चुनावी सीजन में बेकाबू होती महंगाई

अनुज कुमार आचार्य

लेखक, बैजनाथ से हैं

अफसरों की चुनावों में व्यस्तता के कारण इन दिनों हिमाचल प्रदेश के बाजारों में महंगाई बेलगाम होती जा रही है। ऐसे लगता है जैसे फल एवं सब्जियों के विक्रेताओं में नियम-कायदे और कानून का कोई खौफ  नहीं है और वह मनमाने दामों पर सब्जियां और फल बेचकर मोटा मुनाफा कमाने में जुटे हुए हैं। गरीब एवं मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इन दिनों 80 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रहे मटर, टिंडे, शिमला मिर्च और बींस जैसी सब्जियों को खरीदना मात्र हसरत भर बनकर रह गया है…

हिमाचल प्रदेश सहित भारतवर्ष में 17 वीं लोकसभा की चुनावी गहमागहमी के बीच इन दिनों अप्रैल महीने में ही सब्जियों के दाम आसमान को छू रहे हैं जोकि अमूमन प्रचंड गर्मी और बरसात के दिनों में देखने को मिलते थे। इस समय सभी प्रमुख राजनीतिक दल जहां केंद्र में नई सरकार बनाने की जद्दोजहद में जुटे पड़े हैं तो वहीं प्रशासनिक अमले पर इन चुनावों को सफलतापूर्वक संपन्न करवाने के साथ-साथ बढ़ती गर्मी के बीच मतदान प्रतिशत को बढ़ाने की महती जिम्मेदारी भी है। अफसरों की चुनावों में व्यस्तता के कारण इन दिनों हिमाचल प्रदेश के बाजारों में महंगाई बेलगाम होती जा रही है। ऐसे लगता है जैसे फल एवं सब्जियों के विक्रेताओं में नियम-कायदे और कानून का कोई खौफ  नहीं है और वह मनमाने दामों पर सब्जियां और फल बेचकर मोटा मुनाफा कमाने में जुटे हुए हैं। गरीब एवं मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए इन दिनों 80 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रहे मटर, टिंडे, शिमला मिर्च और बींस जैसी सब्जियों को खरीदना मात्र हसरत भर बनकर रह गया है।

ऊपर से तुर्रा यह है कि प्रशासनिक कार्रवाई जुर्माने तथा दंड अथवा लाइसेंस कैंसिल होने का कोई डर न रहने के चलते शायद ही किसी सब्जी-फल विक्रेता ने अपनी दुकान में इनके दामों को प्रदर्शित करने वाला बोर्ड लगाने की जहमत उठाई हो। चुनावी सीजन के बीच में मार्च महीने में थोक महंगाई दर बढ़कर 3.18 फीसदी पर पहुंच गई है। थोक महंगाई में वृद्धि की सबसे बड़ी वजह खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में तेजी को बताया गया है। भारत सरकार के श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के शिमला स्थित श्रम ब्यूरो द्वारा प्रत्येक महीने के आखिरी दिन में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित खुदरा महंगाई के आंकड़े जारी किए जाते हैं। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा प्रत्येक महीने की 12 तारीख को खुदरा महंगाई दर और 14 तारीख को थोक महंगाई दर के आंकड़े जारी किए जाते हैं। हालांकि यदि हम 2006 से जुलाई 2009 के बीच छठे वेतन आयोग के बाद जारी महंगाई भत्ते की दर जो उस समय 27 फीसदी थी से सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद इसी समयावधि में केंद्र द्वारा जारी महंगाई भत्ते की तुलना करें तो यह आज मात्र 12 प्रतिशत है यानी केंद्र सरकार की नीतियों के चलते कहीं न कहीं महंगाई दर काफी नीचे है तथापि इन दिनों चुनावी हलचल के बीच खाद्य पदार्थों विशेषकर सब्जियों के दामों में हुई बेतहाशा वृद्धि कहीं न कहीं आम गरीब आदमी को तकलीफ  पहुंचाने वाली है। 

इस बात से भी सभी भलीभांति परिचित ही हैं कि आम आदमी तक सामान पहुंचने से पहले दलालों एवं बिचौलियों और आढ़तियों की जेबें गर्म हो चुकी होती हैं जबकि किसानों को कभी भी उनके उत्पादों के सही दाम नहीं मिलते हैं। उल्टे खून-पसीना बहाने वाले इन किसानों की कमर कर्ज की मार से झुकी रहती है। रिटेल बाजार में खाद्य पदार्थों और सब्जियों के दाम चाहे कितने भी क्यों न बढ़ जाएं लेकिन किसान वर्ग को इसका फायदा कभी भी नहीं मिलता है। इसके विपरीत जमाखोरों-स्टोरियों द्वारा जमकर खाद्य वस्तुओं की जमाखोरी की जाती है और बाजार में वस्तुओं का कृत्रिम अभाव पैदा कर महंगाई को बढ़ाकर चोखा मुनाफा कमाया जाता है। विश्व बैंक के अनुसार 1990 में वैश्विक गरीबी 36 प्रतिशत थी जो 2015 में लगभग 10 फीसदी रह गई थी। विश्व बैंक ने प्रतिदिन 1.25 डालर से कम में जीवनयापन करने वालों को अति गरीब माना है।

दुनिया की 64 प्रतिशत अति गरीब आबादी महज 5 देशों भारत, चीन, नाइजीरिया, बांग्लादेश और कांगो में रहती है और उनमें भी भारत में 33 फीसदी अति गरीब लोग रहते हैं। जाहिर है अभी हमारी सरकारों को गरीबी समाप्त करने के उपायों को गंभीरता से लागू करना होगा। गरीबी की वजह से ही भारत में कुपोषित लोगों में वृद्धि हुई है। वैश्विक स्तर पर अगले 15 सालों अर्थात् 2030 तक वैश्विक गरीबी खत्म करने के लक्ष्य को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ के 193 देशों ने वैश्विक विकास के 17 नए लक्ष्यों को अपनाने का संकल्प लिया है। इसे टिकाऊ विकास लक्ष्य (एसडीजी) का नाम दिया गया है। इसके लिए 2030 तक पहले नंबर पर पूरे विश्व में किसी भी तरह की गरीबी को खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है तो दूसरे स्थान पर भुखमरी तथा कुपोषण के उन्मूलन को रखा गया है। लगभग डेढ़ वर्ष पहले केंद्र सरकार द्वारा एक नई प्रणाली जिसे सामान्य मानक प्रक्रिया का नाम दिया गया था, को लागू करने का प्रस्ताव विचाराधीन था। इसके अंतर्गत जैसे ही किसी सामग्री के दाम 50 फीसदी से ज्यादा बढ़ते तो सरकार द्वारा उस उत्पाद के निर्यात पर रोक लगाने की बात कही गई थी।

वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा कई मौकों पर मूल्य वृद्धि के चलते इस फार्मूले को लागू किया गया है और महंगाई को काबू में लाने की कोशिशें हुई हैं। आज संपन्न नागरिकों को भी चाहिए कि वह वस्तुओं के संग्रह की प्रवृत्ति से बचें और महंगाई को दूर करने में सरकार का सहयोग करें। पहले से ही कम वस्तुओं को बेकार और बर्बाद न करें, विशेषकर शादियों, घरेलू कार्यक्रमों और धार्मिक उत्सवों में अन्न और सब्जियों की बर्बादी न करें। अधिकारियों से उम्मीद है कि वह खाद्य वस्तुओं विशेषकर फल-सब्जियों की उपलब्धता पर नजर रखने के साथ-साथ उनके दामों को नियंत्रण में रखते हुए सब्जी विक्रेताओं को प्रतिदिन के भावों को लिखकर बोर्ड पर प्रदर्शित करने के लिए कहेंगे ताकि गरीब एवं सामान्य जनता को उनके हाथों से लूटने से बचाया जा सके।

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