नोट छापना ही क्यों पसंद है? : डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक

By: Jul 14th, 2020 12:07 am

डा. भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

वित्तीय नीति में हम वर्तमान जनता पर भार आरोपित करते हैं जिसका लाभ भविष्य में मिलता है। जैसे पिता बच्चे की शिक्षा में निवेश करता है तो परिवार को उसका लाभ भविष्य में मिलता है। इसके विपरीत मौद्रिक और ऋण की नीति में लाभ वर्तमान में मिलता है, जबकि भार भविष्य में पड़ता है। जैसे पिता ऋण लेकर लग्जरी कार खरीदे और उस ऋण की भरपाई उसके परिजनों द्वारा भविष्य में की जाए। इन नीतियों मे दूसरा अंतर है कि नोट छापने में सरकार को किसी को जवाब नहीं देना पड़ता है। रिजर्व बैंक नोट छापता है और बैंकों को उपलब्ध कराता है। बैंक उस रकम से सरकार के बांड खरीद लेते हैं और वह रकम चुपचाप सरकार के पास पहुंच जाती है, लेकिन सरकार टैक्स लगाती है तो जनता सवाल पूछती है। यदि बाहरी ऋण लेती है तो रेटिंग एजेंसियां सवाल पूछती हैं…

कोरोना का सामना करने के लिए रिजर्व बैंक नोट छाप रहा है। इसका रहस्य समझें। सरकारी खर्च को पोषित करने के लिए तीन प्रकार से रकम जुटाई जाती है। पहला है कि सरकार टैक्स वसूल करे जैसे जीएसटी, आयात कर अथवा इनकम टैक्स से रकम उपार्जित कर अपने खर्चों को पोषित करती है। दूसरा उपाय है नोट छाप कर। रिजर्व बैंक नोट छापे और छापे गए नोटों को सरकार ऋण के रूप में हासिल करके अपने खर्चों को पोषित करे। तीसरा उपाय है कि सरकार बाह्य ऋण ले। ये ऋण विश्व या अपने घरेलू मुद्रा बाजार से लिए जा सकते हैं और सरकारी खर्च पोषित किए जा सकते हैं। विषय यह है कि इन तीन में से सरकार को नोट छापना ही क्यों पसंद है? रकम जुटाने का पहला उपाय टैक्स है। इसमें टैक्स का बोझ तत्काल जनता पर पड़ता है, जैसे सरकार ने जीएसटी की दर 18 प्रतिशत से बढ़ाकर 24 प्रतिशत कर दी तो आप बाजार से जो माल खरीदेंगे, उस पर आज ही आपको अधिक रकम अदा करनी पड़ेगी। तुलना में जिस मद पर खर्च किए जाते हैं, उनसे वर्तमान में लाभ हो सकता है और भविष्य में भी। जैसे सरकार यदि मनरेगा में खर्च बढ़ाए या खाद्यान्न सबसिडी दे तो खर्च का लाभ जनता को तत्काल होता है। लेकिन यदि रकम का उपयोग बुलेट ट्रेन या हाईवे बनाने में किया गया तो लाभ दीर्घकाल में आता है। अतः टैक्स का बोझ वर्तमान में पड़ा जबकि इसके लाभ का एक अंश वर्तमान में मनरेगा के कारण और एक अंश भविष्य में बुलेट ट्रेन के कारण मिला। मौद्रिक नीति के अंतर्गत रिजर्व बैंक नोट छापकर बैंक को उपलब्ध करा देता है और बैंक द्वारा सरकार द्वारा जारी बांड खरीदे जाते हैं। इस व्यवस्था का प्रभाव भविष्य में पड़ता है। जैसे यदि आज मान लीजिए हमारे देश में 100 करोड़ रुपए की मुद्रा प्रचलन में है। रिजर्व बैंक ने 10 करोड़ की मुद्रा और छापी और सरकार ने यह 10 करोड़ की मुद्रा ऋण के रूप में बैंकों से हासिल कर ली। अब बाजार में माल पूर्ववत 100 करोड़ रुपए का ही है, लेकिन मुद्रा 110 करोड़ की उपलब्ध हो गई। फलस्वरूप महंगाई बढ़ी। लेकिन इस महंगाई को बढ़ने में कुछ समय लग जाता है। सरकार जब खर्च करेगी, जब उस ऋण से सीमेंट खरीदेगी, तब बाजार में सीमेंट का दाम बढ़ेगा। तब महंगाई बढ़ेगी।

इसलिए नोट छापने का प्रभाव भविष्य में पड़ता है, लेकिन यदि उस रकम का खर्च मनरेगा में किया गया तो लाभ तत्काल हो जाएगा। ऐसे में मौद्रिक नीति का भार भविष्य में पड़ता है, जबकि उसका लाभ वर्तमान या भविष्य दोनों तरह से पड़ सकता है जो कि इस पर निर्भर करता है कि खर्च किस कार्य में किया गया। तीसरा उपाय घरेलू अथवा विश्व बाजार से सीधे ऋण लेने का है। इस ऋण पर जो ब्याज दिया जाता है, उसका भार भी भविष्य में पड़ेगा। जैसे सरकार ने यदि आज 10 करोड़ का ऋण लिया तो उस पर एक करोड़ का जो ब्याज का भार होगा, वह आने वाले समय में पड़ेगा, जबकि 10 करोड़ रुपया सरकार को तत्काल मिल जाएगा। इस प्रकार नोट छापने और ऋण लेने का भार भविष्य में पड़ता है, परंतु लाभ कुछ वर्तमान में और कुछ भविष्य में पड़ता है। स्पष्ट होगा कि वित्तीय व्यवस्था में जनता पर बोझ वर्तमान में पड़ता है, जबकि आंशिक लाभ भविष्य में मिलता है। इसके विपरीत नोट छापने और ऋण लेने में भार भविष्य में पड़ता है और आंशिक लाभ वर्तमान में। इसी मुद्दे का दूसरा हिस्सा गरीब और अमीर पर अलग-अलग प्रभाव का है। यदि टैक्स ईंधन तेल अथवा आयातित माल पर लगाया गया तो भार अमीरों पर ज्यादा पड़ता है और यदि टैक्स कपड़े और माचिस पर लगाया गया तो भार गरीब पर अधिक पड़ता है। इस रकम का खर्च यदि बुलेट ट्रेन और राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने में किया गया तो उसका लाभ अमीर को अधिक मिलेगा, तुलना में यदि खर्च झुग्गी में लाइट लगाने अथवा गांव में सड़क बनाने अथवा मनरेगा में किया गया तो लाभ गरीब को मिलेगा। इस प्रकार वित्तीय नीति में किस वर्ग पर भार पड़ेगा और किसको लाभ होगा, यह बारीकी का विषय हो जाता है। मौद्रिक नीति में रिजर्व बैंक जब नोट छापता है और उससे बाजारों में नोट की संख्या बढ़ती है, तो वह अमीर और गरीब सभी को प्रभावित करता है, जैसे वर्षा में सभी भीगते हैं। लेकिन नोट छापकर किए गए खर्च का प्रभाव पुनः इस बात पर निर्भर करेगा कि खर्च बुलेट ट्रेन पर किया गया अथवा झुग्गी की लाइट पर।

ऋण की स्थिति भी वित्तीय व्यवस्था के समान है। यदि आज सरकार ऋण लेती है तो आने वाले समय में उस पर ब्याज अदा करना पड़ेगा। इस ब्याज को अदा करने के लिए यदि सरकार ने ईंधन तेल और आयातों पर टैक्स लगाया तो भार अमीर पर पड़ेगा और यदि टैक्स कपड़े और माचिस पर लगाया तो भार गरीब पर पड़ेगा। इस प्रकार सभी नीतियों के खर्च का गरीब और अमीर पर प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि आपने किस वर्ग पर खर्च किया। मूल विषय भविष्य और वर्तमान का है।

वित्तीय नीति में हम वर्तमान जनता पर भार आरोपित करते हैं जिसका लाभ भविष्य में मिलता है। जैसे पिता बच्चे की शिक्षा में निवेश करता है तो परिवार को उसका लाभ भविष्य में मिलता है। इसके विपरीत मौद्रिक और ऋण की नीति में लाभ वर्तमान में मिलता है, जबकि भार भविष्य में पड़ता है। जैसे पिता ऋण लेकर लग्जरी कार खरीदे और उस ऋण की भरपाई उसके परिजनों द्वारा भविष्य में की जाए। इन नीतियों मे दूसरा अंतर है कि नोट छापने में सरकार को किसी को जवाब नहीं देना पड़ता है। रिजर्व बैंक नोट छापता है और बैंकों को उपलब्ध कराता है। बैंक उस रकम से सरकार के बांड खरीद लेते हैं और वह रकम चुपचाप सरकार के पास पहुंच जाती है, लेकिन सरकार टैक्स लगाती है तो जनता सवाल पूछती है। यदि बाहरी ऋण लेती है तो रेटिंग एजेंसियां सवाल पूछती हैं। अतः सरकार के लिए सबसे आरामदेह यह होता है कि वह रिजर्व बैंक से कहे कि वह नोट छापे और उस नोट को लेकर सरकार अपने खर्च बढ़ाए। इससे सरकार को वर्तमान में खर्च करके उस भार को भविष्य पर डालने का अवसर मिल जाता है और जांच का सामना नहीं करना पड़ता। यह नीति परिवार के उस मुखिया जैसी है जो वर्तमान में लग्जरी कार में घूमने के लिए अपने परिवार के भविष्य को दांव पर लगा देता है। कोरोना संकट का सामना हमें वित्तीय नीति से टैक्स लगा कर करना चाहिए, नोट छाप कर अपने भविष्य को दांव पर नहीं लगाना चाहिए।

ई-मेलः bharatjj@gmail.com

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