अंबेडकर को क्यों नापसंद था भारतीय संविधान

भारत द्वारा अपनाए गए संविधान को लेकर जो बात अंबेडकर को सर्वाधिक परेशान करती थी वह थी इसमें निहित बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism)। एक स्थायी हिंदू बहुल राष्ट्र के लिए वह ठीक नहीं समझते थे कि केवल बहुमत-सरकार की प्रणाली उचित थी। दरअसल उन्होंने संविधान सभा को भारत के संविधान के लिए एक पूरी तरह भिन्न व्यवस्था प्रस्तावित की थी बजाय उसके जो संसदीय प्रणाली के आधार पर अपनाई गई…

हमारा संविधान अंगीकार करने के मात्र तीन वर्ष बाद इसके मुख्य वास्तुकार बीआर अंबेडकर ने संसद में खुलेआम इसका परित्याग कर दिया था। वर्ष 1953 में एक चौंकाने वाली स्वीकारोक्ति में उन्होंने राज्यसभा में बेबाक कहाः

‘‘महोदय, मेरे मित्र मुझे कहते हैं कि मैंने संविधान बनाया है। परंतु मैं यह कहने के लिए पूरी तरह तैयार हूं कि इसे जला देने वाला मैं पहला व्यक्ति हूंगा। मैं इसे नहीं चाहता। यह किसी का भला नहीं करता।’’

अंबेडकर यह वकालत कर रहे थे कि राज्य सरकारों के ऊपर गवर्नरों को निरीक्षण की शक्ति देने के लिए संविधान बदला जाए। जबकि केवल चार वर्ष पूर्व, मई 1949 में, संविधान सभा में उन्होंने ठीक विपरीत तर्क दिया था कि ‘‘जनता द्वारा निर्वाचित एक गवर्नर और विधायिका के प्रति उत्तरदायी एक मुख्यमंत्री का सहअस्तित्व टकराव पैदा कर सकता है।’’ परंतु अब, वह राज्यसभा को बता रहे थे कि ‘‘हमें यह विचार विरासत में मिला है कि गवर्नर के पास कोई शक्ति होनी ही नहीं चाहिए।  वह एक रबड़ स्टैंप होना चाहिए। अगर एक मंत्री, चाहे वह कितना भी धूर्त हो… गवर्नर के समक्ष कोई प्रस्ताव रखता है, उसे यह स्वीकृत करना होगा। ऐसी है लोकतंत्र के प्रति हमारी संकल्पना जिसे हमने इस देश में विकसित किया है।’’

‘‘परंतु आपने इसका समर्थन किया था,’’ एक सदस्य बोले। अंबेडकर टूटकर पड़े, ‘‘हम वकील कई चीजों का बचाव करते हैं। लोग हमेशा मुझे कहते रहते हैं, ‘अरे! आप संविधान निर्माता हैं।’ मेरा जवाब है मैं भाड़े का श्रमिक था। जो मुझसे करने के लिए कहा गया, मैंने काफी कुछ अपनी इच्छा के विपरीत किया।’’

सदस्य भौचक्के रह गए। एक ने पूछा, ‘‘आपने अपने आकाओं की इस प्रकार सेवा क्यों की?’’ अंबेडकर ने गुस्से से जवाब दिया, ‘‘आप अपनी त्रुटियों के लिए मुझे दोष देना चाहते हैं? यही आपका आम तरीका है, मैं यह जोड़ना चाहूंगा।’’ सदन में व्यवस्था कायम की गई। परंतु गवर्नरों को वीटो शक्ति देने का अंबेडकर का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया गया।

सच्चाई यह थी कि अंबेडकर का वक्त गुजर चुका था। संविधान के विषय में उनकी चिंताएं कभी सार्वजनिक ही नहीं हुईं। उनका हिंदू कोड बिल अस्वीकार होने पर वह कैबिनेट से पहले ही त्यागपत्र दे चुके थे। फिर 1952 और 1954 में लोकसभा सांसद बनने के प्रयास में दो बार हारे भी। हालांकि संसद से बाहर अंबेडकर संविधान की आलोचना पुरजोर करते थे। वर्ष 1953 के एक साक्षात्कार में उन्होंने बीबीसी को बतायाः ‘‘भारत में लोकतंत्र नहीं चल पाएगा, इस साधारण कारण के चलते कि हमारा सामाजिक ढांचा संसदीय लोकतंत्र के साथ बिलकुल मेल नहीं खाता।’’ वर्ष 1956 में उनका निधन हो गया। भारत द्वारा अपनाए गए संविधान को लेकर जो बात अंबेडकर को सर्वाधिक परेशान करती थी वह थी इसमें निहित बहुसंख्यकवाद (Majoritarianism)। एक स्थायी हिंदू बहुल राष्ट्र के लिए वह ठीक नहीं समझते थे कि केवल बहुमत-सरकार की प्रणाली उचित थी। दरअसल उन्होंने संविधान सभा को भारत के संविधान के लिए एक पूरी तरह भिन्न व्यवस्था प्रस्तावित की थी बजाय उसके जो संसदीय प्रणाली के आधार पर अपनाई गई।

अंबेडकर का ‘संयुक्त राज्य भारत’ अंबेडकर ने अपनी योजना को ‘संयुक्त राज्य भारत’ का नाम दिया। यह प्रस्ताव उन्होंने बतौर प्रारूप समिति अध्यक्ष काम शुरू करने से मात्र सात माह पूर्व संविधान सभा की मूलभूत अधिकारों पर बनाई गई उपसमिति के समक्ष प्रस्तुत किया था।

अंबेडकर का ‘संयुक्त राज्य भारत’ प्रस्ताव कई मायनों में अमरीका की सरकार की प्रणाली के समान था। यह राज्यों को अधिक स्वतंत्रता देने वाला एक वास्तविक संघ का गठन करता था। यही कारण था अंबेडकर गवर्नरों को विवेकाधीन शक्तियां देना चाहते थे। संयुक्त राज्य भारत की कार्यकारी शक्ति यानी राष्ट्र प्रमुख का निर्वाचन मात्र बहुमत रखने वाली पार्टी नहीं, बल्कि संपूर्ण विधायिका द्वारा, पद पर एक निश्चित अवधि के लिए किया जाना था। इसमें न्यायिक शक्ति एक पूरी तरह स्वतंत्र सर्वोच्च न्यायालय में निहित थी। और मूल अधिकारों की सूची अमरीका के बिल ऑफ राइट्स के समान। यहां तक कि अंबेडकर की भाषा भी अमरीका के डिक्लेरेशन ऑफ इंडीपेंडेंस की तरह थी। उन्होंने लिखा कि ‘‘ब्रिटिश प्रकार की कार्यपालिका अल्पसंख्यकों के जीवन, स्वतंत्रता और प्रसन्नता के लिए खतरों से भरी होगी।’’

कार्यकारी शक्ति — यानी बहुमत पार्टी के नेता द्वारा बतौर प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री चलाए जाने वाली कैबिनेट — अंबेडकर की मुख्य चिंता का कारण थी। उनका मानना था कि इसका ढांचा मात्र अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए ही नहीं बल्कि सरकारों में स्थायित्व प्रदान करने के लिए बहुत मायने रखता था।

‘‘यह स्पष्ट है’’ उन्होंने लिखा ‘‘कि अगर ब्रिटिश प्रणाली की नकल हुई तो इसका परिणाम होगा एक सांप्रदायिक बहुमत को कार्यकारी शक्तियां स्थायी रूप से अधिकृत करना।’’ और सरकारों के स्थायित्व के लिए उनका डर था कि ‘‘जातियों और पंथों में संघर्षों के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियों की बहुतायत होना निश्चित है। अगर ऐसा हुआ तो यह संभव ही नहीं, निश्चित नहीं, कि संसदीय कार्यपालिका की प्रणाली के अंतर्गत भारत अस्थिरता से पीडि़त रहेगा।’’

यह पहली बार नहीं था कि अंबेडकर ने भारत के संविधान के लिए ये विचार प्रस्तावित किए हों। वर्ष 1945 में भारत की मूलभूत समस्याओं पर एक भाषण में भी उन्होंने स्पष्ट कहाः ‘‘बहुमत का शासन सैद्धांतिक रूप में अस्थिर और व्यवहारिकता में अनुचित है।’’ उन्होंने उन सिद्धांतों की रूपरेखा बनाई जिन पर भारतीय सरकार आधारित होनी चाहिएः 1) ‘‘कार्यकारी शक्ति विधायी शक्ति से कहीं अधिक महत्त्व रखती है’’; 2) ‘‘कार्यपालिका बहुमत दल की एक समिति नहीं होनी चाहिए’’; और 3) ‘‘कार्यपालिका गैर-संसदीय होनी चाहिए कि यह हटाई न जा सके।’’

यहां तक कि अंबेडकर इन सुझावों को अंग्रेजों के पास ले गए। अगर स्वतंत्रता का अर्थ केवल-बहुमत की सरकारें लाना ही था, वह स्वतंत्रता की बजाय ब्रिटिश राज को तरजीह देने की असाधारण हद तक जा पहुंचे। ब्रिटिश वायसरॉय के साथ एक गुप्त बैठक में अंबेडकर ने स्पष्ट कहा कि ‘‘भारत में संसदीय प्रणाली नहीं चलेगी।’’ वायसरॉय ने पूछा कि क्या वह ऐसा सबके सामने कहेंगे, जिस पर अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह ‘‘पूरा जोर देकर’’ ऐसा करने को तैयार होंगे। पेचीदा प्रश्न यह है कि अंबेडकर ने संविधान सभा में बहुमत की सरकारों वाली संसदीय प्रणाली का समर्थन क्यों किया। आखिरकार संविधान सभा की सबसे महत्त्वपूर्ण समितियों में वह नेहरू के साथ बैठे थे, और यह उनके द्वारा बनाया गया प्रारूप था जो अंत में अंगीकृत हुआ।

सब अटकलबाजियां हैं, परंतु लोगों ने इस प्रश्न के उत्तर तीन प्रकार से दिए हैं कि क्यों अंबेडकर संसदीय सरकारों के विरोध का अपना पुराना रुख बदल इसके मुख्य समर्थक बन गए। पहला, वह संविधान सभा में कांग्रेस पार्टी के समर्थन से शामिल किए गए थे। सदन में कांग्रेस के प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए वह स्वयं कर्त्तव्यबद्ध थे। दूसरा, उन्हें नेहरू ने कैबिनेट में विधि मंत्री के पद की पेशकश की थी। उन्हें लगा इससे वह देश और अपने वर्ग के हितों की सेवा जारी रख पाएं। और तीसरा, अंबेडकर अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी गांधी के प्रभाव को संविधान से दूर रखना चाहते थे। वह मानते थे कि गांवों को भारतीय सरकार की नींव बनाने संबंधी गांधी के विचार अपरिपक्व और अत्यधिक प्रयोगात्मक थे। आज 70 वर्षों के कुशासन और बढ़ते जातीय व सांप्रदायिक तनावों के बाद यह कहना ठीक लगता है कि हमारे मौजूदा संविधान की अंबेडकर द्वारा आलोचना जायज थी। अब हम भारतीयों को यह तय करना होगा कि क्या हम वोट पाने के लिए अंबेडकर के अनुयायी होने का ढोंग करते रहेंगे, या हम सचमुच उनकी सलाह पर चलेंगे।

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल’

लेखक, चर्चित किताब ‘व्हाई इंडिया नीड्ज दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ के रचनाकार हैं

अंगे्रजी में ‘दि क्विंट’ में अंबेडकर जयंती 14 अप्रैल 2018 को प्रकाशित

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