कीचड़ ही कीचड़ जमा हो गया है। गड्ढों में भरा पानी उछलकर दुकानों तक जा रहा है। उससे अधिक परेशानी वाली बात यह है कि इन गड्ढों को भरने के लिए मिट्टी के साथ जो पत्थर डाले थे वे वाहनों के टायरों से उछलकर दुकानों के अंदर तक जा रहे हैं। यहां एसबीआई के रीजनल ऑफिस के अलावा कई शोरूम और कुछ दूरी पर मंदिर भी है। बताते हैं कि 1100 नंबर पर भी इस समस्या की शिकायत की जा चुकी है, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हो रही।
कार्रवाई की मांग
यही नहीं दुकानदार कई बार पीडब्ल्यूडी को भी इस समस्या से अवगत करवा चुके हैं। अब सवाल उठता है कि आखिर क्यों इन महत्त्वपूर्ण मार्गों की सुध नहीं ली जा रही ।
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