67 ग्लेशियल झीलों से खतरा, चार पर लगेगा अर्ली वार्निंग सिस्टम

By: Sep 5th, 2026 12:08 am

हिमाचल में अधिक जोखिम वाली झीलों की पहचान कर रहा आपदा प्रबंधन विभाग

दिव्य हिमाचल ब्यूरो — कुल्लू

हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों के बढ़ते खतरे ने सरकार और आपदा प्रबंधन तंत्र की चिंता बढ़ा दी है। प्रदेश में 67 ग्लेशियल झीलों को जोखिम वाली श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से चार सबसे संवेदनशील झीलों या स्थानों पर अर्ली वार्निंग सिस्टम स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। ये प्रमुख रूप से किन्नौर और लाहुल स्पीति के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थित हैं। आपदा प्रबंधन विभाग के अनुसार इन झीलों में अचानक पानी का स्तर बढऩे अथवा प्राकृतिक बांध टूटने की स्थिति में ग्लेशियर लेक आउटबस्र्ट फ्लड गोल्फ आ सकता है। सरकार ने फिलहाल ऐसे चार सबसे संवेदनशील स्थानों को प्राथमिकता दी है। इनमें घेपांग झील करीब 4,070 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है और इसके लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम की योजना बनाई जा रही है। घेपन झील को लेकर वैज्ञानिकों और आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों की चिंता विशेष रूप से बढ़ी है। यह झील सिस्सू के ऊपर स्थित है और इसके आकार में पिछले दशकों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

हिमाचल के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों के पीछे हटने के साथ नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं और कई पुरानी झीलों का आकार भी बढ़ रहा है। किन्नौर और लाहुल स्पीति की भौगोलिक परिस्थितियां तथा नीचे स्थित नदी घाटियां इन झीलों के संभावित आउटबस्र्ट को अधिक गंभीर बना सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यदि झील का प्राकृतिक बांध टूटता है तो पानी के साथ बर्फ, चट्टान और भारी मलबा भी नीचे आ सकता है, जिससे नदी घाटियों में फ्लैश फ्लड जैसी स्थिति पैदा हो सकती है। हिमाचल में ग्लेशियल झीलों की संख्या और क्षेत्रफल में बढ़ोतरी को लेकर वैज्ञानिक अध्ययन भी चिंता जता चुके हैं। एक अध्ययन में 2017 में 651 और 2022 में 1,130 ग्लेशियल झीलों की मैपिंग की गई थी, जो तेजी से हो रहे बदलाव की ओर संकेत करती है। अब निगरानी और चेतावनी पर जोर दिया जा रहा है । सरकार का फोकस अब केवल झीलों की पहचान तक सीमित नहीं है। संवेदनशील झीलों की निगरानी, संभावित बहाव क्षेत्र की पहचान और समय रहत चेतावनी देने के लिए अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं।


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