हिमाचल में बाढ़ आने से पहले ही मिलेगा अलर्ट, जानिए क्या है अर्ली वार्निंग सिस्टम
हिमाचल में देश का पहला अर्ली वार्निंग सिस्टम
नहीं होगी अब नेपाल जैसी तबाही
वैज्ञानिकों ने दी थी चेतावनी
हिमाचल प्रदेश ने देश में एक नया इतिहास रच दिया है! नेपाल की विनाशकारी तबाही को अपनी आँखों से देखने और उससे सबक लेते हुए, हिमाचल अब पूरी तरह से ‘अलर्ट मोड’ पर आ गया है। लाहौल-स्पीति घाटी में समुद्र तल से 4,070 मीटर की ऊँचाई पर स्थित ‘घेपन ग्लेशियर झील’ पर देश का पहला अत्याधुनिक ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ स्थापित कर दिया गया है।
अब सबसे पहले यह जानना जरुरी हो जाता है की अर्ली वार्निंग सिस्टम क्या है ==(Early Warning System) एक ऐसी तकनीक या प्रणाली है, जिसका उपयोग चक्रवात, बाढ़, भूकंप, सुनामी या अत्यधिक बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं और खतरों के आने से पहले लोगों को सचेत करने के लिए किया जाता है। यह प्रणाली मौसम उपग्रहों (satellites), राडार और विभिन्न सेंसरों के माध्यम से खतरे के संकेतों पर लगातार नजर रखती है और समय रहते सटीक डेटा जुटाती है। इसके माध्यम से समय रहते चेतावनी जारी करने से प्रशासन और आम जनता को सुरक्षित स्थानों पर जाने, बचाव कार्यों की तैयारी करने और जान-माल के भारी नुकसान को रोकने का बहुमूल्य समय मिल जाता है।
देखिए घेपन झील से पैदा हुए खतरे की शुरुआत तब हुई जब पिछले 40 सालों में इस झील का दायरा चौंकाने वाली रफ्तार से करीब 173 प्रतिशत बढ़ गया। साल 2023 के नवंबर में इसरो (ISRO) ने प्रशासन को इस बढ़ते खतरे से आगाह किया था। इसके बाद, जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की अध्यक्ष और डीसी किरण भड़ाना ने खुद 14 किलोमीटर की कठिन पैदल चढ़ाई कर इस खतरनाक झील का जायजा लिया और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ मिलकर इस कवच को तैयार किया।
अब इस हाई-टेक सिस्टम में बुआय-आधारित निगरानी स्टेशन, ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन और ग्लेशियर विजन यूनिट तैनात की गई हैं। यहाँ से मिलने वाले डेटा और विजुअल्स को C-DAC के सुपरकंप्यूटर से जोड़ा गया है, जो पल-पल की खबर देगा और खतरे की घंटी बजते ही प्रशासन को अलर्ट कर देगा। इस अनूठी पहल से न सिर्फ चंद्रा-चिनाब घाटी के इलाकों को सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी, बल्कि यह तकनीक आने वाले समय में पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक जीवनरक्षक ढाल साबित होगी।
देखिये अगर हम बात पहले की करें तो वैज्ञानिकों ने 8 अलग-अलग स्थितियों का अध्ययन किया था,सभी में सिस्सू गांव रेड जोन में आता था. सबसे खतरनाक स्थिति में झील फटने के सिर्फ 21 मिनट में बाढ़ का पानी सिस्सू पहुंच सकता था. पर अब ऐसा कोई खतरा नहीं है क्यूंकि अब ऐसी किसी भी आपदा के आने से पहले इसकी सटीक जानकारी मिल जाएगी।
अगर हम एक और पुराने आंकड़े की बात करें तो हिमाचल प्रदेश में 2016 में 805 ग्लेशियर झीलें थीं, जो 2022 तक बढ़कर 1,619 हो गईं. तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कीें इन झीलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। वैज्ञानिक भी चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और झीलें बढ़ रही है।
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