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देवभूमि का रहस्यमयी नाग मंदिर, जहां मन्नत लेकर पहुंचते हैं श्रद्धालु, जानिए पूरी कहानी

By: Nov 2nd, 2026 9:00 pm

देवभूमि हिमाचल की पहाडिय़ों में बसे कुछ धार्मिक स्थल ऐसे हैं, जहां कदम रखते ही श्रद्धालुओं को एक अलग आध्यात्मिक अनुभूति होती है। कहीं घंटियों की गूंज मन को शांति देती है, तो कहीं सदियों से चली आ रही मान्यताएं लोगों के मन में श्रद्धा और कौतूहल जगाती हैं। कांगड़ा जिले के देहरा उपमंडल के अंतर्गत करियाड़ा स्थित प्राचीन नाग मंदिर भी ऐसा ही एक आस्था स्थल है, जिसकी पहचान नागराज से जुड़ी रहस्यमयी कथाओं, वर्ष 1978 की चर्चित घटना और भक्तों के अटूट विश्वास से बनी हुई है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि मन की मुराद लेकर पहुंचने और आध्यात्मिक शांति पाने का दरबार है। मंदिर की चर्चा स्थानीय क्षेत्र से निकलकर दूरदराज के इलाकों तक पहुंच चुकी है। पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, जम्मू और देश के दूसरे हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं। कोई परिवार की सुख-समृद्धि की कामना लेकर आता है, कोई जीवन की परेशानियों के बीच मन की शांति तलाशता है, तो कोई नागराज के प्रति अपनी पीढिय़ों पुरानी श्रद्धा निभाने यहां पहुंचता है। मंदिर से जुड़ी मान्यताएं और श्रद्धालुओं के व्यक्तिगत अनुभव इस धार्मिक स्थल के प्रति लोगों का आकर्षण बनाए रखते हैं।

1978 की घटना ने जगाया कौतूहल- करियाड़ा नाग मंदिर के रहस्य की चर्चा हो और 18 अक्तूबर 1978 का जिक्र न हो, ऐसा कम ही देखने को मिलता है। स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित मान्यता के अनुसार, इस तारीख को मंदिर से जुड़ी एक असाधारण घटना हुई थी, जिसे भक्तों ने नागराज की दिव्य शक्ति से जोडक़र देखा। समय बीतने के साथ यह प्रसंग स्थानीय लोकस्मृति का हिस्सा बन गया। बुजुर्गों से सुनी गई बातें और पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती कथाएं आज भी लोगों के बीच इस घटना को लेकर जिज्ञासा बनाए रखती हैं। मंदिर परिसर में मौजूद एक पुराना, घुमावदार पेड़ भी श्रद्धालुओं के लिए कौतूहल का विषय है। स्थानीय मान्यता में इस पेड़ को 1978 की घटना से जोडक़र देखा जाता है। इसे देखने वाले कई भक्त इसके स्वरूप और इससे जुड़ी कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। हालांकि, पेड़ और उस घटना के बीच संबंध को प्रमाणित करने वाले ऐतिहासिक दस्तावेज उपलब्ध होना आवश्यक है। फिलहाल इसका महत्त्व मुख्य रूप से स्थानीय मान्यताओं और श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है। इस घटना को लेकर जांच एजेंसियों, पुलिस और बंगाल से आए तांत्रिकों से संबंधित दावे भी स्थानीय चर्चाओं में सुनने को मिलते हैं। लेकिन इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए आधिकारिक अभिलेख जरूरी हैं। यही कारण है कि इस मंदिर की कहानी में रहस्य के साथ-साथ प्रमाणिक इतिहास की खोज की गुंजाइश भी बनी हुई है।

श्रद्धा और विश्वास से जुड़ा दरबार- नाग मंदिर में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण उनका विश्वास है। भक्त नागराज के समक्ष माथा टेककर अपने परिवार की खुशहाली, सुख-शांति और बेहतर भविष्य की प्रार्थना करते हैं। कुछ लोग संतान सुख की कामना लेकर पहुंचते हैं, तो कुछ पारिवारिक परेशानियों के बीच मानसिक संबल तलाशते हैं। मंदिर से जुड़े ऐसे अनेक व्यक्तिगत अनुभव श्रद्धालुओं के बीच साझा किए जाते हैं। इन अनुभवों को चमत्कार का प्रमाण मानने के बजाय श्रद्धालुओं की निजी आस्था के रूप में समझना उचित है। फिर भी धार्मिक स्थलों का महत्त्व केवल ऐतिहासिक तथ्यों तक सीमित नहीं होता। लोगों के लिए वहां मिलने वाला भावनात्मक सहारा, सामुदायिक जुड़ाव और प्रार्थना से मिलने वाली शांति भी गहरा महत्त्व रखते हैं। करियाड़ा नाग मंदिर की लोकप्रियता में इन पहलुओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका दिखाई देती है।

विशाल शिव प्रतिमा और वैष्णो देवी गुफा – मंदिर परिसर में धार्मिक आस्था के साथ भव्यता का भी विशेष संगम देखने को मिलता है। यहां भगवान शिव की विशाल प्रतिमा और धौलाधार पर्वत श्रृंखला की प्रतिकृति श्रद्धालुओं का ध्यान आकर्षित करती है। मां वैष्णो देवी की गुफा भक्तों को एक अलग धार्मिक अनुभूति प्रदान करती है। संगीतमय जल फव्वारा और रंग-बिरंगी रोशनी से सजा परिसर शाम के समय विशेष आकर्षण पैदा करता है। अलग-अलग धार्मिक स्वरूपों के कारण यहां आने वाले श्रद्धालुओं को एक ही स्थान पर अनेक धार्मिक स्थलों के दर्शन का अवसर मिलता है। मंदिर के पुजारी कुलदीप सिंह गुलेरिया की जीवन यात्रा भी संघर्ष और समर्पण से जुड़ी है। बताया जाता है कि पिता प्रभात सिंह के निधन के बाद परिवार को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। परिस्थितियों के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित हुई और आजीविका के लिए उन्हें घर से दूर कारखाने में कार्य करना पड़ा। इसके बावजूद मंदिर से जुड़ाव और धार्मिक परंपराओं के प्रति उनकी श्रद्धा बनी रही। भविष्य में इसे बड़े धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करने की परिकल्पना भी है, ताकि श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधाएं मिल सकें।

– रक्षपाल शर्मा, गरली


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