महाभियोग के मामले में राजनीति खतरनाक

By: Apr 30th, 2018 12:07 am

कुलदीप नैयर

लेखक, वरिष्ठ पत्रकार हैं

महाभियोग वास्तव में एक गंभीर मसला है। इसका कभी भी राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। राहुल गांधी ने ऐसा कर दिया है। और उस हद तक उन्होंने न्यायपालिका को कमजोर किया है। चूंकि वह एक अखिल भारतीय दल का नेतृत्व कर रहे हैं, इसलिए उन्हें इस मामले में सजग होकर काम करना चाहिए था। मेरा विचार है कि सोनिया गांधी को इस मामले में राहुल गांधी को संविधान की आत्मा का सम्मान करने के प्रति निर्देशित करना चाहिए था। इसके बावजूद मैं यह कहूंगा कि मुख्य न्यायाधीश पद की गरिमा बनाए रखने में विफल हुए हैं। उन्होंने अपने कुछ फैसले देरी से किए…

यह पूरी तरह हेकड़ी है। यह सत्य है कि मुख्य न्यायाधीन दीपक मिश्रा ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश नारायण शुक्ला को एक मेडिकल कालेज चलाने वाले लखनऊ स्थित प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट पर अभियोग चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। परंतु यह कानून का ऐसा उल्लंघन नहीं है जिससे भारत के मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग चलाना पड़े। महाभियोग चलाना है अथवा नहीं, इस मामले पर कांग्रेस बंटी नजर आई। किंतु चूंकि इसके अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ जाने का निर्णय कर लिया, इसलिए संतुलित ढंग से चल रहे कपिल सिब्बल को भी इसी के पक्ष में आना पड़ा। कांगे्रस के एक अन्य वरिष्ठ नेता तथा अधिवक्ता अश्वनी कुमार ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह महाभियोग के अभियान से असुविधाजनक महसूस कर रहे थे। यहां तक कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम तथा अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी जैसे लोगों ने भी महाभियोग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किए। कांगे्रस के अन्य वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद राज्यसभा में राहुल गांधी के आदेश पर महाभियोग प्रस्ताव पढ़ रहे थे तथा उन्होंने इसके पक्ष में सदस्यों से हस्ताक्षर एकत्रित किए। यह अनिवार्य है कि ऐसे प्रस्ताव को संसद के ऊपरि सदन में रखना होता है। चूंकि राज्यसभा में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत हासिल नहीं है, इस तथ्य के कारण कांग्रेस व छह अन्य विपक्षी दल ऐसा प्रस्ताव  लाने के लिए प्रेरित हुए।

वांछित संख्या में हस्ताक्षर जुटाने के बावजूद राज्यसभा के चेयरमैन एम वैंकेया नायडू, जो मूलतः भाजपा से हैं, ने प्रस्ताव को सीधे खारिज कर दिया। उपराष्ट्रपति नायडू ने अपने 10 पृष्ठों के नोट में अपने फैसले की तत्परता स्पष्ट करते हुए कहा कि आरोपों में गंभीरता नहीं है तथा यह एक अनावश्यक अटकलबाजी अथवा परिकल्पना है। नायडू ने कहा कि प्रस्ताव में जो तथ्य दिए गए हैं, वे मुख्य न्यायाधीश को बुरे आचरण का दोषी ठहराते हुए उनके खिलाफ कोई निष्कर्ष निकालने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने यह फैसला देने से पहले कानूनी व संवैधानिक विशेषज्ञों तथा उस मीडिया का मत भी लिया जिसने महाभियोग प्रस्ताव की आलोचना की थी। केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली ने महाभियोग के इस नोटिस को बदला लेने के लिए आई याचिका कहा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और उसके साथी मुख्य न्यायाधीश, जो छह माह में सेवानिवृत्त होने वाले हैं, के खिलाफ महाभियोग को एक राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग करने की सोच रहे हैं। भारत का संविधान कहता है कि मुख्य न्यायाधीश पर महाभियोग केवल उसी स्थिति में चलाया जा सकता है जब वह बुरे आचरण अथवा अयोग्यता के आधार पर दोषी साबित हो जाए। विपक्ष ने पांच ऐसे आधार भी गिनवाए, जिन्हें कांग्रेस ने बुरे आचरण के बराबर माना। इनमें जो आधार शामिल हैं, वे हैं-चुनिंदा न्यायाधीशों को संवेदनशील मामले सुनवाई के लिए सौंपना तथा रोस्टर के मास्टर के रूप में अपनी पदस्थिति का दुरुपयोग करने के मामले में मुख्य न्यायाधीश के विरोध में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों का  सार्वजनिक रूप से उतर जाना आदि।

इसके अलावा कुछ न्यायाधीशों की ओर से न्यायाधीश बीएच लोया की संदिग्ध मौत का मामला उठाने को भी इस प्रस्ताव में आधार बनाया गया। यह एक अभूतपूर्व घटनाक्रम है। अब तक का भारतीय इतिहास बताता है कि यहां किसी भी मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव नहीं आया। राज्यसभा के चेयरमैन ने इस प्रस्ताव के नोटिस को राज्यसभा सचिवालय को इसलिए सौंप दिया ताकि वह यह जांच कर सके कि क्या नोटिस पर किए गए हस्ताक्षर सही हैं अथवा नहीं, साथ ही क्या इस प्रस्ताव को लाने में विधि-विधान का पूरा प्रयोग किया गया है अथवा नहीं। स्पष्ट है कि नायडू ने इस नोटिस को यकीनी नहीं माना। संविधान सभा में हुए वाद-विवाद से पता चलता है कि संविधान को बनाने वाले, जिनमें कई दलों के सदस्य शामिल थे, महाभियोग का अनुच्छेद जोड़ने के प्रति काफी सचेत थे। सदस्य नहीं चाहते थे कि महाभियोग को हल्के से लिया जाए। मुझे यह कहते हुए दुख हो रहा है कि इस मामले में कांग्रेस ने गंभीरता नहीं दिखाई तथा वह सजग होकर काम भी नहीं कर पाई। राहुल गांधी ने अपने समर्थक निष्ठावान नेताओं की भावनाओं के प्रति भी अपने व्यवहार के जरिए असम्मान दर्शाया है। इसके बावजूद एक बात स्पष्ट है। मुख्य न्यायाधीश ने अपने पद की गरिमा से समझौता कर लिया। वह पद की गरिमा को बनाए नहीं रख पाए। जैसा कि कुछ न्यायाधीशों ने आरोप लगाया है, मुख्य न्यायाधीश ने रोस्टर का उल्लंघन करते हुए चुनिंदा न्यायाधीशों व पीठों को संवेदनशील मामले सुनवाई के लिए सौंपे हैं, इस मामले में उनकी भूमिका कुछ संदिग्ध लगती है। इसके अलावा जब वह वकील थे, तो उन्होंने झूठा एफेडेबिट देकर भूमि की खरीद की थी। बेशक उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में आने के बाद वर्ष 2012 में यह जमीन लौटा दी। लेकिन ऐसा करने में उन्होंने बहुत समय लगा दिया तथा तब तक आबंटन को पहले ही रद किया जा चुका था। बेशक ऐसे कुछ मामले हैं जिनमें हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग चले। ऐसे मामलों में महाभियोग चलाने से पहले ही न्यायाधीशों ने अपने पद से स्वयं ही इस्तीफे दे दिए। मिसाल के तौर पर कोलकाता हाई कोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन ने संसद द्वारा किसी न्यायाधीश पर महाभियोग चलाने  का पहला मामला बनने की अपेक्षा अपने पद से त्यागपत्र देना ही ठीक समझा। उन्होंने ऐसा राज्यसभा द्वारा उनके खिलाफ बुरे आचरण पर पारित महाभियोग प्रस्ताव, जिससे वह पहले ऐसे न्यायाधीश बने जिन पर राज्यसभा ने कार्रवाई की, पास होने के बाद त्यागपत्र दे दिया। सेन पर यह आरोप सिद्ध हुआ था कि उन्होंने 1983 के एक केस में 33.23 लाख रुपए के आबंटन में हेराफेरी की तथा कलकत्ता की एक अदालत को गलत सूचना दी।

इसी तरह न्यायाधीश पीडी दिनाकरण, जो सिक्किम हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश थे, ने जुलाई 2011 में महाभियोग चलने से पहले ही त्यागपत्र दे दिया। इनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के लिए राज्यसभा के चेयरमैन ने एक न्यायिक पैनल का गठन कर दिया था। भ्रष्टाचार, जमीन छीनना तथा न्यायिक पद का दुरुपयोग, ये आरोप उनके खिलाफ लगे 16 आरोपों में से थे। हालांकि न्यायाधीश वी. रामास्वामी एकमात्र ऐसी मिसाल हैं, जिनके खिलाफ वर्ष 1993 में महाभियोग की कार्रवाई आगे बढ़ी। वह ऐसे जज बने। उनके खिलाफ लोकसभा में महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया, लेकिन इस प्रस्ताव को आवश्यक दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं हो पाया। वर्ष 1990 में पंजाव व हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के रूप में इनके खिलाफ कुछ अनियमितताएं साबित हुई थीं। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने भी एक प्रस्ताव पारित कर इनके खिलाफ महाभियोग लगाने की मांग की थी। महाभियोग वास्तव में एक गंभीर मसला है। इसका कभी भी राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए। राहुल गांधी ने ऐसा कर दिया है। और उस हद तक उन्होंने न्यायपालिका को कमजोर किया है। चूंकि वह एक अखिल भारतीय दल का नेतृत्व कर रहे हैं, इसलिए उन्हें इस मामले में सजग होकर काम करना चाहिए था। मेरा विचार है कि सोनिया गांधी को इस मामले में राहुल गांधी को संविधान की आत्मा का सम्मान करने के प्रति निर्देशित करना चाहिए था।

ई-मेल : kuldipnayar09@gmail.com

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