कांग्रेस में नेतृत्व का मसला : कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार

कुलदीप चंद अग्निहोत्री ( वरिष्ठ स्तंभकार ) By: कुलदीप चंद अग्निहोत्री Aug 29th, 2020 12:10 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

राहुल गांधी ने कहा कि चिट्ठी लिखने वाले भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं। भाजपा के इशारे पर ही चिट्ठी लिखी गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि सोनिया परिवार का यह निष्कर्ष है कि इस देश में माई कन्ट्री की चिंता केवल भाजपा करती है तो यकीनन चिट्ठी भाजपा के चक्कर में ही लिखी गई होगी। जाहिर है कांग्रेस के भीतर इतालवी लॉबी सिकुड़ भी रही है और अलग-थलग भी हो रही है। लेकिन इस संक्रमण काल में सोनिया जी के नेतृत्व में इस देश में फिर अपनी जड़ें जमाने के लिए जो रणनीति बनाई है, सचमुच दर्शाती है कि यह लॉबी देशघाती रास्ते पर चल निकली है। सोनिया कांग्रेस ने कश्मीर के हाशिए पर जा चुके लोगों के साथ मिल कर एक घोषणा कि है कि यदि वह सत्ता में आती है तो जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर अनुच्छेद 370 लागू कर देगी। यानी गिलान से आने वाला गिलानी तो कश्मीरी मान लिया जाएगा, लेकिन गुरदासपुर से आकर बसने वाला वाल्मीकि राज्य का निवासी नहीं हो सकेगा…

कांग्रेस के भीतर स्पष्ट रूप से दो समूह काम कर रहे हैं। एक भारत समूह और दूसरा इतालवी समूह। भारत समूह राष्ट्रीय मुद्दों पर केवल दलीय कारणों से विरोध नहीं करता। उदाहरण के लिए अनुच्छेद 370, तीन तलाक, भारत-चीन तनाव इत्यादि प्रश्नों पर यह समूह देश के साथ खड़ा रहा। लेकिन इसके विपरीत इतालवी लॉबी अभी भी इन प्रश्नों पर अलग से अपनी डफली बजा रही है। सबको आश्चर्य तो तब हुआ जब इतालवी लॉबी के भीतर ही विद्रोह हो गया। लॉबी के अनेक सदस्यों ने सोनिया गांधी के परिवार के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया। बाकायदा सोनिया गांधी को एक चिट्ठी ही नहीं लिखी, बल्कि उसके बाद रिमाइंडर भी भेजे। लेकिन यह वैचारिक विद्रोह नहीं था। इसका कारण था इतालवी लॉबी ने भारतीय सत्ता के जिन स्रोतों पर कब्जा किया हुआ था, वे स्रोत धीरे-धीरे सूखने लगे थे। हरियाली सूखने लगी थी। जो लोग इन सत्ता स्रोतों के इर्द-गिर्द पलते-बढ़ते हैं, उनके सामने दो ही रास्ते होते हैं। या तो स्रोत सूखने पर राज्य सत्ता के परिदृश्य से अदृश्य हो जाएं या किसी और स्रोत की तलाश करें। लेकिन कुछ लोग होते हैं जो सत्ता स्रोत के किनारे पर नहीं बैठे होते, बल्कि उसके भीतर रहते हैं। उन बेचारों के पास कोई विकल्प ही नहीं होता। उनका भाग्य और भविष्य सत्ता स्रोत के भविष्य के साथ ही बंधा होता है। जैसे तालाब के सूखने की स्थिति में मछलियों के लिए कोई विकल्प नहीं होता, परंतु बगुले तो उड़ सकते हैं। उड़ना या न उड़ना उनकी अपनी रणनीति का हिस्सा होता। जिन लोगों ने चिट्ठी लिख कर सोनिया गांधी को ललकारा है, उनमें से अनेक की राज्य सभा से सदस्यता खत्म होने वाली है। या फिर दूर-दूर तक सत्ता के बादल दिखाई नहीं देते। केवल और केवल चिलचिलाती धूप है।

समय आ गया है छायादार दरख्तों की तलाश की जाए। परंतु क्या केवल तलाश से ही इच्छापूर्ति हो जाएगी? वहां सिर छुपाने के लिए स्थान मिलना भी तो चाहिए। कपिल सिब्बल ने जो कहा है, उसको ध्यान से केवल पढ़ना ही नहीं चाहिए, सूंघ भी लेना चाहिए। चिट्ठी की कैफियत देते हुए उन्होंने कहा कि प्रश्न किसी दल का नहीं है, बल्कि ‘माई कन्ट्री’ का है। लेकिन माई कन्ट्री तो कई दशकों से इतालवी लॉबी के शिकंजे में फंसी हुई थी। कपिल सिब्बल को तब माई कन्ट्री का ध्यान नहीं आया। उस वक्त माई कन्ट्री की चिंता से परेशान हुए जब इतालवी लॉबी ने उनका हिस्सा उनको देने से इंकार कर दिया।

माई कन्ट्री की चिंता मेघालय के संगमा को थी, जब उन्होंने खुला अभियान छेड़ दिया था कि विदेशी मूल की औरत हिंदुस्तान की प्रधानमंत्री नहीं बन सकती। तब इतालवी लॉबी के सारे लोग संगमा के खिलाफ लट्ठ लेकर खड़े हो गए थे। तब माई कन्ट्री कहां चला गया था। चिट्ठी लिखने वालों को अपनी चिंता है, माई कन्ट्री तो केवल बहाना है। लेकिन इतालवी लॉबी ने चिट्ठी लिखने वालों को जो जबाब दिया है, वह चौंकाने वाला है।

जाहिर है सोनिया गांधी परिवार ने चिट्ठी की इबारत के अर्थ और अनर्थ दोनों ही गहराई से समझ लिए होंगे। वे यह भी समझ गए होंगे कि चिट्ठी में से माई कन्ट्री की गंध आ रही है। यही गंध उनको एलर्जी देती है। लेकिन परिवार ने घर में बैठकर काफी विचार-विमर्श किया होगा कि आखिर इस मुल्क में माई कन्ट्री की बात कौन करता है?

जिस नतीजे पर वे पहुंचे, उसका जिक्र उन्होंने चिट्ठी बम वालों को दिया। राहुल गांधी ने कहा कि चिट्ठी लिखने वाले भारतीय जनता पार्टी के संपर्क में हैं। भाजपा के इशारे पर ही चिट्ठी लिखी गई है। इसका अर्थ यह हुआ कि सोनिया परिवार का यह निष्कर्ष है कि इस देश में माई कन्ट्री की चिंता केवल भाजपा करती है तो यकीनन चिट्ठी भाजपा के चक्कर में ही लिखी गई होगी। जाहिर है कांग्रेस के भीतर इतालवी लॉबी सिकुड़ भी रही है और अलग-थलग भी हो रही है। लेकिन इस संक्रमण काल में सोनिया जी के नेतृत्व में इस देश में फिर अपनी जड़ें जमाने के लिए जो रणनीति बनाई है, सचमुच दर्शाती है कि यह लॉबी देशघाती रास्ते पर चल निकली है।

सोनिया कांग्रेस ने कश्मीर के हाशिए पर जा चुके लोगों के साथ मिल कर एक घोषणा कि है कि यदि वह सत्ता में आती है तो जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर अनुच्छेद 370 लागू कर देगी। यानी गिलान से आने वाला गिलानी तो कश्मीरी मान लिया जाएगा, लेकिन गुरदासपुर से आकर बसने वाला वाल्मीकि राज्य का निवासी नहीं हो सकेगा। इतालवी लॉबी क्या इस गलतफहमी का शिकार है कि भारत की जनता उसे अनुच्छेद 370 पुनः लागू करने के लिए सत्ता में बिठाएगी? यहीं बस नहीं। अभी सोनिया गांधी जी ने निर्णय किया है कि सरकार नीट और जीईई की परीक्षा न ले। वे छात्रों से कह सकती हैं कि परीक्षा न दें। लेकिन उनकी पार्टी पूरे देश में यह परीक्षा होने नहीं देगी। लगभग सभी  विद्यार्थी अपने प्रवेश पत्र ले चुके हैं। वे परीक्षा देने के लिए तैयार हैं। लेकिन सोनिया कांग्रेस सरकार से लड़ रही है कि वह इन छात्रों की परीक्षा लेने से इंकार कर दे। सचमुच इतालवी लॉबी भारत के लाखों युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ कर रही है। चिट्ठी लिखने वालों को उत्तर देने का यह राष्ट्रघाती तरीका है, जिससे सोनिया परिवार के असली इरादे भी जाहिर होते हैं।

होना तो यह चाहिए था कि कोरोना वायरस के इस संकट काल में परीक्षा को लेकर कांग्रेस छात्रों तथा सरकार का साथ देती, ताकि छात्रों का एक साल बच जाता और उनका नुकसान न होता। परंतु इसके उलट कांग्रेस छात्रों को उकसा रही है। कश्मीर को लेकर भी वह इस आस में है कि अनुच्छेद 370 की वापसी के लिए जनता उन्हें सत्ता पर बैठा दे। कांग्रेस के ये सपने पूरे होने वाले नहीं हैं क्योंकि जनता पहले ही उसके राज को भुगत चुकी है। अब वह उसे दूसरा मौका देने वाली नहीं लगती है।

 ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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