प्रतिबिम्ब

हिमाचल में सृजन की उर्वरा जमीन पर उम्मीदों की नई कोंपलें फूटंेगी ऐसी संभावना है। साहित्य समाज का दर्पण होने के साथ-साथ अपने समय का प्रामाणिक दस्तावेज भी होता है। जो अपने समय, समाज, संस्कृति और इतिहास को भी रेखांकित करता है। हिमाचली रचनाकारों में भी आज अपने समय की विदू्रपताओं और विषमताओं को लेकर

हिमाचल प्रदेश भाषा विभाग की पहाड़ी दिवस पर आयोजित संगोष्ठियों में भी इस विषय पर बहस हुई। ‘दिव्य हिमाचल’ के प्रतिबिंब स्तंभ में इस विषय पर लेखकों के विचार पाठकों को पढ़ने-सोचने को मिले, जो इस भाषा के प्रति सामयिक चिंतन को रेखांकित करते हैं। वर्ष 2016 के मध्य हिमाचल-पहाड़ी भाषा को लेकर काफी गरमाहट

आशापूर्णा देवी बांग्ला भाषा की प्रख्यात उपन्यासकार हैं, जिन्होंने मात्र 13 वर्ष की आयु में लिखना प्रारंभ कर दिया था और तब से ही उनकी लेखनी निरंतर सक्रिय बनी रही। अपनी प्रतिभा के कारण उन्हें समकालीन बांग्ला उपन्यासकारों की प्रथम पंक्ति में गौरवपूर्ण स्थान मिला। उनके विपुल कृतित्व का उदाहरण उनकी लगभग 225 कृतियां हैं,

सावित्री बाई  भारत के पहले बालिका विद्यालय की पहली प्रिंसीपल और पहले किसान स्कूल की संस्थापक थीं। महात्मा ज्योतिबा सावित्री बाई के संरक्षक, गुरु और समर्थक थे। महात्मा ज्योतिबा को महिलाओं और दलित जातियों को शिक्षित करने के प्रयासों के लिए जाना जाता है। सावित्री बाई ने अपने जीवन को एक मिशन की तरह से

लाहौलां की कथा लोक कथाओं, लोकगीत, लोक संगीत, विश्वासों और आस्थाओं की यह सबसे बड़ी पूंजी भी है और ताकत भी कि इनकी जड़ें लोकमानस में गहरे से जुड़ी होती हैं। यह सामान्य लोक ही इनका संरक्षक भी है। ‘लाहौलां की कथा’ छपने पर शायद लेखिका सपना ठाकुर ने भी नहीं सोचा होगा कि इसकी

साहित्यिक लेखा-जोखा 2016 आज पहाड़ों का सीना छलनी हो रहा है तो इस थीम पर आधारित कविताएं वाहवाही लूट रही हैं । 70-80 के दशक में हिमाचल के दूरदराज के क्षेत्रों के जीवन पर लिखी कहानियां देश भर में धूम मचाए हुए थीं । अब मोबाइल और इंटरनेट की कहानियां आएंगी या फिर नोटबंदी के

बेटियां बेटियों के हिस्से में क्यों… आती हैं मजबूरियां… चलते चलते राह में क्यों आती है दुश्वारियां पग-पग पर जिम्मेदारियों, के बोझ तले दबे बचपन, यौवन और बुढ़ापा जीवन सारा दो नावों में सवार हिचकोले खाती बेटियां निभा जाती हैं रिश्तों को जैसे कांटों में फूलों की तरह… सागर में लहरों की तरह… हंसती, मुस्कराती,

जिला भाषा, कला एवं संस्कृति अधिकारी कांगड़ा के कार्यालय में क्रिसमस के अवसर पर कवियों की एक विशिष्ट महफिल सजी। इसमें जिला भर के विभिन्न स्थानों से आए हुए लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक कवि-कवयित्रियों ने बढ़-चढ़कर कर भाग लिया। कवि सम्मेलन की अध्यक्षता प्रतिष्ठित साहित्यकार डा. पीयूष गुलेरी ने की तथा इसके संचालन की