मानसून से पहले

यूं तो मानसून प्रकृति की इबादत है, फिर भी इसके नखरों और नीयत का कोई तयशुदा अंदाज नहीं। हम हर साल इसके आगमन का इंतजार करते हैं, ताकि जीवन चक्र की कलियां खिलती रहें, लेकिन अपनी शर्तों के मुताबिक मानसून अगर साल की प्रतीक्षा है, तो परीक्षा भी। इसीलिए हिमाचल के अतिरिक्त मुख्य सचिव डा. श्रीकांत बाल्दी द्वारा हाजिर प्रदेश का जायजा और दिशा-निर्देश समझने की जरूरत आम नागरिक को भी है। प्रकृति के साथ हुए खिलवाड़ की निशानियों में अब बरसात अगर कोहराम नहीं, तो इससे मुकाबला करने की चुनौती है ही। अगले पंद्रह दिनों की कार्ययोजना में ग्रामीण व शहरी निकायों की परिधि में सफाई अभियान को गति देने का मकसद यह है कि तमाम नालियां, नाले और गंदगी से अटी पड़ी जल निकासी की हर जगह को खाली कर दिया जाए। हो सकता है कि कुछ विभाग और प्रशासन मिलकर खर्च उठाने की जहमत उठाएं और सफाई का फावड़ा उठ जाए, वरना सामुदायिक भावना अब कहीं दुबक के सो गई है। शहरी या ग्रामीण परिवेश से दुश्मनी निभाते हमारा साल गुजर जाता है और फिर यह उम्मीद करते हैं कि बरसात हमारी गंदगी को कहीं नीचे ले जाएगी। इसीलिए हिमाचल के हर बांध में हम अपने कचरे का घर देख सकते हैं। धूमल सरकार ने पोलिथीन प्रतिबंधित करके जबरदस्त अभियान छेड़ा और जिसका सीधा लाभ मिला, लेकिन हम पुनः लौटकर हाथों में प्लास्टिक लिए घूम रहे हैं। कभी गांव की बावडि़यां या अन्य जलस्रोत जनता की जिम्मेदारी में साफ रहते थे, लेकिन अब सरकार की दिहाड़ी वहां भी लगती है। हिमाचल के कई इलाकों में प्राकृतिक जलस्रोतों से सिंचाई की अपनी व्यवस्था रही है, इनमें कूहलों का योगदान सर्वोपरि रहा, लेकिन अतिक्रमण दर्जनों निगल गया या लावारिस होकर ये सूख गईं। कुछ इसी तरह हिमाचल के शहरी विकास या सड़कों के किनारे हो रहे निर्माण ने मौसमी खतरा बढ़ा दिया है। एनजीटी की आपत्तियों को पर्यावरणीय दृष्टि से देखें तो हिमाचल का विकास मॉडल एक खतरनाक आपाधापी है। शिमला जैसे शहर की प्राकृतिक जल निकासी के स्थान पर खड़ी बहुमंजिला इमारतें या नई बस्तियों के आंचल में छुपी भौगोलिक छेड़खानी कब तक खामोश बैठेगी। रिवालसर या नड्डी जैसी झीलों के सूखने की वजह हमें मिलती नहीं, तो हर साल बरसात के बावजूद जल संग्रहण की हमारी नीति का व्यावहारिक पक्ष कब सामने आएगा। बेशक आपदा प्रबंधन की दृष्टि से राज्यव्यापी अलर्ट मानसून की खबर से पहरेदार बन जाए या पंद्रह दिनों में कुछ गंदे नाले साफ हो जाएं, लेकिन हमें जीने के लिए हर दिन प्रकृति का साथ देना पड़ेगा। हमारा विकास जिस ढर्रे पर जारी है या जहां समाज की आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा मुखातिब है, वहां निरंकुश होते इरादों को संयमित करना होगा, वरना अंबर का गुस्सा अब विस्फोटक होता जाएगा। अतिरिक्त मुख्य सचिव ने समय से पूर्व आगाह करते हुए एक साथ कई विभागों को जगाया है, लेकिन नागरिक समाज को अपने अस्तित्व के मानसून को समझना होगा। बारिश कोई गुनाह नहीं, बल्कि साल की रूटीन में प्रकृति का संतुलन व ऐसी आपूर्ति है, जो इनसान की गतिविधियों का मुआयना भी है। पर्वतीय परिवेश के हिमाचली दर्पण पर स्वच्छता अभियान की मर्यादा पर्यावरणीय संतुलन के साथ-साथ वक्त की जीवंतता को सार्थक बनाने का पैमाना भी है। ऐसे में बरसात से पहले फिर सोचने, समझने व सचेत होने का वक्त दस्तक दे रहा है, तो ये सारे कार्य जनभागीदारी से ओत-प्रोत करने होंगे। मौसम के हिमाचली अंदाज में पर्यटन की रूह न भटक जाए, इसलिए ट्रैकिंग, वाटर  राफ्टिंग तथा पैराग्लाइडिंग जैसे साहसिक करतबों में चौकसी बरतने के लिए और सशक्त होना पड़ेगा। आपदा प्रबंधन मात्र राज्य विषय नहीं, बल्कि हमारे आसपास की बदलती फिजाओं में प्राकृतिक स्वरूप को सुदृढ़ बनाए रखने की नई चुनौती है।

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