शैव और शाक्त धर्म अधिक लोकप्रिय हुए

शैव और शाक्त धर्म, जो प्रागैतिहासिक काल से ही यहां के लोक धर्म रहे, अधिक लोकप्रिय बनते गए। बहुत से कुषाण शासकों की भांति कश्मीर का हूण राजा मिहिरकुल और थानेश्वर के सम्राट हर्षवर्द्धन के पूवर्ज शिव उपासक थे। इस प्रकार राजकीय प्रोत्साहन से इन आदि धर्मों को मान्यता मिलने लगी…  

पूर्व मध्यकालीन हिमाचल

ह्वेनत्सांग ने यहां की जमीन को उपजाऊ बताया है। इस प्रदेश में तांबा तथा मणिभ होता है। जलवायु ठंडा तथा लोग परिश्रमी हैं। यहां पर पांच संघ विहार हैं, जिनमें भिक्षु रहते हैं। यहां पर दस देव मंदिर भी हैं, जिनमें विभिन्न धार्मिक भावनाओं के लोग पूजा- अर्चना करते हैं। यह प्रदेश उत्तर की ओर से उन हिमाच्छादित चोटियों से घिरा है, जहां स्वर्णगोत्र प्रदेश भी है। नाम के अनुसार ही इस प्रदेश से बढि़या किस्म का सोना आता है। ह्वेनत्सांग ने ब्रह्मपुर के राजा का उल्लेख नहीं किया है। स्पष्ट है कि ब्रह्मपुर का राजा भी हर्षवर्द्धन के अधीन रहा होगा। इस प्रकार से व्यास घाटी में जालंधर त्रिगर्त, सतलुज घाटी में शतद्रु और गंगा घाटी में ब्रह्मपुर के राजा कन्नौज के सम्राट हर्षवर्द्धन की राजसत्ता को मानते थे और कुलूत तथा स्त्रुध्न सीधे उसके नियंत्रण में थे। हर्षवर्द्धन की मृत्यु (सन् 647 ई.) के बाद उसका विशाल साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया। कन्नौज में हर्ष की मृत्यु के कुछ ही समय पश्चात एक शक्तिशाली शासक यशोवर्मन प्रकट हुआ। यशोवर्मन की हिमालय विजय का वर्णन, उसके राजकवि वाकपतिराज ने अपने प्राकृत ग्रंथ ‘जंदवाह’ में भी किया है। उस ग्रंथ में लिखा है कि उत्तरी तथा दक्षिणी भारत को जीतने के बाद वह श्री खंड, थानेश्वर तथा कुरुक्षेत्र होते हुए अयोध्या गया और फिर हिमालय खंड पर विजय पाई। चौथी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में जब हिमालय के जनपद गुप्त साम्राज्य के प्रभुत्व में आए, तो यहां की राजनीतिक तथा सांस्कृतिक विचारधारा में एक नया परिवर्तन आया। राजनीतिक परिवर्तन के फलस्वरूप, पश्चिमोत्तरी, मध्य हिमालय तथा नेपाल में प्राचीनकाल से चली आ रही लोकतंत्र प्रणाली के स्थान पर एक राजतंत्र की स्थापना हुई। ऐसा जान पड़ता है कि गुप्त राजाओं ने औदुंबर और कुलिंद जनपदों को तो अपने राज्य में मिला लिया, क्योंकि गुप्तकाल और उसके पश्चात के ग्रंथों में इन दो जनपदों का उल्लेख नहीं मिलता। त्रिगर्त, कुलूत, कार्तियपुर आदि जनपदों को संभवतः गुप्त तथा मौखरि सम्राटों ने अधिकार पत्र या पट्टे देकर उन्हें उनके राज्य को लौटा दिया और पीढ़ी- दर- पीढ़ी राज्य करने का अधिकार दिया। इससे इन छोटे-छोटे पर्वतीय राजाओं का गुप्त तथा मौखरि सम्राटों के राजप्रसादों में आना-जाना आरंभ हुआ और हर प्रकार से सांस्कृतिक आदान-प्रदान बढ़ने लगा। यथा राजा तथा प्रजा के कथनानुसार हिमालय की जातियों के भी मैदानी भाग में बसने वाले लोगों के साथ हर प्रकार के संबंध स्थापित होने के कारण उस समय यहां के इतिहास, सामाजिक जीवन और कला में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ। शैव और शाक्त धर्म, जो प्रागैतिहासिक काल से ही यहां के लोक धर्म रहे, अधिक लोकप्रिय बनते गए। बहुत से कुषाण शासकों की भांति कश्मीर का हूण राजा मिहिरकुल और थानेश्वर के सम्राट हर्षवर्द्धन के पूवर्ज शिव उपासक थे। इस प्रकार राजकीय प्रोत्साहन से इन आदि धर्मों को मान्यता मिलने लगी।

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