क्या अमरीका नस्लवाद से निपटने में नाकाम रहा?

By: Jul 15th, 2020 12:08 am

सिविल राइट्स एक्ट के बाद 50 साल के दौरान अश्वेतों ने राजनीतिक शक्ति, आर्थिक स्थिति और शिक्षा के क्षेत्रों में बहुत प्रगति की। अश्वेत वोटर टर्नआउट श्वेतों से आगे निकल गया। उनके निर्वाचित प्रतिनिधि सात गुना बढ़ गए। औसत आय 22,000 डॉलर से 40,000 डॉलर हो गई। हाई स्कूल पास करने वालों की दर 25 प्रतिशत से बढ़कर 85 प्रतिशत तक जा पहुंची। नेशनल एसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल के एक अध्यक्ष ने लिखा कि प्रगति ‘‘असाधारण और अकल्पनीय’’ रही…

आज अमरीका अपनी आजादी के 244 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहा है। पर इसकी अंतरराष्ट्रीय साख पर एक नया धब्बा लगा है — कि यह एक ‘नस्लवादी’ देश है। अमरीका के मिनियापोलिस शहर में एक श्वेत पुलिस कर्मी द्वारा एक अफ्रीकी नागरिक जॉर्ज फ्लायड की हत्या के बाद अमरीका के कई भागों में ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ (बीएलएम) आंदोलन भड़क उठे। ये बीएलएम आंदोलन जल्द ही दुनिया के अन्य भागों में भी फैल गए। परंतु इस घटना से जो धारणा बनी कि कि अमरीका बड़े पैमाने पर नस्लवादी समाज है, सही नहीं है। कई अन्य समाजों की तरह अमरीका में नस्लवाद गहराई तक जमा हुआ है। परंतु अमरीकी प्रणाली ने नस्लवादी इतिहास के बावजूद, श्वेतों और अश्वेतों को साथ मिलकर रहने में महत्त्वपूर्ण रूप से मदद की है। प्रसिद्ध लेखिका अयान हिरसी अली, एक अफ्रीकी अश्वेत महिला जो 2006 में अमरीका में आकर बसीं, ने हाल ही में ट्वीट किया कि ‘‘अमरीका पृथ्वी पर अश्वेत, नारी, समलैंगिक, विपरीत लिंगी या जैसे भी आप हैं, के लिए बेहतरीन देश है। अमरीका की अपनी समस्याएं हैं पर हमें उन पर ध्यान देने की आवश्यकता है। लेकिन हमारा समाज और हमारी प्रणालियां दूर-दूर तक नस्लवादी नहीं।’’ मैं, एक भारतीय ब्राउन मैन जो वर्ष 1979 में अमरीका गया, अली के बयान का समर्थन करता हूं। अमरीकी राजनीतिक प्रणाली के लंबे समय से विश्लेषक होने के तौर पर, मैं यह भी जोड़ सकता हूं कि वहां नस्लीय समानता बहुत अधिक मात्रा में सुधरी है। उस देश के गुलामी (slavery) के ‘मूल पाप’ और नस्लवाद की गहरी जड़ें होने के बावजूद।

दासता और नस्लवाद

अमरीका के निर्माताओं में से कई गुलामों के मालिक थे। उनके द्वारा 1787 में लिखे गए देश के संविधान ने स्लेवरी की व्यवस्था को वैध रूप से स्थापित कर दिया। राज्यों की जनसंख्या और सरकारी प्रतिनिधित्व निर्धारित करते समय हर गुलाम व्यक्ति का तीन-पांचवां भाग गिना जाता था। परंतु जैसा राष्ट्रपति एब्राहम लिंकन ने बाद में लिखा, ‘‘स्लेवरी संविधान ने छिपाकर रखी, ठीक उसी प्रकार जैसे एक पीडि़त व्यक्ति उस कैंसर को छिपाता है, जिसे वह एक ही बार काट फेंकने की हिम्मत नहीं करता ताकि कहीं खून बहने से मौत न हो जाए।’’ अमरीका तब से आज तक इस अन्याय का प्रायश्चित कर रहा है। पहला बड़ा दंड वहां हुए गृह युद्ध (Civil War 1861-65 ) के रूप में था जिसने देश लगभग नष्ट कर दिया था। इस युद्ध ने स्लेवरी में संलिप्त दक्षिणी राज्यों को उत्तरी राज्यों के खिलाफ मोर्चे पर खड़ा कर दिया था। गृह युद्ध ने लगभग 750,000 अमरीकियों की जान ले ली जो दो विश्व युद्धों, कोरिया युद्ध और वियतनाम युद्ध में संयुक्त रूप से हुई मौतों से अधिक है। उस लड़ाई में लगभग 200,000 अश्वेत सैनिक भी शामिल हुए थे। वर्ष 1863 में राष्ट्रपति लिंकन ने सभी गुलामों को दासता से मुक्त कर दिया, और ‘‘स्वतंत्रता में स्थापित व इस वचन को समर्पित कि सभी व्यक्ति समान हैं वाले एक नए देश’’ की बात कही। उस गृह युद्ध के बाद तीन संवैधानिक संशोधन — तेरहवां, चौदहवां और पंद्रहवां — लागू हुए। इन्होंने अश्वेत अमरीकियों को वैधानिक दर्जा तो दिया परंतु कानून सही तरीके से लागू नहीं हुए और दक्षिणी राज्यों ने अपना नस्लीय भेदभाव जारी रखा।

अमरीका में नस्लीय संबंधों में एक मोड़

नस्लीय संबंधों में एक मोड़ 1948 के राष्ट्रपति चुनावों के साथ आया। इस चुनाव में अश्वेतों को राजनीतिक मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर मिला। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अश्वेत पूर्व सैनिकों ने ‘दोहरी विजय’ नामक अभियान शुरू किया कि वही अमरीका जिसने हाल ही में विदेश में फैसिज्म (facism) के खिलाफ जंग लड़ी वह घर में भेदभाव सहन नहीं कर सकता। हैरी ट्रूमैन, एक दक्षिणी राज्य के राजनेता थे। इन्होंने महसूस किया कि अश्वेतों के समर्थन बिना वह चुनाव नहीं जीत सकते। उन्होंने ‘समान नागरिक अधिकार’ (civil rights) मंच की घोषणा कर दी। अश्वेतों ने उन्हें अपने 77 प्रतिशत वोट दिए। ट्रूमैन ने अमरीकी इतिहास की सबसे अप्रत्याशित विजय हासिल की। तब से आज तक अश्वेत वोट हर राष्ट्रपति चुनाव में मुख्य फैक्टर रहे हैं।

अमरीका के सिविल राइट्स एक्ट का असर

नस्लीय असमानता का अंतिम निवारण 1964 के सिविल राइट्स एक्ट के साथ हुआ। 1950 के दशक में सरकार की दोनों शाखाओं कार्यपालिका और न्यापालिका ने नागरिक अधिकारों को बढ़ावा दिया। परंतु विधायिका, जिस पर श्वेत बहुमत का नियंत्रण था, टाल-मटोल करती रही। राष्ट्रपति जॉन एफ कैनेडी की दिल दहला देने वाली हत्या के बाद उनके नागरिक अधिकार कार्यक्रम को मिलने वाले जन समर्थन ने श्वेत बहुमत को नरम पड़ने पर मजबूर कर दिया। 1964 के कानून ने अश्वेतों को आवास, स्कूलों, रोजगार में भेदभाव से व्यापक सुरक्षा उपलब्ध करवाई। सिविल राइट्स एक्ट के बाद 50 साल के दौरान अश्वेतों ने राजनीतिक शक्ति, आर्थिक स्थिति और शिक्षा के क्षेत्रों में बहुत प्रगति की। अश्वेत वोटर टर्नआउट श्वेतों से आगे निकल गया। उनके निर्वाचित प्रतिनिधि सात गुना बढ़ गए। औसत आय 22,000 डॉलर से 40,000 डॉलर हो गई। हाई स्कूल पास करने वालों की दर 25 प्रतिशत से बढ़कर 85 प्रतिशत तक जा पहुंची। नेशनल एसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ कलर्ड पीपल के एक अध्यक्ष ने लिखा कि प्रगति ‘‘असाधारण और अकल्पनीय’’ रही। आज अमरीकी कांग्रेस इतिहास में नस्लीय रूप से सबसे अधिक विविध है। और अमरीका के हाउस ऑफ रिपे्रजेंटेटिव्स के 12 प्रतिशत सदस्य अश्वेत हैं, बिलकुल उनकी जनसंख्या के बराबर।

अमरीकी आपराधिक न्याय प्रणाली

निसंदेह, नस्लीय असमानताएं अमरीका में अभी भी हैं। वे सबसे अधिक धन और आय के स्तर पर दिखती हैं। परंतु वे यकीनन ‘परिणाम’ की असमानताएं हैं, ‘बर्ताव’ की असमानताएं नहीं। अश्वेतों से ‘निष्पक्ष’ व्यवहार होता है, ऐसा वर्ष 2019 के प्यू रिसर्च सर्वे के अनुसार ऋण, स्टोर्स और रेस्तरां, चुनाव, चिकित्सा उपचार, आदि क्षेत्रों में पाया गया। परंतु उस सर्वेक्षण ने यह भी इंगित किया कि पुलिस और आपराधिक न्याय प्रणाली में अभी भी निष्पक्ष व्यवहार नहीं होता। आज, ‘ब्लैक लाइव्ज मैटर आंदोलन’ अमरीका में जमीन पर बड़ा प्रभाव डाल रहे हैं। जार्ज फ्लायड की हत्या के एक महीने के भीतर ही अमरीका की 20 से अधिक नगर और राज्य सरकारों ने पुलिस की शक्तियां सीमित करते हुए एक नई निरीक्षण की व्यवस्था बना दी है। देश की विधायिका बड़े सुधार विधेयकों पर बहस कर रही है। राष्ट्रपति ट्रंप ने जनता के दबाव के आगे झुकते हुए उन पुलिस अधिकारियों की राष्ट्रीय रजिस्ट्री बनाने के आदेश दे दिए हैं जो अत्यधिक शक्ति का इस्तेमाल करते हैं। और पुलिस और आपराधिक न्याय सुधारों का मसला आगामी अमरीकी राष्ट्रपति चुनावों में एक निर्णायक कारक बन गया है। दुनिया के कई देशों के लोग अपनी सरकारों से भी ऐसी ही फुर्तीली जवाबदेही पाने की आशा रखते हैं।

भानु धमीजा

सीएमडी, ‘दिव्य हिमाचल

अंग्रेजी में ‘दि क्विंट’ में प्रकाशित (4 जुलाई, 2020)

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