सियासी आपूर्ति का दरिया

By: Sep 2nd, 2026 12:05 am

हिमाचल प्रदेश विधानसभा में मांग और आपूर्ति का चिट्ठा खोलते प्रश्न बताते हैं कि कुछ अनावश्यक ढांचा हमने अपना लिया है। विधायक रणधीर शर्मा के प्रश्न के उत्तर में शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने कहा कि डिनोटिफाई 1526 स्कूलों में 734 ऐसे स्कूल हैं, जहां एक भी छात्र नहीं था। अगर इसी तरह हर विभाग की कार्यक्षमता का हवाला सामने आए तो यकीनन कई सफेद हाथी सामने आएंगे। इसी परिप्रेक्ष्य में चंबा मेडिकल कालेज का जिक्र स्वयं मुख्यमंत्री ने किया है जहां फैकल्टी पूरी तरह कायम रखने के लिए आज भी जद्दोजहद करनी पड़ती है। यानी मांग और आपूर्ति के जिस हिसाब से शिक्षण व मेडिकल संस्थान खुले हैं, उनकी उपयोगिता सिद्ध करने की बुनियाद पर संदेह है। क्या चंबा में मेडिकल कालेज की स्थापना से चिकित्सकीय सेवाएं मुकम्मल होंगी या आधा चंबा जिला आज भी कांगड़ा के टीएमसी में खुद को सुविधाजनक पाता है। हमने एम्स को अहम व सत्ता के प्रभाव में तोलते हुए जो स्थान चयनित किया, क्या वह उचित निर्णय था या साबित हो रहा है। राजनीति गवाह है कि किस तरह हमारी सरकारों ने केंद्रीय विश्वविद्यालय से धर्मशाला की जमीन खींच ली। यहां कार्यालयों का भवन और संस्थानों को इमारतों की तरह देखते हुए क्षेत्रीय असंतुलन की एक प्रतिस्पर्धा दशकों से जारी है। हमने शहरीकरण को इसकी मांग के आधार पर नहीं समझा, बल्कि राजनीतिक आधार पर नगर निगमों के गठन में समझा। प्रदेश की सबसे बड़ी औद्योगिक व शहरी आबादी बीबीएन में तकरीबन चार लाख है, तो क्या हम वहां की भौगोलिक, औद्योगिक, रिहायशी व नागरिक सुविधाओं की मांग को पूरा कर पाए। आश्चर्य यह कि जहां राजनीति का प्रभाव बढ़ गया, वहां शिक्षा-चिकित्सा, शहरी समाधान, बिजली व जलापूर्ति के प्रतिमान बढ़ गए। प्रदेश में परिवहन की मांग को जिस तरह निजी क्षेत्र ने समझा है, क्या उस स्तर का सोच सार्वजनिक क्षेत्र में पैदा हुआ। इतिहास गवाह है कि घाटे के बावजूद हर सरकार ने राजनीतिक बस डिपो बढ़ा दिए, जबकि मांग अलग जिरह करती रही। प्रदेश में कुछ ही सालों में निजी वोल्वो बसों का बेड़ा ढाई सौ के करीब पहुंच गया है, तो इस मांग को बाखूबी समझा गया। दूसरी ओर एचआरटीसी ने अगर 26 नई वोल्वो बसें जोड़ी भी, तो उनका तकाजा न बदला।

हिमाचल में पर्यटन क्षेत्र को समझने में भी सरकारी पक्ष की कमजोरी प्रदर्शित होती है। अब फोरलेन परियोजनाओं ने जिस तरह हाईवे टूरिज्म को बूस्ट दिया है, क्या उस परिप्रेक्ष्य में योजनाएं बनी हैं। आखिर टूरिस्ट जिस मौज मस्ती से या के लिए हिमाचल आना चाहता है, क्या हमने उस तस्वीर की आपूर्ति की है। हमने मंदिरों की आय को मंदिरों या श्रद्धालुओं की मांग पर आधारित नहीं किया, बल्कि इन्हें भी अनावश्यक रोजगार का गुलाम बना दिया। सदन की बहस में मांग और आपूर्ति का हिसाब करते हर सत्र गुजर जाता है, लेकिन हमारी नीतियां, कार्यक्रम और खाके पूरे नहीं होते। आज भी विधायक अपने क्षेत्रों में पुलिस चौकी या थाने, फायर ब्रिगेड का दफ्तर, विभागीय दफ्तर, बस रूट, जलापूर्ति, विद्युत आपूर्ति या किसी नए स्कूल-कालेज, डिस्पेंसरी या पशु औषधालय की मांग करते हैं, तो इसकी आपूर्ति का न्यायोचित फैसला होना चाहिए। राजनीति में सत्ता पक्ष ही वजीफे का हकदार नहीं होना चाहिए। आश्चर्य है कि सरकारें बदलते ही नीतियां बदल जातीं, स्वीकृत योजनाओं-परियोजनाओं की गति थम जाती। बजट का आबंटन हास परिहास का विषय या सियासत का शिलालेख बन जाता है, जबकि भौगोलिक मांग किसी अधूरे भवन की छाती पर मूंग दलती दिखाई देती है। प्रदेश की जरूरतें सियासी कद को नहीं बढ़ातीं, बल्कि इनकी कुशल आपूर्ति के लिए सख्त, संतुलित और पारदर्शी नीतियां चाहिएं। बिना छात्रों के स्कूल, बिना सवारी के बस रूट और बिना औचित्य के कालेज, मेडिकल कालेज, इंजीनियरिंग कालेज या अनावश्यक दफ्तर खोलने से प्रदेश के प्रति वफादारी नहीं है।


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