आत्मनिर्भर आर्थिकी के निहितार्थ

By: May 20th, 2020 12:05 am

कुलभूषण उपमन्यु

अध्यक्ष, हिमालय नीति अभियान

स्वचालित तकनीकों को उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित कर देना होगा जहां और कोई विकल्प संभव न हो या खतरे वाला काम हो। सूक्ष्म और कुटीर उद्योगों को गांव-गांव में स्थापित करना होगा ताकि गांवों से शहरों को रोजी की तलाश में पलायन न हो और शहर में झुग्गी बस्तियों में अमानवीय हालात में जीवन जीने को बाध्य न होना पड़े। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में किसी देश का अन्यायी कब्जा न हो, बल्कि आदान-प्रदान के आधार पर सबकी जरूरतें पूरी हो सकें…

कोरोना संकट के बीच अर्थ व्यवस्था को नई दिशा देना और नई दिशाओं की तलाश समय की जरूरत बन गई है। आत्मनिर्भर अर्थ व्यवस्था की अहमियत समझ में आ रही है। असल में आत्मनिर्भर या स्वावलंबी अर्थ व्यवस्था बड़ा बुनियादी और व्यापक विचार है। यह वैश्विक महत्त्व का विचार है। हर देश यदि आत्मनिर्भर अर्थ व्यवस्था बनाने और बनवाने में रुचि लेने लगेगा तो ही शांति और सद्भाव पर आधारित विश्व व्यवस्था खड़ी हो सकती है। यदि सब देश आत्मनिर्भरता को आदर्श मानेंगे तो आर्थिक गलाकाट प्रतिस्पर्धा और आर्थिक शीत युद्ध की स्थितियां बन ही नहीं सकती। आर्थिक शीत युद्ध तो इसी आधार पर खड़े होते हैं कि हमीं इतना ज्यादा उत्पादन कर लेंगे कि सारी दुनिया के बाजारों और उत्पादन व्यवस्थाओं पर कब्जा कर लेंगे। फिर उन आर्थिक रूप से कमजोर देशों को अपने इशारों पर नचाना या गुलाम बनाना आसान हो जाएगा। यही आर्थिक लालच और विस्तारवाद सारी समस्याओं और युद्धों का अधिष्ठान है। स्वावलंबी अर्थ व्यवस्था इस अधिष्ठान को नष्ट करने से शुरू होती है या इस अधिष्ठान को नष्ट करने की शुरुआत कर सकती है। स्वावलंबन की शुरुआत ऊपर से निर्णय लेकर तो हो सकती है, किंतु उसकी स्थापना का कार्य तो गांव के स्तर पर ही शुरू करना पड़ेगा। हर गांव स्वावलंबी होगा तो ही सब स्वावलंबी गांवों से मिल कर बना देश स्वावलंबी होगा। भारत के संदर्भ में स्वावलंबन का अर्थ होगा क्रमशः गांव, पंचायत, जिला, राज्य और फिर देश स्तर पर स्वावलंबन की व्यवस्थाएं खड़ी की जाएं। किंतु  इस बात का यह अर्थ नहीं कि ये सब इकाइयां अपने-अपने दड़बे तक सीमित होंगी, बल्कि उनमें आपस में स्वावलंबन की स्थिति प्राप्त करने के लिए जरूरी आदान-प्रदान बड़े पैमाने पर होगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपने-अपने देश की सामाजिक व्यवस्था के अनुसार हर देश नीचे से ऊपर की ओर इकाइयों का निर्धारण करके स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ सकता है। फर्क केवल यह होगा कि हर देश अपनी-अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कार्यरत होगा, दूसरे देशों की उत्पादन व्यवस्था पर कब्जा करने के लिए या विस्तारवाद के लिए कोई स्थान इस व्यवस्था में नहीं होगा। भले ही यह आदर्शवादी विचार लगता है, किंतु आदर्शों की दिशा में बढ़ने के प्रयासों से ही नई दिशाओं और स्थितियों को प्राप्त किया जा सकता है। हां आदर्श पूरी तरह से तो प्राप्त नहीं होते, किंतु उनके नजदीक भी बने रहें तो हालात में बड़े बदलाव देखने को मिल जाते हैं। इस दिशा में बढ़ने के लिए निःसंदेह संयुक्त राष्ट्र संघ को भी नई भूमिका देनी होगी, जो सभी देशों से सहयोग प्राप्त कर सकने में सक्षम हो। फिर सीमाओं पर बड़ी-बड़ी सेनाओं को रखने की जरूरत नहीं होगी। सामान्य सीमा पुलिस से ही काम चल जाएगा और वह बचे हुए साधन जन कल्याण में प्रयोग किए जा सकेंगे। गांधी जी ने जब स्वावलंबन की बात की थी तो उसमें अहिंसक विश्व व्यवस्था कायम करने का विचार और तत्त्व भी मौजूद थे। आदिम युग में कबीले आपस में लड़ते थे। संसाधनों पर कब्जे के संघर्ष जिसका कारण रहे होंगे। कबीलाई संघर्ष के युग के बाद धार्मिक और सांस्कृतिक विस्तारवाद के नाम पर खुली लूट का युग आया। इसके बाद औद्योगिक क्रांति ने आक्रामक उत्पादन व्यवस्था कायम की, जिसने स्थानीय कुटीर उद्योगों पर आधारित स्वावलंबी अर्थ व्यवस्था को नष्ट करके केंद्रित उत्पादन व्यवस्था खड़ी कर दी। इसके बल पर उपनिवेशवाद फूला-फला। उपनिवेशों के बाजारों पर कब्जा करके मनमाना लाभ कमाया गया और उपनिवेशों के लोगों को मानवोचित सम्मानजनक जीवन जीने से भी वंचित किया गया। अगला युग व्यापार के माध्यम से, बिना किसी देश को गुलाम बनाए दूसरे देशों के संसाधनों और उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री से लाभ कमाने का शुरू हुआ है। इसमें एक देश दूसरे देश के बाजारों पर कब्जा करने की होड़ में लगा है। इस होड़ में कोई व्यवधान न आ जाए, इसके लिए बड़ी-बड़ी सेनाएं रखने और जटिल तकनीकों पर आधारित अस्त्र-शस्त्र बनाने की जरूरत हो गई है। शस्त्रों से आत्मरक्षा के साथ दूसरे छोटे या कमजोर देशों को डराने और उन्हें ही शस्त्र बेच कर भारी मुनाफे पर शस्त्र बेचने का व्यवसाय भी चल निकला है। इस व्यवस्था का बड़ा नुकसान प्रकृति को भी झेलना पड़ रहा है। प्रकृति का शोषण सीमाएं लांघ चुका है। विश्व स्तर पर स्वावलंबी अर्थ व्यवस्था की बात का अर्थ है प्रकृति के शोषण के बजाय प्रकृति मित्र विकास का मॉडल खड़ा करना और आक्रामक उत्पादन पद्धति से हट कर सूक्ष्म और कुटीर उद्योगों के स्तर पर उत्पादन व्यवस्था खड़ी करना जिसमें ज्यादा से ज्यादा लोगों को काम मिल सके। स्वचालित तकनीकों को उन्हीं क्षेत्रों तक सीमित कर देना होगा जहां और कोई विकल्प संभव न हो या खतरे वाला काम हो। सूक्ष्म और कुटीर उद्योगों को गांव-गांव में स्थापित करना होगा ताकि गांवों से शहरों को रोजी की तलाश में पलायन न हो और शहर में झुग्गी बस्तियों में अमानवीय हालात में जीवन जीने को बाध्य न होना पड़े। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में किसी देश का अन्यायी कब्जा न हो, बल्कि आदान-प्रदान के आधार पर सबकी जरूरतें पूरी हो सकें। गांधी जी ने मशीनों का जो विरोध किया था, वह इसी समझ पर आधारित था कि मशीन आक्रामक उत्पादन पद्धति को जन्म देगी जो बड़े संघर्षों की जन्मदाता साबित होगी। प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध इसी आक्रामक उत्पादन पद्धति के परिणाम थे और तीसरा युद्ध यदि होगा तो इसी का दुष्परिणाम होगा। गांधी जी ने मशीन को मानव को गधा मजूरी से बचाने और खतरनाक काम से मुक्त करने के साधन के रूप में मान्यता देने की बात की थी, जिस विचार में मशीन की सीमा क्या होगी यह विचार अंतरनिहित था। मशीन ने दूसरा बड़ा नुकसान प्रकृति के निर्बाध शोषण के रूप में किया है, क्योंकि मशीन ने बंधुआ शक्ति आदमी के हाथ में दे दी है, जिस पर नियंत्रण आदमी की लालची प्रवृत्ति के चलते संभव नहीं है। इसका रास्ता तो मानवीय व्यवस्था को ऊंचे नैतिक धरातल पर ले जाकर सोचने से ही हासिल हो सकेगा। आज जब कोरोना ने हमें नए सिरे से बड़ी सारी चीजों के बारे में सोचने पर बाध्य किया है तो कुछ ऐसा नवोन्मेषी और साहसिक क्यों न सोचा जाए? घरों को पलायन करके गांव-गांव पहुंची श्रम शक्ति को काम और रोजी का साधन उपलब्ध करवाने के लिए भी यह कारगर दिशा हो सकती है। हां, एक कार्य इस स्थिति में बहुत जरूरी हो जाता है। वह है सूक्ष्म और कुटीर स्तर पर उत्पादन व्यवस्था के लिए आधुनिक तकनीकों को छोटे पैमाने पर उपलब्ध करवाना। इसके लिए नए नवाचारों की खोज के लिए ढांचा खड़ा करना होगा ताकि प्रतिस्पर्धा में भी खड़े होने की सामर्थ्य इस क्षेत्र को हासिल हो सके। बड़े पेचीदा उत्पादों को छोड़ दें तो दैनिक उपभोक्ता वस्तुओं में से अधिकांश का उत्पादन सूक्ष्म और कुटीर क्षेत्र में संभव है। कुटीर उत्पादन और ग्रीन उत्पादन नई सोच का ध्वजवाहक मंत्र हो सकता है। जब सबके हाथ में उत्पादक काम हम दे सकेंगे तो आर्थिक समानता की दिशा में स्वतः ही मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। मजदूर जब उद्यमी बनेगा, तभी स्वावलंबन के रास्ते निकलेंगे।

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