Nepal Flood : 15 साल में पांच बार महातबाही… कवच से काल बन रहा हिमालय
नेपाल में तिब्बत की ओर से अचानक आई भीषण बाढ़ की वजह ग्लेशियल झील का फटना माना जा रहा है। ऐसा तब होता है, जब ग्लेशियर तेजी से पिघलता है। इससे झील पर दबाव बढ़ता है और वह टूट जाती है। इसे ग्लेशियल लेक आउटबस्र्ट कहते हैं। नेपाल की जिस भोटेकोशी नदी में भीषण बाढ़ आई है, उसके साथ बर्फ, मलबा भी बहकर आया है, जिससे कुछ ही मिनटों में नदी का जलस्तर 8 से 10 मीटर तक बढ़ गया। कवच के तौर पर माना जाने वाला हिमालय अब काल बन रहा है। इससे पहले भी हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर फटने की कई घटनाएं हो चुकी हैं। इनमें सबसे भीषण सैलाब 2013 में केदारनाथ में आया था, जिसमें हजारों लोगों की जान चली गई थी। रिपोर्ट के अनुसार 1984 से लेकर 2023 के बीच हिमालयी क्षेत्र में 2431 बड़ी ग्लेशियल झीलों में से 676 झीलों का आकार बढ़ा है। इनमें 130 झीलें भारत के सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र बेसिन में हैं, इसीलिए हिमालय में ग्लेशियर फटने की घटनाएं बढ़ रही हैं।
केदारनाथ आपदा (2013)
यह ग्लेशियर फटने से हिमालय क्षेत्र में आई इतिहास की सबसे बड़ी घटना है। इसमें चोराबाड़ी ग्लेशियल झील का बांध टूट गया था। ऐसा भारी बारिश और ग्लेशियर की पिघलने की वजह से हुआ। इससे जो सैलाब आया उसने मंदाकिनी नदी में जलस्तर को अचानक बहुत बढ़ा दिया था। इससे केदारनाथ घाटी और नीचे की बस्तियां पूरी तरह डूब गईं थीं। इस आपदा में हजारों लोगों की जान गई थी। उत्तराखंड के सरकारी आंकड़ों में ही 5700 से ज्यादा लोगों को जान जाने की पुष्टि की गई थी। बाद में इनकी संख्या बढ़ाकर 6054 कर दी गई थी। मरने वालों में ज्यादातर तीर्थयात्री थे, जो केदारनाथ दर्शन करने गए थे। ये सैलाब अपने साथ पुल, सडक़ों को बहा ले गया था। 14 किमी लंबा पैदल मार्ग भी बुरी तरह तबाह हो गया था।
साउथ ल्होनक झील (2023)
तीन और चार अक्तूबर को सिक्किम में साउथ ल्होनक ग्लेशियल झील के फटने से भारी तबाही आई थी। ऐसा तब हुआ था, जब झील को रोकने वाला नेचुरल बांध यानी मोरेन का एक बड़ा हिस्सा झील में गिरा। इससे तकरीबन 20 मीटर ऊंची सुनामी जैसी लहर उठने की बात कही गई थी, जिससे झील टूट गई और तीस्ता नदी के रास्ते आए सैलाब ने तबाही मचाई। इस आपदा में पहले 30 से 32 लोगों के मारे जाने की संभावना जताई गई थीं, हालांकि राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने अधिकारिक तौर पर 70 से ज्यादा मौतें दर्ज की हैं। 100 से 120 लोगों को लापता बताया गया है। यह आपदा तकरीबन 60 हजार लोगों के प्रभावित होने की वजह बनी थी। सैलाब में 13 पुल बह गए थे, सडक़ें टूट गईं थीं और राष्ट्रीय राजमार्ग-10 को क्षति पहुंची थी।
चमोली आपदा ( 2021)
चमोली जिले में सात फरवरी को आया सैलाब अपने साथ सैकड़ों लोगों को बहाकर ले गया था। ऐसा तब हुआ था, जब बर्फ की चट्टान का एक बड़ा टूकड़ा टूटकर झील में गिरा और उससे रौतीं, ऋषिगंगा और धौलीगंगा नदी में सैलाब आ गया। इस आपदा में तकरीबन 200 से ज्यादा लेागों के मारे जाने के सरकारी आंकड़े जारी किए गए थे। बाद से 80 से 85 लोगों के शव और बरामद हुए थे। इनमें ज्यादातर वे थे जो पास ही चल रही पनबिजली परियोजना में मजदूर के तौर पर काम कर रहे थे। सैलाब की वजह से 13.2 मेगावाट की ऋषिगंगा पनबिजली परियोजना को पूरी तरह नष्ट कर दिया था। ऋषिगंगा और धौलीगंगा के संगम के पास एक पुल भी बह गया।
मेलमची बाढ़ (2021)
सिंधुपालचोक में 15 जुलाई को मेलमची नदी में आया भीषण सैलाब कई लोगों की मौत का कारण बना था। लगातार बारिश और ग्लेशियर पिघलने की वजह से पेमधुम त्सो झील में आए उफान को इसका कारण बताया गया था। इस आपदा में नेपाल की ओर से पांच लोगों के मारे जाने की पुष्टि की गई थी, जबिक विश्व बैंक के आंकड़ों में 17 मौतें दर्ज थीं। बाढ़ में सैकड़ों घर बह गए थे और कई बस्तियों का सडक़ संपर्क कट गया था। सैलाब इतना भीषण था कि मेलमची बाजार में मलबे की 10 मीटर ऊंची परत जम गई थी।
भोटेकोशी, तिब्बत नेपाल सीमा ( 2016)
नेपाल में जहां आज तबाही आई है, वहां ऐसी ही तबाही ठीक 10 साल पहले पांच जुलाई, 2016 को आई थी। इसमें 4610 मीटर की ऊंचाई पर स्थित गोंगबातोंगशा ग्लेशियल झील का नेचुरल बांध टूट गया था और उसके साथ भोटेकोशी नदी में ऐसा सैलाब आया, जिसमें सैकड़ों लोग बह गए थे। हालांकि ये सैलाब उतना भीषण नहीं था, जितना खतरनाक आज आया है। उस वक्त आए इस सैलाब में मौतें कितनी हुईं थीं, इसका आधिकारिक तौर पर कहीं रिकॉर्ड नहीं मिला। हालांकि इस आपदा ने भोटेकोशी पनबिजली प्लांट को भारी नुकसान पहुंचाया था।
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