कागजों में सस्ती थाली, बाजार में महंगा मटन-चिकन, नियम दरकिनार

By: Jul 27th, 2026 12:02 am

कोई नहीं मानता प्रशासन के नियम; सिर्फ कागजों तक ही सिमट रहीं दरें, ग्राहकों से वसूले ज्यादा पैसे, प्रशासन को जल्द कार्रवाई करने की जरूरत

स्टाफ रिपोर्टर-गगरेट
जमाखोरी एवं मुनाफाखोरी रोकथाम अधिनियम-1977 के तहत जिला दंडाधिकारी द्वारा आवश्यक वस्तुओं और ढाबों में मिलने वाले भोजन के दाम तो तय कर दिए गए हैं, लेकिन इन आदेशों का धरातल पर कितना पालन हो रहा है, इसकी निगरानी करने वाला तंत्र कहीं नजर नहीं आता। हालात यह हैं कि जिला प्रशासन की अधिसूचना और बाजार की हकीकत में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है। निर्धारित दरें सिर्फ सरकारी कागजों तक सीमित हैं, जबकि बाजार में उपभोक्ताओं से खुलेआम अधिक कीमत वसूली जा रही है। दिव्य हिमाचल की टीम ने बाजार का जायजा लिया तो सामने आया कि अधिकांश मीट की दुकानों और ढाबों पर न तो रेट लिस्ट लगी हुई थी और न ही जिला दंडाधिकारी द्वारा तय किए गए दामों का कहीं पालन होता दिखा। कई स्थानों पर एक ही वस्तु अलग-अलग कीमतों पर बेची जा रही थी। जिला दंडाधिकारी की अधिसूचना के अनुसार जिले में कच्चे मटन की अधिकतम कीमत 500 रुपये प्रति किलोग्राम निर्धारित की गई है, लेकिन बाजार में यही मटन 600 से 650 रुपये प्रति किलोग्राम तक बेचा जा रहा है। इसी तरह बॉयलर चिकन की निर्धारित कीमत 220 रुपये प्रति किलोग्राम है, जबकि अधिकांश दुकानों पर यह करीब 270 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से बिकता मिला। ढाबों पर भी स्थिति अलग नहीं दिखी। प्रशासन ने आम आदमी के लिए 80 रुपये में फुल डाइट और 30 रुपये में अचार के साथ भरवां परांठा उपलब्ध कराने की दर तय की है, लेकिन जिले के किसी भी ढाबे पर इन दरों पर भोजन उपलब्ध नहीं मिला।

अधिकांश स्थानों पर खाने के दाम निर्धारित दरों से काफी अधिक वसूले जा रहे हैं। ढाबा संचालकों का तर्क है कि बढ़ती महंगाई के दौर में प्रशासन द्वारा तय की गई दरों पर भोजन उपलब्ध कराना व्यावहारिक नहीं है। उनका कहना है कि रसोई गैस, खाद्य तेल और अन्य खाद्य सामग्री के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में पुराने या अव्यावहारिक रेट पर गुणवत्तापूर्ण भोजन परोसना संभव नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जमाखोरी एवं मुनाफाखोरी रोकथाम अधिनियम के तहत आवश्यक वस्तुओं की कीमतें तय करना अनिवार्य है, तो फिर उनकी अनुपालना सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी निगरानी तंत्र क्यों नहीं बनाया गया। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति विभाग पर बाजार की निगरानी की जिम्मेदारी है, लेकिन खुलेआम नियमों की अनदेखी और दुकानों से गायब रेट लिस्ट विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर रही है। जमाखोरी एवं मुनाफाखोरी रोकथाम अधिनियम-1977 के तहत जिला दंडाधिकारी द्वारा आवश्यक वस्तुओं और ढाबों में मिलने वाले भोजन के दाम तो तय कर दिए गए हैं, लेकिन इन आदेशों का धरातल पर कितना पालन हो रहा है, इसकी निगरानी करने वाला तंत्र कहीं नजर नहीं आता। उधर, जिला खाद्य आपूर्ति नियंत्रक राजीव शर्मा ने कहा कि जिला प्रशासन द्वारा निर्धारित दरों से अधिक कीमत वसूलना नियमों का उल्लंघन है। तय कीमत से अधिक राशि वसूले जाने की शिकायत मिलती है तो दुकानदार या ढाबा संचालक के खिलाफ कार्रवाई होगी।

सेमी डीलक्स ढाबों ने बदल दी व्यवस्था

दरअसल जिले में पारंपरिक ढाबों की जगह अब बड़ी संख्या में सेमी डीलक्स ढाबों ने ले ली है। इनमें से अधिकांश पर्यटन विभाग में पंजीकृत नहीं हैं, लेकिन संचालन रेस्टोरेंट की तर्ज पर करते हैं। ये निर्धारित फुल डाइट थाली परोसने के बजाय प्रति प्लेट सब्जी और अलग-अलग आइटम के हिसाब से बिल बनाते हैं। यही कारण है कि ऐसे प्रतिष्ठान जिला दंडाधिकारी द्वारा तय की गई दरों को लागू नहीं मानते। बदलते स्वरूप को देखते हुए प्रशासन के लिए भी इन रेस्टोरेंटनुमा ढाबों की श्रेणी और मूल्य निर्धारण व्यवस्था की समीक्षा करना समय की जरूरत बन गया है।


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