विकास और प्रकृति के बीच संतुलन जरूरी
विश्व पर्यावरण दिवस केवल औपचारिक कार्यक्रमों और नारों का अवसर नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे संबंधों का आत्ममंथन करने का दिन है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया जलवायु संकट, ग्लेशियरों के पिघलने और जैव विविधता के क्षरण को लेकर चिंतित है, तब हिमालय की गोद में बसे हिमाचल प्रदेश से उठती चेतावनियों को गंभीरता से सुनना आवश्यक हो गया है। कुल्लू-मनाली से रोहतांग और पार्वती घाटी तक फैली हिमालयी वादियां, जो कभी शांति, अध्यात्म और प्राकृतिक सौंदर्य का प्रतीक थीं, आज अनियंत्रित पर्यटन, अवैज्ञानिक विकास और उपभोक्तावादी जीवनशैली के दबाव में कराहती दिखाई दे रही हैं। हिमालय केवल पहाड़ों का समूह नहीं है। यह उत्तर भारत की जल-सुरक्षा, जलवायु संतुलन, जैव विविधता और सांस्कृतिक चेतना का आधार है। इसकी नदियां करोड़ों लोगों के जीवन को पोषित करती हैं और इसकी पारिस्थितिकी पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के पर्यावरणीय संतुलन को प्रभावित करती है। इसलिए हिमालय को मनोरंजन स्थल नहीं, बल्कि प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहर के रूप में देखने की आवश्यकता है। हाल के वर्षों में हिमाचल प्रदेश ने प्राकृतिक आपदाओं की भयावह श्रृंखला देखी है। बादल फटना, भूस्खलन, अचानक आई बाढ़, सडक़ों का धंसना और ग्लेशियरों का सिकुडऩा अब अपवाद नहीं रहे। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार ब्यास बेसिन में संभावित रूप से खतरनाक हिमनद झीलों की संख्या वर्ष 2013 के 67 से बढक़र 2015 में 89 हो गई। यह वृद्धि ग्लेशियल लेक आउटबस्र्ट फ्लड जैसी विनाशकारी आपदाओं के बढ़ते खतरे की स्पष्ट चेतावनी है।
इसी प्रकार पार्वती घाटी के ग्लेशियरों में तेजी से हो रहा क्षरण भी गंभीर चिंता का विषय है। विशेषज्ञों के अनुसार पार्वती ग्लेशियर निरंतर पीछे खिसक रहा है। ग्लेशियरों का पिघलना केवल बर्फ का घटना नहीं, बल्कि हिमालय की जीवन-धारा का कमजोर पडऩा है। इसका सीधा प्रभाव भविष्य में ब्यास नदी तंत्र, कृषि, पेयजल और स्थानीय जीवन पर पड़ सकता है। यदि हिमालय की हिम-सम्पदा क्षीण हुई, तो इसका असर केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरा उत्तर भारत जल-संकट और पर्यावरणीय असंतुलन का सामना करेगा। इन संकटों के पीछे केवल वैश्विक जलवायु परिवर्तन जिम्मेदार नहीं है। अनियोजित निर्माण, पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई, नदी किनारों पर अतिक्रमण, कंक्रीटीकरण और अत्यधिक मनोरंजन-प्रधान पर्यटन भी उतने ही उत्तरदायी हैं। दुखद विडंबना यह है कि हिमालय आने वाला एक बड़ा वर्ग अब प्राकृतिक शांति से अधिक कृत्रिम मनोरंजन की तलाश में दिखाई देता है। बड़े-बड़े रिसॉर्ट, तेज संगीत, भारी ट्रैफिक और ऊर्जा खपत आधारित पर्यटन मॉडल पहाड़ों की वहन क्षमता पर लगातार दबाव बढ़ा रहे हैं। सबसे गंभीर प्रश्न यही है कि क्या हिमाचल आने वाला पर्यटक वही कृत्रिम सुविधाएं चाहता है, जो किसी भी महानगर में उपलब्ध हैं? यदि ऐसा है, तो फिर हिमालय की विशिष्टता कहां बचती है?
कुमार रोहित
अपर केंद्रीय भविष्य निधि आयुक्त
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