न्यू पेंशन स्कीम में सुधार जरूरी

अनुज कुमार आचार्य

लेखक, बैजनाथ से हैं

केंद्र सरकार ने एक जनवरी 2004 के बाद सरकारी सेवा में आए केंद्रीय कर्मचारियों के लिए न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) को लागू किया था और उसके बाद योजना से जुड़े आवश्यक नीति एवं नियमों की व्यवस्था की थी, लेकिन हिमाचल प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने केंद्र से भी ज्यादा फुर्ती दिखाते हुए 15 मई 2003 से ही इसे प्रदेश के कर्मचारियों पर थोप दिया था…

पिछले कुछ वर्षों से केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा अपने कर्मचारियों के लिए लागू की गई न्यू पेंशन स्कीम की खामियां उजागर होने तथा सेवानिवृत्त हो रहे कर्मचारियों को मिल रही मुट्ठी भर पेंशन से सेवारत अथवा सेवानिवृत्ति की कगार पर खड़े कर्मचारियों का वृद्धावस्था जीवन संकट में है। केंद्र सरकार ने एक जनवरी 2004 के बाद सरकारी सेवा में आए केंद्रीय कर्मचारियों के लिए न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) को लागू किया था और उसके बाद योजना से जुड़े आवश्यक नीति एवं नियमों की व्यवस्था की थी। लेकिन हिमाचल प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने केंद्र से भी ज्यादा फुर्ती दिखाते हुए 15 मई 2003 से ही इसे प्रदेश के कर्मचारियों पर थोप दिया था। शुरुआती दौर में इस योजना के नफे-नुकसान के बारे में ज्यादा पता नहीं चलने के कारण न तो स्कीम का स्वागत हुआ और न ही विरोध नहीं हुआ। लेकिन जैसे-जैसे हिमाचल प्रदेश में बरसों अनुबंध फिर थोड़े वर्षों की नियमित सेवा के बाद कर्मचारी सेवानिवृत्त होने लगे और कर्मचारियों को मुट्ठी भर पेंशन मिलने लगी तो जाहिर है कि इस योजना का विरोध होना लाजिमी ही था।

सरकारी सेवा में अच्छा वेतन लेने के बाद जब आपको मात्र पंद्रह सौ, दो हजार रुपए जितनी मामूली पेंशन राशि और सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले अन्य लाभ भी ठीक से न मिलें तो उस कर्मचारी और उनके परिवारों की आर्थिक दुर्दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। स्थानाभाव के कारण इस स्कीम के तहत सेवानिवृत्त हो चुके उन कर्मचारियों की व्यथा का यहां उल्लेख करना संभव नहीं है जो आज चाय की दुकान अथवा कबाड़ी का धंधा करने के लिए अभिशप्त हैं, लेकिन यह भी सत्य है कि पुरानी पेंशन प्रणाली की बहाली को लेकर सरकारी कर्मचारी निरंतर सरकार के पास अपनी आवाज उठा रहे हैं और धरना-प्रदर्शन के साथ-साथ ज्ञापन आदि भी सौंपे गए हैं।  शिमला में चल रहे विधानसभा सत्र में विधायक राकेश सिंघा द्वारा ओल्ड पेंशन स्कीम की बहाली की मांग के जवाब में मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने प्रदेश के वित्तीय संसाधनों का हवाला देकर इस योजना की बहाली को लेकर अपनी असमर्थता जाहिर की है। अनेक सरकारी सेवकों की मांग है कि यदि सरकार न्यू पेंशन स्कीम के स्थान पर पुरानी परिभाषित पेंशन प्रणाली को लागू नहीं कर सकती है तो कम से कम न्यू पेंशन स्कीम में ही आवश्यक बदलाव जरूर किए जाएं। यह सही है कि सरकार ने न्यू पेंशन स्कीम में कुछ बदलाव किए हैं जैसे सरकार ने एनपीएस में अपना योगदान 10 से 14 फीसदी कर दिया है। इस फंड में जमा होने वाली राशि पर टैक्स छूट को धारा 80 सी के अधीन लाया गया है और सेवानिवृत्ति पर मिलने वाली 60 फीसदी राशि को करमुक्त कर दिया है। लेकिन पुरानी परिभाषित पेंशन प्रणाली के अधीन रिटायर होने वाले सरकारी सेवकों को आखिरी वेतन का 50 प्रतिशत पेंशन स्वरूप दिए जाने जैसी व्यवस्था एनपीएस में न होना न्यू पेंशन स्कीम की सबसे बड़ी खामी है जिसे दूर किए जाने की मांग सरकारी सेवक लगातार सरकार से कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायमूर्ति राधाकृष्ण और एके सीकरी की खंडपीठ ने भी अपने एक फैसले में माना है कि ग्रेच्युटी और पेंशन इनाम नहीं हैं बल्कि एक सरकारी सेवक लगातार निष्ठापूर्वक लंबी अवधि तक नौकरी करके मेहनत से यह लाभ अर्जित करता है और यह उसकी संपत्ति जैसा ही है। न्यू पेंशन स्कीम में मिलने वाली पेंशन हालिया दौर में सेवानिवृत्त होने वाले सरकारी सेवकों के मामले में इतनी मामूली है कि रिटायर हो रहे कर्मचारी इस बारे में सोच कर ही सहम जाते हैं। न्यू पेंशन स्कीम के अंतर्गत सरकारी कर्मचारियों को 60 वर्ष की आयु तक अंशदान करना आवश्यक है। केंद्र सरकार के कर्मचारी तो 60 वर्ष की आयु में ही रिटायर होते हैं लेकिन हिमाचल में 58 वर्ष की आयु में रिटायर करने का प्रावधान है।

एनपीएस के पिछले 14-15 सालों का टे्रक रिकार्ड बताता है कि इसमें वृद्धि दर ग्रोथ सालाना प्रति एनएवी एक रुपया है यानी योजना के शुरुआती वर्षों में एनपीएस का एक शेयर 10 का था वह 15 वर्षों बाद मात्र 24 या 25 रुपए तक पहुंचा है। निवेशकों का रुपया सुरक्षित रखने के चलते और सरकारी बांडों में रुपया लगाने के कारण इसकी वृद्धि दर बेहद कम है। इस वजह से सेवारत सरकारी सेवकों का फंड इतना नहीं बढ़ पाता है कि उन्हें रिटायरमेंट पर आकर्षक पेंशन मिल पाए। अनेक सरकारी सेवकों का मानना है कि भले ही न्यू पेंशन स्कीम में उनका योगदान लिया जाता रहे लेकिन उन्हें उनकी सेवानिवृत्ति पर आखिरी वेतन की 50 प्रतिशत राशि पेंशन के रूप में दी जानी चाहिए।

आज की तारीख में सरकारी कर्मचारियों की आय के अधिकतर रुपए उनके बच्चों की पढ़ाई पर खर्च हो रहे हैं। वह अपने बच्चों की शादी, मकान बनवाने और कार खरीदने के बारे में सोचें भी तो कैसे सोचें। जिस प्रकार से चुने हुए प्रतिनिधियों को आकर्षक पेंशन मिलने की व्यवस्था है, कम से कम वैसी नहीं तो फिक्स्ड सम्मानजनक पेंशन का प्रावधान सरकारी सेवकों के लिए होना ही चाहिए ताकि वे भी अपनी सेवानिवृत्ति के बाद गरिमापूर्वक सिर उठाकर सुरक्षित वृद्धावस्था का जीवन जी सकें। यह वक्त का तकाजा है कि सरकार अपने परिवार के महत्त्वपूर्ण अंग सरकारी सेवकों को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद भी सम्मानपूर्वक जीवनयापन करने हेतु कम से कम नई पेंशन प्रणाली में आवश्यक सुधारों को लागू करे और  सरकारी सेवकों की पेंशन संबंधी चिंताओं का समाधान भी करे। 

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