एड्स के प्रति रहें जागरूक

Nov 30th, 2019 12:05 am

अनुज कुमार आचार्य

लेखक, बैजनाथ से हैं

एड्स एक जानलेवा बीमारी है जो एचआईवी संक्रमण के कारण मानव की रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम कर देती है। एचआईवी के मामलों में वृद्धि को देखते हुए भारत सरकार ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य देश में एचआईवी एवं एड्स की रोकथाम एवं नियंत्रण संबंधी नीतियां तैयार करना, उनका कार्यान्वयन करना है। एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा टेलीविजन एवं रेडियो पर नियमित रूप से इस विषय से संबंधित कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं, जिसमें असुरक्षित यौन संबंधों से बचने, कंडोम के इस्तेमाल, एड्स पीडि़त लोगों से भेदभाव पूर्ण व्यवहार खत्म करने, समेकित परामर्श एवं परीक्षण केंद्रों की स्थापना, एचआईवी और एड्स के प्रति भ्रांतियों का निराकरण, यौन संक्रमित रोगों के उपचार, रक्त आदान-प्रदान संबंधित सुरक्षा इत्यादि पर विस्तार से चर्चा की जाती है। इसके अलावा समाचार पत्रों में विज्ञापनों के माध्यम से भी जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं। विश्व एड्स दिवस 1988 के बाद से पहली दिसंबर को प्रत्येक वर्ष मनाया जाता है। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य एचआईवी संक्रमण के प्रसार की वजह से एड्स महामारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। ऐसा अनुमान है कि भारत में 15 से 49 वर्ष के आयु वर्ग के लगभग 25 लाख लोग एड्स से पीडि़त हैं। भारत में एचआईवी का पहला मामला 1986 में सामने आया था। शुरुआती वर्षों में इस बीमारी के बारे में ज्यादा जानकारी न होने के चलते और कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध न होने के कारण यह बीमारी बड़ी तेजी से फैली और इस बीमारी से पीडि़त लोगों को हमने तिल-तिल कर मरते देखा है। यूएन एड्स की एक रिपोर्ट के अनुसार कुल 35 मिलियन एचआईवी एड्स ग्रसित लोगों में से 19 मिलियन लोगों को यह पता ही नहीं है कि उनमें यह वायरस मौजूद है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार सब सहारा अफ्रीका में 24.7 मिलियन एड्स पीडि़त हैं जो विश्व में पाए जाने वाले एड्स मरीजों का कुल 71 प्रतिशत है। भारत में भी 2.1 मिलियन लोग एचआईवी ग्रसित हैं और इस मामले में संख्या के लिहाज से भारत का पूरी दुनिया में तीसरा स्थान है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम के तहत किए गए एड्स रोकथाम संबंधी विभिन्न उपायों एवं नीतियों का ही यह प्रभाव रहा है कि वर्ष 2000 में एड्स प्रभावित लोगों की संख्या 24.1 से घटकर 2011 में 20.9 लाख रह गई है। एंटीरेट्रोवायरल थैरेपी ‘एआरटी’ के प्रयोग में आने के बाद से एड्स से मरने वालों की संख्या में कमी आई है। एड्स के लक्षण दिखने में 8 से 10 वर्ष तक का समय लग सकता है। यह मानव शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को इस हद तक कम कर देता है कि इसके कारण मानव शरीर अन्य बीमारियों से लड़ पाने में अक्षम हो जाता है। आज विश्व के 33.4 लाख बच्चे एचआईवी से प्रभावित हैं जबकि भारत की 99 फीसदी जनसंख्या अभी एड्स से मुक्त है। यद्यपि एड्स एक ला इलाज बीमारी है फिर भी एड्स पीडि़त व्यक्ति सामान्य जीवन जी सकता है। एचआईवी संक्रमित होने का मतलब जीवन का अंत नहीं है, चिकित्सीय मदद एवं दवाइयों के बलबूते एड्स पीडि़त व्यक्ति लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जी सकता है। भारत में कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं एचआईवी-एड्स के उन्मूलन हेतु राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के साथ मिलकर काम कर रही हैं। एड्स और एचआईवी को लेकर जहां तक हिमाचल प्रदेश का सवाल है तो प्रदेश में इसका पहला मामला 1986 में सामने आया था। हिमाचल प्रदेश में राज्य एड्स कंट्रोल सोसायटी की स्थापना की गई थी। 31मार्च 2017 तक प्रदेश में एड्स के 3531 और एचआईवी के 9141 मामले सामने आए थे। हिमाचल प्रदेश में अभी एचआईवी और एड्स पीडि़तों की कुल संख्या 4200 के आसपास है। चूंकि कांगड़ा और हमीरपुर में एड्स पीडि़तों के मामले ज्यादा हैं तो इन जिलों में ज्यादा जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। स्टेट एड्स कंट्रोल सोसायटी की तरफ  से ऊना, बिलासपुर, मंडी, टांडा, शिमला और हमीरपुर में एआरटी सेंटर खोले गए हैं जहां एड्स पीडि़तों को निःशुल्क दवाइयां दी जाती हैं। सोसायटी की तरफ  से पीडि़त मरीजों को घर से आने जाने का खर्च भी दिया जाता है। हालिया दिनों में हिमाचल प्रदेश में 300 बच्चों और कुछ साधु बाबाओं के भी एचआईवी पीडि़त होने की खबरें मीडिया में आई हैं। इसके पीछे बच्चों के माता-पिता और साधुओं द्वारा नशे के इंजेक्शन आदि लेना को मुख्य वजह माना जा रहा है तथापि ऐसे मामलों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश में एचआईवी और एड्स पीडि़त रोगियों के उपचार के लिए टीआईपी के 18 केंद्र, एआरटी के 3 सेंटर, लिंक आर्ट सेंटर 7, आईसीटी के 45 सेंटर, मोबाइल आईसीटीसी 2, एसटीआई-आरटीआई क्लिनिक्स 20, ब्लड बैंक 18, बीसीएसयू 3, ब्लड डोनेशन मोबाइल वैन-1 और ब्लड ट्रांसपोर्टेशन वैन-4 सेवारत हैं। राज्य एड्स कंट्रोल सोसायटी ने प्रदेश में 45 जगहों पर एचआईवी टेस्ट करवाने की सुविधाएं उपलब्ध करवाई हुई हैं। राज्य सरकार ने हिमाचल प्रदेश को 2025 तक एड्स मुक्त बनाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए हिमाचल प्रदेश सरकार, स्वास्थ्य विभाग, राज्य एड्स कंट्रोल सोसायटी, विभिन्न संगठन और स्कूल-कालेज इस दिशा में मिलजुल इस महामारी को जड़ से उखाड़ने के लिए जागरूकता फैलाने में लगे हुए हैं। लाल फीता एड्स का अंतरराष्ट्रीय चिन्ह है। केवल जागरूकता से ही इस लाइलाज बीमारी की गिरफ्त में आने से बचा जा सकता है और इसके लिए जरूरी है कि समाज का पढ़ा-लिखा तबका भी एड्स और एचआईवी जैसी बीमारी के खात्मे में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए। मीडिया का योगदान तो जागरूकता के जगाने में शुरू से ही रहता आया है।

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