नई सरकार : आसां नहीं डगर

जयराम ठाकुर हिमाचल प्रदेश के नए मुख्यमंत्री होंगे। वह उस भाजपा का प्रतिनिधित्व करेंगे, जिसे प्रदेश की जनता ने प्रचंड बहुमत दिया है। जाहिर है, उनसे अपेक्षाएं भी अधिक होंगी। बेशक, जयराम ठाकुर को अपनी कार्यकुशलता उन समस्याओं को हल कर दिखानी होगी, जिनसे हिमाचली वर्षों से जूझ रहे हैं। जयराम ठाकुर की क्या होंगी चुनौतियां, बता रहे हैं

सुनील शर्मा…

केंद्र भी पहाड़ी राज्य के प्रोजेक्ट लटकाने में कहीं आगे है। भले ही इस मुद्दे पर अब सियासत गर्म हुई हो, मगर यह बात किसी से छिपी नहीं है कि एफसीए की शर्तों के चलते हिमाचल के जहां 200 मिनी व माइक्रो हाइडल प्रोजेक्ट दो सालों से लटके पड़े हैं। वहीं 150 से भी ज्यादा सड़कें अधर में हैं। केंद्र व हिमाचल सरकारें दोनों ही इस नजरिए से कम नहीं हैं। हिमाचल में पिछले 12 वर्षों से 9 बड़े टूरिज्म प्रोजेक्ट्स के लिए कड़ी शर्तों के चलते जहां निवेशक नहीं मिल पा रहे, वहीं बिजली महादेव, नयनादेवी, शाहतलाई, न्यूगल जैसे रोप-वे प्रोजेक्ट्स के प्रति कोई भी निवेशक आने को तैयार नहीं। जयराम सरकार के समक्ष अब ये सभी चुनौतियां रहेंगी कि इन्हें तत्परता से सुलझाए।  प्रदेश में 35 अन्य बड़े बिजली प्रोजेक्ट इन्हीं कड़ी शर्तों के कारण पांच वर्ष से भी ज्यादा अवधि से लटके हुए हैं। अब इनकी निविदाएं फिर से आमंत्रित करने की तैयारी है।  बीबीएमबी के मुद्दे पर भाजपा व कांग्रेस में सियासत गरमाती रही है। यह मामला सभी प्रदेश सरकारों ने केंद्र से उठाया, मगर केंद्र का रवैया नकारात्मक ही रहा। नतीजतन पहाड़ी प्रदेश को 4200 करोड़ की वह रकम नहीं मिल पा रही है, जो बीबीएमबी में 7.19 फीसदी की दर से हिस्सेदार राज्यों द्वारा देय है।  सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बावजूद पड़ोसी राज्य इसे मानने को तैयार नहीं। लिहाजा राज्य को दोबारा से विशेष याचिका दायर करनी पड़ी। सरकारों ने कई मर्तबा केंद्र से इस मामले में हस्तक्षेप का आग्रह किया, मगर नतीजा शून्य ही रहा। हिस्सेदार राज्य हिमाचल के प्रति किस तरह का रवैया रखते हैं, इसकी मिसाल रेल प्रोजेक्ट से भी ली जा सकती है। बद्दी-चंडीगढ़ प्रस्तावित रेल नेटवर्क के लिए हरियाणा जमीन उपलब्ध करवाने में आनाकानी कर रहा है। हिमाचल के अन्य रेल प्रोजेक्ट्स का आलम किसी से छिपा नहीं है।

ये बड़ी परियोजनाएं अधर में

नई योजना तैयार नहीं

औद्योगिक पैकेज की रियायतें ही 2020 तक हैं, ये भी पुराने प्रोजेक्टों के लिए। नए प्रोजेक्ट्स के लिए ऐसी कोई योजना नहीं है। केंद्र से विशेष औद्योगिक पैकेज को पुनर्जीवित करने के तमाम प्रयास औंधे मुंह गिरे हैं।

वन संरक्षण अधिनियम का अड़ंगा

वन संरक्षण अधिनियम के कारण न केवल सड़क, बल्कि हाइडल प्रोजेक्ट भी लटके पड़े हैं। यह ऐसा अधिनियम है, जिसमें संशोधन के लिए कई बार मांग उठ चुकी है, मगर समाधान नहीं निकलता।

क्लीयरेंस का पचड़ा

उत्तराखंड समेत अन्य पड़ोसी राज्यों में सरकारें करीबन सभी तरह की एनओसी निवेशकों को खुद मुहैया करवाती हैं। हिमाचल में ऐसा नहीं होता। सभी तरह की क्लीयरेंसिज के लिए निवेशक को भटकना पड़ता है। यह पहली बार हुआ है कि मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने ईको-टूरिज्म प्रोजेक्ट्स में क्लीयरेंसिज के लिए वन विभाग को अनुमति लेने के निर्देश दिए हैं।

बार-बार के चक्करों से परेशान निवेशक

हिमाचल की बात करें तो निवेशकों को आकर्षित करने के लिए भले ही सिंगल विंडो से लेकर 45 दिन के भीतर क्लीयरेंस के दावे किए गए हों, मगर निवेशकों का आरोप रहता है कि वास्तव में यह होता नहीं। उन्हें बार-बार चक्कर लगवाए जाते हैं। मझोले अफसरों की हेकड़ी के कारण उनके प्रोजेक्ट लटके रह जाते हैं।

एक अदद मनोरंजन पार्क तक नहीं

वर्ष 2004 से अब तक पांच बार प्रदेश में नौ बड़े टूरिज्म प्रोजेक्ट विज्ञापित किए गए थे। मगर इनके लिए निवेशक ही नहीं मिल पाए, जबकि जमीन भी पर्यटन विभाग मुहैया करवा रहा है। कारण एनओसी के लिए निर्धारित शर्तें, करोड़ों की धरोहर राशि बताई जाती है। इनमें फोसिल पार्क, गोल्फ कोर्स, हैल्थ टूरिज्म, साहसिक पर्यटन, वाटर स्पोर्ट्स व होटल से लेकर अर्बन हार्ट जैसी योजनाएं शामिल हैं।

छह साल से सियासत का अड्डा  बनी है सीयू

पिछले छह वर्षों से सियासत की भेंट चढ़ता रहा केंद्रीय विश्वविद्यालय का मुद्दा जयराम की सरकार बनते ही अब फिर गरमाएगा। नई सरकार इसे किस तरह से लेगी, इस पर नजरें होंगी। भाजपा व कांग्रेस के बीच सेंट्रल यूनिवर्सिटी की स्थापना को लेकर पिछले छह वर्षों से भी ज्यादा अवधि से सदन के अंदर व बाहर गरमाहट देखने को मिल रही है। भाजपा के कुछ नेता यह चाहते हैं कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी का मुख्य कैंपस देहरा में स्थापित हो, जबकि कांगड़ा से जुड़े भाजपा के ही कई नेता इस पर मौन साधे बैठे हैं।  भाजपा के वरिष्ठ नेता शांता कुमार की भी इस बारे में कोई बड़ी प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिलती है। राज्य सरकार द्वारा सेंट्रल यूनिवर्सिटी का मुख्य कैंपस जदरांगल धर्मशाला में स्थापित करने को लेकर विस्तृत रिपोर्ट कुछ अरसा पहले ही केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय को सौंपी गई थी। उसके बाद फोरेस्ट क्लीयरेंस के लिए प्रयास शुरू किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब हिमाचल दौरे पर आए थे, तो उस दौरान भी यह प्रयास था कि सेंट्रल यूनिवर्सिटी का शिलान्यास करवा लिया जाए, मगर बात आगे नहीं बढ़ सकी। हालांकि कांगड़ा के अधिकांश नेताओं का यह दावा रहता है कि धर्मशाला के लिए मंत्रालय भी सहमत है। सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऐसे स्थल पर ही स्थापित की जा सकती है, जहां बुनियादी सुविधाओं के साथ-साथ रहने की उच्च स्तरीय सुविधाएं मौजूद हों और साथ ही एयर कनेक्टिविटी भी हो। धर्मशाला में ऐसी तमाम सुविधाएं व स्तरीय होटल हैं, लिहाजा कैंपस यहीं स्थापित होना चाहिए। अब संबंधित फाइल कितनी तेजी से सरकेगी, यह देखना होगा।

अब क्या होगा…

विधानसभा के अंदर व बाहर केंद्रीय विश्वविद्यालय के मुद्दे पर पूर्व प्रतिपक्ष के नेता प्रो. धूमल, रविंद्र रवि के तेवर देखने काबिल रहे हैं। चुनावी बयार में विप्लव ठाकुर भी कांग्रेस से उलट भाषा बोलती रही है। अब देहरा में इस विश्वविद्यालय को लेकर नई जयराम सरकार की क्या स्थिति होगी, इस पर नजरें होंगी।

हिमाचल की सबसे बड़ी खामी

अफसरशाही निवेशकों को खूब घुमाती है। मझोले अफसर इसमें सबसे ऊपर रहते हैं। निवेशकों से धरोहर राशि करोड़ों में ली जाती है, जिससे वे कतराते हैं। सभी तरह की क्लीयरेंस के लिए भी उन्हें बाध्य किया जाता है। दावों के बावजूद 90 व 45 दिन में प्रोजेक्ट क्लीयर नहीं होते। लंबे समय के बाद सीएम पद पर नया चेहरा विराजमान हो रहा है। अफसरशाही के लिए भी चुनौती है। अफसरों को अब खुद को नए सिरे से साबित करना पड़ेगा। इससे पहले वीरभद्र और धूमल की च्वाइस के धड़े बने हुए थे, मगर अब अफसरों को नई च्वाइस शामिल होगी।

तो इस बार पहाड़ चढ़ेगी रेल

* नंगल-तलवाड़ा रेल लाइन के लिए 100 करोड़ का ऐलान था, वहीं भानुपल्ली-बिलासपुर के लिए 160 करोड़ का, जबकि चंडीगढ़-बद्दी के लिए 95 करोड़ देने का वादा किया गया था। इन सभी रेल लाइनों पर अत्यंत धीमी गति से काम चल रहा है।

* चंडीगढ़-बद्दी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकी है, क्योंकि हरियाणा द्वारा इस प्रोजेक्ट को जमीन देने में आनाकानी की जा रही है।

फरवरी में मोदी सरकार द्वारा पेश किए जाने वाले रेल बजट में हिमाचल की इस बार फिर उम्मीदें परवान चढं़ेगी या नहीं, इसे लेकर अभी से चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं। ऐसे प्रोजेक्ट पिछले 16 वर्षों से लटके पड़े हैं।  फरवरी में पेश होने वाले रेल बजट से उम्मीदें हैं कि भानुपल्ली-बिलासपुर रेललाईन लेह तक परवान चढ़ेगी, बद्दी औद्योगिक क्षेत्र चंडीगढ़ से जुड़ेगा, जोगिंद्रनगर-पठानकोट नैरोगेज लाइन ब्रॉडगेज होगी, ऊना से आगे हमीरपुर को दिशा मिलेगी। धार्मिक पर्यटन के साथ हेरिटेज रेललाइन को भी नया लुक मिलेगा। वैसे हिमाचल को अभी तक हर रेल बजट से पहले दिलासे ही मिलते रहे हैं।  अब केंद्र में मोदी सरकार है। प्रधानमंत्री का हिमाचल से गहरा नाता रहा है। इस लिहाज से भी उम्मीद है कि रेल प्रोजेक्ट सिरे चढ़ेंगे। उल्लेखनीय रहेगा कि पिछले बजट में रेल मंत्रालय ने 310 करोड़ से पठानकोट-जोगिंद्रनगर को ब्रॉडगेज करने की जहां घोषणा की थी, वहीं जोगिंद्रनगर से मंडी नई रेल लाइन अनुमोदित करने का ऐलान था। मगर इस बारे में भी हुआ कुछ नहीं। यह लाइन फिर से सर्वे तक सीमित है।

इसलिए जरूरी है रेल विस्तार

हिमाचल में न तो एयर कनेक्टिविटी सही है, न ही रेल कनेक्टिविटी। नतीजतन औद्योगिक व पर्यटन विकास बाधित होता है। बेरोजगारों को भी कोई राहत नहीं मिल पाती। रोजगार व स्वरोजगार के प्रदेश के पास सीमित साधन हैं।

शिमला-कालका ट्रैक सुधार के लिए अढ़ाई करोड़ खर्च करने की योजना थी। यानी इससे इस हेरिटेज लाइन का नवीनीकरण होना था, मगर इस पर भी कुछ नहीं हुआ।

मोदी मैजिक… पर लुढ़के दिग्गज

हिमाचल में 13वीं विधानसभा का किंग मेकर कौन है, इसे लेकर राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ पार्टी स्तर पर भी विश्लेषण हो रहा है।  यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किंग मेकर होते तो धूमल चुनाव न हारते। हमीरपुर में तीन सीटें कांग्रेस को न आती। कांगड़ा, मंडी और चंबा ने जयराम सरकार के लिए किंग मेकर की भूमिका निभाई। मोदी लहर में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की किस्ती न डूबती। प्रदेश भाजपा की जीत के पीछे मोदी लहर रही या प्रत्याशियों की अपनी छवि, इसे लेकर विश्लेषण शुरू हो चुका है। हालांकि भाजपा सम्मानजनक स्थिति में है, लिहाजा ज्यादातर लोग मानते हैं कि यह मोदी लहर का ही नतीजा रहा। जबकि कुछ नेता ऐसे भी हैं, जिनका मानना है कि इस चुनाव में व्यक्तिगत छवि ने काफी काम किया, वरना कई नए चेहरे जीत न पाते।  पार्टी ने जो सर्वेक्षण करवाया था, वह भी अब सही साबित हुआ। सबसे ज्यादा दिक्कतें भाजपा को सोलन व सिरमौर में हुई हैं। हमीरपुर में भी पार्टी आशातीत सफलता हासिल नहीं कर सकी।  बिलासपुर में श्रीनयना देवी व घुमारवीं में कांग्रेस व भाजपा प्रत्याशियों की जीत ने सभी को चौंकाया है। यहां जेपी नड्डा ने भाजपा प्रत्याशियों के पक्ष में घुमारवीं सदर, झंडूता व श्रीनयनादेवी में खूब प्रचार किया था। हालांकि उनके जिम्मे सभी चुनाव क्षेत्र थे, मगर उन्होंने अंतिम दौर में अपने जिला को भी तवज्जो दी थी। उनकी धर्मपत्नी मल्लिका नड्डा ने भी अंत तक मोर्चा संभाले रखा।  चर्चा यह भी है कि यदि यह मोदी लहर होती तो भाजपा के दिग्गज लुढ़कते न। सुजानपुर से राजेंद्र राणा विजयी नहीं हो पाते।  भाजपा ने शुरू से ही इन चुनावों को जीतने के बाद आक्रामक प्रचार किया। कांग्रेस इस प्रचार के आगे कहीं भी टिकी नहीं दिख रही थी। प्रबंधन की दृष्टि से भाजपा का प्रचार सुनियोजित भी था। उसके केंद्रीय नेता फील्ड में दिख रहे थे, जबकि कांग्रेस में ऐसा कुछ नहीं था। बावजूद इसके भाजपा के दिग्गजों का लुढ़कना किसी को भी रास नहीं आ रहा।

पैसे की तंगी में दबे टनल प्रोजेक्ट

हिमाचल में भूतल एवं परिवहन मंत्रालय ने नेशनल हाई-वेज व फोरलेन प्रोजेक्ट्स के लिए जहां कई बड़े ऐलान किए हैं, जो सिरे चढ़ रहे हैं।  बावजूद इसके हिमाचल में पिछले 12 वर्षों से करोड़ों के, जो सुरंग प्रोजेक्ट लटके हैं, उन पर केंद्र का रवैया ढुलमुल है। हिमाचल आर्थिक दिक्कतों के चलते इन्हें सिरे नहीं चढ़ा पा रहा। जयराम सरकार के लिए प्रोजेक्ट इसलिए भी महत्त्वपूर्ण होंगे, क्योंकि बर्फबारी व भारी बरसात के कारण यहां सड़कों में टूट-फूट कहीं ज्यादा होती है। बारह महीने आवाजाही सरल रहे,इसी मकसद से इन प्रोजेक्ट्स को बड़े कंसल्टेंट्स से तैयार करवाया गया था। अब उम्मीद यही रहेगी कि केंद्रीय भूतल एवं परिवहन मंत्री  इस परिप्रेक्ष्य में भी हिमाचल की मदद करें।  क्योंकि कृषि-बागबानी व टूरिज्म के लिहाज से ऐसे प्रोजेक्ट लाजिमी समझे जाते हैं। वहीं पहाड़ों पर फासले कम करने के लिए ऐसे प्रोजेक्ट महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, मगर प्रदेश के लिए केंद्र इसे लेकर मददगार नहीं रहा है। सरकारों ने बीओटी के आधार पर भी इन बड़ी सुरंगों के निर्माण को सिरे चढ़ाने का प्रयास किया था। मगर यह फिजिबल नहीं हुआ। ये प्रोजेक्ट पिछले 12 सालों से सुर्खियों में हैं। हालांकि सभी प्रोजेक्टों की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार भी की जा चुकी है। बावजूद इसके फंडिंग के अभाव में ये सिरे नहीं चढ़ पा रहे हैं।

ये हैं प्रस्तावित सुरंगें

* रानीतालः लंबाई 270 मीटर, लागत 25 करोड़

* संजौली-ढलीः लंबाई 147.61 मीटर, लागत 23 करोड़

* हिमफेड पेट्रोल पंप-आईजीएमसीः लंबाई 890 मीटर, लागत 95 करोड़

* लिफ्ट-हिमफेड पेट्रोल पंपः लंबाई 1134.92 मीटर, लागत 98 करोड़

* लिफ्ट-लक्कड़ बाजारः लंबाई 681.25 मीटर, लागत 62 करोड़

* बंगाणा-धनेटाः लंबाई 1285 मीटर, लागत 145.46 करोड़

* जोगिंद्रनगर-भुभूजोतः लंबाई 3207 मीटर, लागत 367.12 करोड़

* होली-उतरालाः लंबाई 6905 मीटर

* खड़ा पत्थरः लंबाई 2840 मीटर

हारे हुए वरिष्ठ नेताओं की वसीयतें

प्रो. धूमल :

जिला में मेडिकल कालेज की प्राथमिकता, स्पाइस पार्क, सड़कों की दशा सुधारना, बस स्टैंड बनाना,सीएम पद के उम्मीदवार के रूप में स्थानीय प्राथमिकताएं थीं। अन्य नेताओं पर यह दबाव अब रहेगा।

जीएस बाली 

मुख्यमंत्री बनने की तमन्ना हार गई। लिहाजा नगरोटा के भाजपा विधायक को पद व प्रभाव देने की गुंजाइश। 

सुधीर शर्मा :

धर्मशाला को स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद चल रही थी। दूसरी राजधानी बनाने का भी ऐलान हो चुका था।  स्काई बस सेवा के साथ-साथ जाठियादेवी में टाउनशिप के काम शुरू नहीं हो पाए हैं, जबकि औपचारिकताएं लगभग पूरी हैं।

कौल सिंह ठाकुर :

भावी मुख्यमंत्री के तौर पर कौल सिंह का नाम भी आता रहा है, मगर वह खुद का चुनाव हार गए, लिहाजा मंडी अपना खोया पाना चाहता है।

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