अर्द्धसैनिक बलों को मिले न्याय

Feb 15th, 2020 12:06 am

अनुज कुमार आचार्य

लेखक, बैजनाथ से हैं

आजादी के बाद हुई लड़ाइयों और आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में भारतीय सशस्त्र सेनाओं के 25,942 जवानों के साथ अर्द्धसैनिक बलों के भी लगभग 31,895 जवान शहीद हुए हैं। कर्त्तव्य निष्ठा, ड्यूटी और संख्या बल के मामले में अर्द्धसैनिक बलों को भारतीय सशस्त्र सेनाओं के छोटे भाई के समकक्ष ही माना जाता है, लेकिन वेतन-भत्तों, पेंशन, स्वास्थ्य एवं अन्य सुविधाओं के मामले में इनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होने के कारण केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के सेवारत और भूतपूर्व सेनानियों में असंतोष है…

भारतीय सशस्त्र सेनाओं के लगभग 14 लाख अधिकारी और जवान बाहरी आक्रमण की स्थिति में भारत की अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं तो वहीं भारत की आंतरिक सुरक्षा, एकता और अखंडता को सुनिश्चित बनाए रखने की महती जिम्मेदारी केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल के लगभग 10 लाख अफसरों और जवानों के कंधों पर रहती आई है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल भारत सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन आते हैं और इन बलों के पूर्णतया प्रशिक्षित जवान 24 घंटे देश की हिफाजत में अविरल चौकस ड्यूटी देते हैं। आजादी के बाद हुई लड़ाइयों और आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों में भारतीय सशस्त्र सेनाओं के 25,942 जवानों के साथ अर्द्धसैनिक बलों के भी लगभग 31,895 जवान शहीद हुए हैं। कर्त्तव्य निष्ठा, ड्यूटी और संख्या बल के मामले में अर्द्धसैनिक बलों को भारतीय सशस्त्र सेनाओं के छोटे भाई के समकक्ष ही माना जाता है, लेकिन वेतन-भत्तों, पेंशन, स्वास्थ्य एवं अन्य सुविधाओं के मामले में इनके साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होने के कारण केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के सेवारत और भूतपूर्व सेनानियों में असंतोष है। ब्यूरो ऑफ  पुलिस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट की रिपोर्ट के अनुसार घटिया सामाजिक परिवेश, प्रोमोशन की कम संभावनाएं, अधिक काम, गश्त और बढ़ते ड्यूटी के घंटे, तनावग्रस्त माहौल में ड्यूटी देना, पर्यावरणीय बदलाव, कम वेतन-भत्ते तथा मामूली पेंशन, घटिया खाना, छुट्टी मिलने में अड़चनें, अकेलापन, सीनियर्स द्वारा प्रताड़ना के कारण इन बलों के जवानों का मनोबल गिरा है। इनकी नेचर ऑफ  ड्यूटी बिलकुल अलग होने के बावज़ूद इन्हें वेतन-भत्तों और पेंशन के मामले में भी केंद्र सरकार के सिविलियन कर्मचारियों के समकक्ष रखकर इनके साथ घोर अन्याय किया जा रहा है। जनवरी 2017 की स्थिति के अनुसार केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों की स्वीकृत संख्या 10,78,514 थी जिसमें से 1,58,591 अर्थात 15 फीसदी पद रिक्त चल रहे थे। अर्द्धसैन्य बलों के जवानों पर काम का दबाव इतना ज्यादा है कि उन्हें 15 से 18 घंटे ड्यूटी देनी पड़ती है। तनाव के कारण आत्महत्या या अपने ही साथियों को मारने की घटनाएं बढ़ी हैं। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के उच्च पदों पर बैठे आईपीएस अफसरों को इन अर्द्धसैनिक बलों के जवानों  की समस्याओं की ज्यादा जानकारी और पीड़ा नहीं है। इन बलों के 80 फीसदी जवानों को अपने परिवारों के साथ रहने का मौका नहीं मिलता है क्योंकि यहां पीस पोस्टिंग की अवधारणा नहीं है। सेना की तरह जवानों को मिलने वाली पुरानी पेंशन प्रणाली के विपरीत पैरामिलिट्री फोर्सेस के जवानों को एक जनवरी 2004 से सेवानिवृत्ति के बाद न्यू पेंशन स्कीम के अंतर्गत रखा गया है जिसे इनके साथ घोर अन्याय ही माना जाना चाहिए। इनके काम की चुनौतियों को देखते हुए और जिंदगी के खतरे को देखते हुए इनको मिलने वाला इंश्योरेंस कवर भी अपर्याप्त है। देश की आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियों के दृष्टिगत और आतंकवाद की बढ़ती घटनाओं के कारण इन्हें लगातार आपरेशंस में रहना पड़ता है। सख्त नौकरी, सुविधाओं में कमी, परिवार से दूरी और तनाव आदि ऐसे मुख्य कारण हैं जिसकी वजह से इन बलों के जवान समय से पहले नौकरी छोड़ रहे हैं। सीआरपीएफ,  आईटीबीपी, बीएसएफ, एसएसबी और सीआईएसएफ के महानिदेशक आईपीएस कैडर के ऑफिसर होते हैं। कार्य संस्कृति के हिसाब से देखें तो पैरामिलिट्री बलों का गृह मंत्रालय से अलग मंत्रालय बनाया जाना समय की मांग है।

अपर महानिदेशक और महानिदेशक रैंक स्तर पर पहुंचने वाले आईपीएस अफसरों की बजाय सेना की तर्ज पर इन बलों का भी अपने केडर से ही महानिदेशक पद तक पदोन्नति का प्रावधान होना चाहिए। केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों के अधिकारियों और जवानों को भी भारतीय सशस्त्र सेनाओं की तर्ज पर वेतन, आकर्षक  भत्ते, पुरानी पेंशन, सुविधायुक्त कैंप, अच्छा लाइफ स्टाइल, बेहतर कर्त्तव्य निर्वहन माहौल  और सेवाकाल एवं सेवानिवृत्ति के बाद बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं आदि मिलनी चाहिए।  हिमाचल प्रदेश में सीजीएचएस की एकमात्र डिस्पेंसरी शिमला में है जबकि कांगड़ा, चंबा और हमीरपुर जिलों में भी बड़ी संख्या में केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अफसर और जवान निवास करते हैं। छोटी-मोटी बीमारी की हालत में वे शिमला नहीं जा सकते हैं। लिहाजा सरकार को चाहिए कि वह केंद्र सरकार को हिमाचल प्रदेश में जिलावार सीजीएचएस डिस्पेंसरी खोलने के लिए राजी करे। इन पुलिस बलों की कैंटीन में वस्तुओं पर लगने वाले जीएसटी को भी खत्म किया जाना चाहिए। हिमाचल में केंद्रीय पुलिस बलों की मास्टर कैंटीन या डिपो खोलने की मांग पर भी विचार होना चाहिए। भूतपूर्व सैनिकों की तर्ज पर हिमाचल में भी केंद्रीय सैनिक बलों के अधिकारियों और जवानों के लिए पेंशन अदालत लगाने की व्यवस्था हो। इसके अलावा अर्द्धसैनिक बल के जवान की मृत्यु होने पर सेना की तरह अंतिम संस्कार हेतु 10 हजार रुपए की सहायता राशि भी मिलनी चाहिए। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की भर्तियों में हिमाचल का कोटा कम हुआ है, इसलिए इन भर्तियों में हिमाचल की जनसंख्या के स्थान पर मैरिट के आधार पर पदों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा हिमाचली नौजवानों को रोजगार प्राप्त हो सके। इसलिए यह वक्त का तकाजा है कि केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की नौकरी को भी आकर्षक और सुविधाओं से परिपूर्ण बनाने के लिए केंद्र सरकार शीघ्र ही व्यवस्था करे। वहीं ओआरओपी, सीजीएचएस स्वास्थ्य सुविधाओं को प्राथमिकता के आधार पर इन बलों के हक में लागू किया जाए तो इन पुलिस बलों के माध्यम से राष्ट्र सेवा करने वाले अफसरों और जवानों का मनोबल भी ऊंचा रहेगा।

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