कृषि में स्वरोजगार के सुअवसर

अनुज कुमार आचार्य

लेखक, बैजनाथ से हैं

यह समय की मांग है कि कृषि विभाग अपनी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार करे, प्रदर्शनियां लगाए और सीनियर सेकेंडरी स्कूलों एवं सभी महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए एक दिवसीय कार्यशालाओं का आयोजन करे, जहां कृषि एवं बागबानी विभाग के वैज्ञानिक तथा विषयवाद विशेषज्ञ कृषि एवं बागबानी से संबंधित मुद्दों पर युवाओं को ज्ञान दें, उन्हें जागरूक करें…

हिमाचल प्रदेश में शून्य लागत प्राकृतिक खेती की परिकल्पना को मूर्त रूप देने वाले राज्यपाल आचार्य देवव्रत का मानना है कि किसानों के विकास में ही राष्ट्र का विकास निहित है। अपने अस्तित्व में आने के शुरुआती वर्षों में कृषि, शिक्षा, सड़क, औद्योगिक एवं आधारभूत संरचनाओं के क्षेत्र में हिमाचल प्रदेश पिछड़ा हुआ राज्य माना जाता था, लेकिन बीते 70 वर्षों में हालात बड़ी तेजी से बदले हैं और शिक्षा, सड़क एवं अन्य विकासात्मक पैमानों पर गत वर्षों में प्रदेश को प्राप्त 85 से ज्यादा अवार्ड इसकी सफलता को बयां करने के लिए पर्याप्त हैं। हिमाचल प्रदेश में कृषि कार्यों द्वारा लगभग 69 प्रतिशत आबादी को रोजगार मुहैया हो रहा है।  हिमाचल प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि कर्म से जुड़े क्षेत्रों का 15 फीसदी योगदान है। वर्तमान में प्रदेश में कुल 55,673 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के 10.4 फीसदी भू-भाग पर नौ लाख 40 हजार लोग खेती कर रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सरकार वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य लेकर चल रही है। इसके लिए सरकार ने 2019-20 के बजट में कई नई योजनाओं एवं कार्यक्रमों की शुरुआत के लिए कृषि, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण के मद में 3995 करोड़ रुपए आबंटित किए हैं।

इस बार के बजट में जयराम सरकार ने कृषि क्षेत्र के लिए मुख्यमंत्री खेत संरक्षण योजना के तहत कांटेदार तार, चेन, लिंक बाड़ लगाने के लिए 50 प्रतिशत आर्थिक सहायता देने, देशी नस्ल की गाय खरीदने के लिए 50 फीसदी उपदान देने, मुख्यमंत्री किसान एवं खेतिहर मजदूर जीवन सुरक्षा योजना में मिलने वाली राशि को दोगुना करने, 150 करोड़ रुपए से मुख्यमंत्री नूतन पोलीहाउस परियोजना शुरू करने, एंटी हेलनेट का बजट 20 करोड़ करने के अलावा मुख्यमंत्री खुंब विकास परियोजना शुरू करने जैसी कई नवीन घोषणाएं की  हैं। 1950 में प्रदेश का केवल 792 हेक्टेयर क्षेत्र बागबानी के अधीन था, जो अब बढ़कर 2.23 लाख हेक्टेयर हो गया है। 1950 में फल उत्पादन 1200 मीट्रिक टन था, जो अब बढ़कर 16.69 लाख मीट्रिक टन हो गया है। फल उद्योग से राज्य को लगभग अढ़ाई हजार करोड़ रुपए की घरेलू वार्षिक आय हो रही है। जहां तक हिमाचल प्रदेश में कृषि क्षेत्र की प्रगति का सवाल है, तो पिछले कुछ वर्षों से इस क्षेत्र में जहां व्यापक प्रगति देखने को मिल रही है, तो वहीं कुछ समस्याएं एवं चुनौतियां भी हमारे किसानों के सामने मुंहबाए खड़ी नजर आती हैं। आज हिमाचली किसानों को सर्वाधिक नुकसान आवारा पशुओं, उत्पाती बंदरों और सूअरों की टोलियां पहुंचा रही हैं, जिसकी वजह से प्रदेश का काफी बड़ा खेती योग्य क्षेत्र बंजर बनकर रह गया है। सरकार तो इस समस्या से निजात पाने के लिए भरसक प्रयास कर रही है, लेकिन अभी राहत मिलती नहीं दिखाई पड़ रही है। हिमाचल प्रदेश के कृषि विभाग द्वारा किसानों को मुफ्त मृदा जांच सुविधाएं उपलब्ध करवाने के लिए 11 मृदा जांच प्रयोगशालाओं के अलावा चार मोबाइल लैब भी जगह-जगह जाकर अपनी सेवाएं दे रही हैं। 991 विक्रय केंद्रों के माध्यम से 150 मीट्रिक टन कीटनाशक दवाइयों का वितरण किसानों के बीच में किया गया है। शिमला में कीटनाशक जांच प्रयोगशाला के अलावा पालमपुर में एक बायो कंट्रोल लैब स्थापित की गई है। हमीरपुर, सुंदरनगर और शिमला में गुणवत्ता नियंत्रण केंद्रों की स्थापना की गई है, जहां बीजों, उर्वरकों तथा कीटनाशकों की जांच की जाती है। फसलों के विविधीकरण परियोजना पर भी काम जारी है। इसके अलावा कृषि कार्यों को बढ़ावा देने के लिए कृषि विभाग द्वारा ‘रूरल इन्फ्रास्ट्रक्चर डिवेलपमेंट फंड’ परियोजना के अंतर्गत सिंचाई एवं जल उपलब्धता को मजबूती देने पर कार्य हो रहा है। स्प्रिंकल, ड्रिप, फार्म टैंक, उथले कुओं, ट्यूबवेल, पंपिंग मशीनरी इत्यादि लगाने के लिए 80 प्रतिशत उपदान राशि प्रदान की जा रही है। हिमाचल प्रदेश राज्य सहकारी विभाग विकास बैंक समिति द्वारा पिछले पांच दशकों से किसानों को लंबी अवधि के लिए आसान किस्तों और साधारण ब्याज दरों पर कृषि कार्य के लिए ऋण उपलब्ध करवाया जा रहा है।

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा वर्तमान समय में व्यापक स्तर पर इतनी योजनाएं कृषि कार्यों को बढ़ावा देने के लिए चलाई जा रही हैं कि सबका इस सीमित लेख में ब्यौरा देना असंभव कार्य है। यह समय की मांग है कि कृषि विभाग अपनी योजनाओं एवं कार्यक्रमों का व्यापक प्रचार-प्रसार करे, प्रदर्शनियां लगाए और सीनियर सेकेंडरी स्कूलों एवं सभी महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के लिए एक दिवसीय कार्यशालाओं का आयोजन करे, जहां कृषि एवं बागबानी विभाग के वैज्ञानिक तथा विषयवाद विशेषज्ञ कृषि एवं बागबानी से संबंधित मुद्दों पर युवाओं को ज्ञान दें, उन्हें जागरूक करें। चित्रों, वस्तुओं एवं कृषि यंत्रों का सजीव प्रस्तुतीकरण करके युवाओं को स्वरोजगार अपनाकर कृषि क्षेत्र में आने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।

बेरोजगार युवाओं को कृषि विश्वविद्यालय एवं बागबानी विश्वविद्यालयों के भीतर चल रहे अनुसंधान कार्यों की जानकारी देकर उनका ज्ञानवर्धन किया जा सकता है। बेरोजगारी का दंश झेल रही हमारी युवा पीढ़ी भी इन योजनाओं का लाभ उठाकर अनाज, फल, सब्जियों, दुग्ध उत्पादों, नकदी फसलों, मत्स्य पालन, मुर्गी पालन एवं मशरूम उत्पादन के क्षेत्रों में स्वयं को स्वरोजगार के लिए नियोजित करके आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ाने के साथ-साथ प्रदेश को भी अनाज, सब्जियां और फल उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बनाने में अपना सक्रिय योगदान दे सकती है।

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