माता-पिता की कमाई से नहीं तय होगा आरक्षण, OBC क्रीमी लेयर पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
केंद्र सरकार की याचिका खारिज
दिव्य हिमाचल ब्यूरो — नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट ने अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण के तहत क्रीमी लेयर तय करने के नियमों को लेकर एक बार फिर अपना कड़ा रुख साफ किया है। शीर्ष अदालत ने 11 मार्च के अपने फैसले को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें फैसले के क्रियान्वयन के लिए दो साल का समय मांगा गया था। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर की स्थिति तय करने के लिए केवल माता-पिता की आय को ही एकमात्र पैमाना नहीं माना जा सकता। जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की इस दलील को भी ठुकरा दिया कि इस फैसले को केवल भविष्य के मामलों में लागू किया जाए।
देश की सुप्रीम अदालत ने दोटूक कहा कि इस महत्त्वपूर्ण निर्णय के क्रियान्वयन को टालने के लिए सरकार के पास कोई भी ठोस या उचित कारण नहीं है। गौरतलब है कि 11 मार्च को कोर्ट ने सरकार को इस फैसले को लागू करने के लिए छह महीने का वक्त दिया था। शुक्रवार को मियाद पूरी होने पर कोर्ट ने समयसीमा को केवल आठ हफ्ते और बढ़ा दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि सिविल सेवा परीक्षा 2025 का परिणाम छह मार्च को घोषित हो चुका है, लेकिन अभी तक सेवाओं (सर्विसेज) का आबंटन फाइनल नहीं हुआ है। यह चयन प्रक्रिया अभी लंबित है, इसलिए 11 मार्च के फैसले में तय किए गए क्रीमी लेयर के सिद्धांत ही इस परीक्षा के ओबीसी उम्मीदवारों के सेवा आबंटन पर लागू होंगे।
भविष्य की नीतियों पर सरकार को स्वतंत्रता
अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि 11 मार्च के फैसले के बाद रोस्टर पॉइंट के हिसाब से होने वाली सभी नियुक्तियां और आरक्षण का क्रियान्वयन कोर्ट की नई व्याख्या के अनुसार ही होगा। साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सरकार संविधान के दायरे में रहकर और सुप्रीम कोर्ट के तय सिद्धांतों के मुताबिक अपनी नई आरक्षण और क्रीमी लेयर नीति बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।
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