चुनावी जमीं पर कृषि की उपेक्षा

कर्म सिंह ठाकुर

लेखक, सुंदरनगर से हैं

 

कृषि प्रधान देश में किसान की समस्याएं राजनीतिक मंच पर चर्चा का कारण क्यों नहीं बन पा रही हैं, विचारणीय विषय है। मूल तथा वास्तविक समस्याओं से राजनीति कोसों दूर जा चुकी है…

कृषि हिमाचल प्रदेश के लोगों का प्रमुख व्यवसाय है और प्रदेश की अर्थव्यवस्था में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। राज्य के कुल राज्य घरेलू उत्पाद का लगभग नौ प्रतिशत कृषि तथा इससे संबंधित क्षेत्रों से प्राप्त होता है। प्रदेश के कुल 55.67 लाख हेक्टेयर भौगोलिक क्षेत्र में से 9.55 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को 9.61 लाख किसानों द्वारा जोता जाता है। करीब 10 फीसदी क्षेत्र ही कृषि योग्य है। 86.4 फीसदी छोटे तथा सीमांत किसान हैं, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है, इसमें से लगभग 68.3 फीसदी के पास एक हेक्टेयर से भी कम भूमि है तथा 18.9 फीसदी के पास 1-2 हेक्टेयर भूमि है। प्रदेश में कम भूमि वाले किसानों की संख्या बहुत ज्यादा है। 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 90 फीसदी जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है। इस ग्रामीण जनसंख्या के पास छोटे-छोटे टुकड़ों में भूमि है, जो मुख्य तौर पर वर्षा पर ही निर्भर है। कृषि व बागबानी पर प्रदेश के लोगों की निर्भरता अधिक है और कृषि से राज्य के कुल कामगारों में से लगभग 62 फीसदी को रोजगार उपलब्ध होता है।

कृषि राज्य की आय का भी प्रमुख स्रोत है। प्रदेश का एक बहुत बड़ा वर्ग कृषि व्यवस्था से अपनी आजीविका कमाता है। अब प्रदेश में कृषि क्षेत्र को बढ़ाया नहीं जा सकता, लेकिन उपलब्ध क्षेत्र में बेहतर तरीके से कृषि व्यवस्था को करने की तरकीब सीखनी जरूरी हो गई है। किसानों की भूमि को सबसे ज्यादा सिंचाई की आवश्यकता होती है। हिमाचल प्रदेश वैश्विक कृषि पटल पर आलू के बीज का घर, मशरूम सिटी, सोलन गोला टमाटर तथा अदरक के लिए जाना जाता है। बागबानी के क्षेत्र में हिमाचली सेब विश्वभर में प्रसिद्ध है।  प्रदेश फल राज्य तथा बीजों के घर के रूप में जाना जाता है। राज्य की सबसे महत्त्वपूर्ण फसल मक्का है, जिसके उत्पादन में उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब तथा राजस्थान के बाद हिमाचल पांचवें स्थान पर है, लेकिन प्रदेश में कोई भी बड़ा उद्योग नहीं है, जो किसानों की फसलों को सीधा खरीदकर अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार सके। प्रदेश की मिट्टी सोना उगलने में समर्थ है, लेकिन किसानों की समस्याओं का सुनियोजित व सुव्यवस्थित वैज्ञानिक समाधान न होने के कारण प्रदेश की कृषि व्यवस्था पिछड़ती जा रही है। बरसात के महीने में संपूर्ण प्रदेश में पर्याप्त वर्षा होती है, लेकिन वर्षा के जल को संग्रहित करने की प्रणाली प्रदेश के पास नहीं है। राज्य में औसतन 1251 मिलीमीटर वर्षा होती है। इस वर्ष हिमाचल प्रदेश में मानसून मौसम में सामान्य वर्षा की तुलना में 11 फीसदी अधिक वर्षा हुई है। यही कारण है कि इस वर्ष प्रदेश में गेहूं की बंपर फसल होने जा रही है। यदि बरसात के पानी को सही ढंग से संगठित करना हिमाचली किसानों को सिखाया जाए, तो सिंचाई से वंचित करीब 80 फीसदी भूमि से भी पर्याप्त फसल ली जा सकती है। किसानों को सुदृढ़ बनाने के लिए उनकी भूमि को सिंचाई व्यवस्था से जोड़ना जरूरी है। वर्ष 1962 में भारत-जर्मन सिंचाई परियोजना द्वारा बल्ह घाटी में किसानों को सिंचाई की व्यवस्था मुहैया करवाई गई। बल्ह घाटी के किसानों को इस परियोजना से बहुत लाभ मिला। छोटे-छोटे किसान भी नकदी फसलें, जैसे मटर, गोभी, टमाटर इत्यादि का उत्पादन करने लगे। आजकल बल्ह घाटी का मुख्य व्यवसाय कृषि व्यवस्था बन चुका है। इसका मुख्य कारण किसानों की भूमि को जल मुहैया करवाना है। आज बल्ह घाटी की कृषि व्यवस्था बाहरी राज्य के लोगों को रोजगार देने में भी सक्षम बन चुकी है, लेकिन इन किसानों की सबसे बड़ी समस्या विपणन प्रणाली की है। गत वर्ष बल्ह घाटी में टमाटर की बंपर फसल हुई थी, लेकिन बाजार में उचित मूल्य न मिलने के कारण किसानों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। प्रदेश में कहीं पर सिंचाई की व्यवस्था नहीं है, कहीं पर विपणन प्रणाली की, तो कहीं समय पर बीज तथा खाद उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। ये ऐसी समस्याएं हैं, जो हमारी कृषि व्यवस्था के सुदृढ़ीकरण को दीमक की तरह चाट रही हैं। आज का युवा महज पांच-सात हजार की नौकरी करने के लिए घर से कई किलोमीटर दूर जाकर निजी कंपनियों की रात-दिन गुलामी कर रहा है। हिमाचल में एक दशक पहले कृषि शान-ओ-शौकत का व्यवसाय माना जाता था, लेकिन पिछले कुछ समय से मौसम की मार, आवारा पशुओं की दहशत तथा समय के साथ वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा किसानों को प्रशिक्षित न करने के कारण कृषि व्यवस्था घाटे का सौदा बन गया है। यही सबसे बड़ा कारण रहा है कि युवा वर्ग ने कृषि से मुंह मोड़ लिया। वर्तमान में संपूर्ण हिमाचल राजनीतिक रंग में रंगा हुआ है। 17वीं  लोकसभा के प्रस्तावित 19 मई को होने वाले चुनावों के लिए प्रदेश के दोनों मुख्य दल भाजपा तथा कांग्रेस ‘दिन दोगुनी, रात चौगुनी’ मेहनत कर रहे हैं। इस चुनाव में व्यक्तिगत टिप्पणियां, परिवारवाद तथा सुर्खियां बटोरने वाली बयानबाजी मुख्य मुद्दे बने हुए हैं।

प्रदेश की वास्तविक समस्याएं तथा मूल मुद्दे गर्त में जा चुके हैं। यह लोकतांत्रिक देश के लिए अच्छा नहीं है। अब समय बदल चुका है। प्रदेश का बहुत बड़ा वर्ग शिक्षित है। प्रदेश का हर नागरिक यह चाहता है कि प्रदेश की मूल समस्याएं राजनीतिक मुद्दे बनें। प्रदेश के दोनों बड़े राजनीतिक दलों को किसानों, बेरोजगारी, बढ़ते भ्रष्टाचार, परिवहन आदि सामाजिक समस्याओं पर राजनीति करनी चाहिए, ताकि इससे उन लोगों का भला हो सके, जिनके माध्यम से राजनेता सत्ता के सिंहासन पर काबिज होते हैं। वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य स्वार्थपूर्ण राजनीति तथा सत्ता की लोलुपता की ही बातें कर रहा है। अन्नदाता की उपमा से प्रसिद्ध किसान की चिंता किसी को नहीं है। आज भी भारत की अर्थव्यवस्था कृषि अर्थव्यवस्था के नाम से जानी जाती है।

कृषि प्रधान देश में किसान की समस्याएं राजनीतिक मंच पर चर्चा का कारण क्यों नहीं बन पा रही हैं, विचारणीय विषय है। मूल तथा वास्तविक समस्याओं से राजनीति कोसों दूर जा चुकी है।  देश के हर आम आदमी को जागना होगा तथा देश की मूल समस्याओं के बारे में सोचने वाले व्यक्ति को ही नेतृत्व सौंपना होगा, तभी युवा वर्ग तथा किसान समृद्ध व खुशहाल बन पाएगा। युवाओं को सरकारी क्षेत्र में रोजगार मुहैया नहीं करवाए जा सकते हैं, तो सरकार को इन युवाओं को कृषि तथा पर्यटन व्यवस्था से जोड़ने की नीति अपनानी चाहिए, ताकि युवा वर्ग भी कृषि की अहमियत को समझने में सक्षम बन सके।

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