शिक्षक का विकल्प नहीं है ऑनलाइन शिक्षा: प्रो. सुरेश शर्मा, लेखक नगरोटा बगवां से हैं

Aug 1st, 2020 12:06 am

प्रो. सुरेश शर्मा

लेखक नगरोटा बगवां से हैं

निःसंदेह कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षण ने अध्यापक तथा विद्यार्थियों की दूरी को कम तो किया है, परंतु यदि हम सत्य स्वीकार करें तो प्रभावी शिक्षण की दृष्टि से यह औपचारिकता मात्र ही है। कक्षीय परिवेश में सह-अस्तित्व, सहयोग, व्यापक साझेदारी, सामूहिकता एवं वैचारिक सहिष्णुता का भाव छात्रों में विकसित होता है। इसके साथ ही शिक्षक का आचरण तथा उसके विभिन्न क्रियाकलाप उसके मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं। शिक्षक की मौजूदगी का विद्यार्थी पर जीवन भर के लिए असर रहता है…

इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि दुनिया के चहुंमुखी विकास में ज्ञान व विज्ञान का ही हाथ है। भौतिकी, रासायनिकी, वनस्पति विज्ञान तथा आर्थिक विकास की पृष्ठभूमि में मनुष्य के वषर्ो़ं से चल रहे संघर्ष, परिश्रम तथा निरंतर शोध, खोज एवं आविष्कार की तपस्या ने दुनिया को परिवर्तित किया है। इस परिवर्तन के पीछे ज्ञान है तथा ज्ञान की पृष्ठभूमि में शिक्षक है। शिक्षक को ज्ञान संप्रेषण का मुख्य एवं महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है जो विद्यार्थी के मन-मस्तिष्क पर अनंत कालीन प्रभाव डालता है। प्रत्येक सफल मनुष्य, पाठशाला में कक्षा की प्रयोगशाला में कुंदन बन कर बाहर निकलता है, जहां उसकी रुचियों, अभिरुचियों को मद्देनजर रखते हुए उस पर प्रयोग किए जाते हैं जिसके फलस्वरूप डाक्टर, इंजीनियर, नेता, अभिनेता, वकील, वैज्ञानिक तथा महान शिक्षक पैदा हुए हैं। शिक्षक कुम्हार की तरह ज्ञान की भट्ठी में शिष्य रूपी बर्तन को पकाकर, उसके मन-मस्तिष्क को आकार देता है। एक साधारण किसान, साधारण चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति को बनाने में शिक्षक की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। मनुष्य का चहुंमुखी तथा सर्वांगीण विकास बिना शिक्षक के संभव नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में मनुष्य ने असाधारण तरक्की की है। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में दुनिया बहुत आगे पहुंच गई है। ‘गूगल देवता’ को भी मनुष्य ने अपनी सुविधा के अनुसार अपना दास बना कर रख दिया है।

पुस्तकों व कंप्यूटर क्रांति में ज्ञान का तीव्र गति से प्रवाह हो रहा है। इसके विपरीत यह भी विचारणीय है कि मनुष्य द्वारा ही ज्ञान का सृजन एवं संग्रहण हुआ है। कंप्यूटर तथा गूगल देवता को भी मनुष्य के द्वारा ही आविष्कृत किया गया है। इसलिए किसी भी विचार से या तर्क से शिक्षक के महत्त्व को कभी भी कम करके नहीं आंका जा सकता। पुस्तकों व ग्रंथों में लिखित या निर्दिष्ट सिद्धांतों का प्रतिपादन या व्याख्यान तो शिक्षक के ही मुख से  होता है। पुस्तकें मूक होती हैं। वे बोल नहीं सकती। वे शिक्षक के ज्ञान तथा अनुभव से ही बोलती हैं। ज्ञानार्जन के कई स्रोत हो सकते हैं, लेकिन शिक्षक के माध्यम से सीना-ब-सीना बैठकर प्राप्त किया गया ज्ञान शिष्य को प्रतिष्ठित एवं शोभित करता है। कक्षा में शिक्षक का होना एक विशेष प्रकार के शैक्षणिक वातावरण का निर्माण करता है। यह विशिष्ट वातावरण शिष्य को अपने विचार को प्रकट करने व दूसरे सहपाठियों को स्वीकारना सिखाता है। यह स्थिति उसमें सहयोग तथा समाजीकरण की भावना को पैदा करती है। कक्षा-कक्ष में जीवन संबंधी प्रयोग किए जाते हैं, जहां पर एक अनुभवी एवं शिक्षित व्यक्ति की उपस्थिति होती है। यहां पर जीवन का व्यवहार सिखाया जाता है। भविष्य के नागरिक को जीवन में किन-किन परिस्थितियों में क्या निर्णय लेना है, कैसा व्यवहार करना है, उसे क्या, कब, क्यों, कैसे तथा किस तरह से जीवन संबंधी निर्णय लेने हैं, यह कक्षा रूपी प्रयोगशाला में शिक्षक द्वारा सिखाया जाता है। मात्र तकनीकी विकास से मानवीय भावनाओं तथा संवेदनाओं को अनुभव नहीं किया जा सकता, इसलिए कक्षा-कक्ष में एक शिक्षक की आवश्यकता होती है।

शिक्षक कक्षा में एक राजा के समान होता है, जहां पर भविष्य की पीढि़यों की आदतों तथा संस्कारों का निर्माण होता है। इसलिए शिक्षक को एक सामाजिक इंजीनियर तथा भविष्य निर्माता कहा जाता है। वर्तमान में कोरोना वायरस वैश्विक महामारी में यह सिद्ध हो चुका है कि शिक्षण प्रक्रिया में शिक्षक का उपस्थित होना अति आवश्यक है। केवल व्हाट्सऐप तथा यूट्यूब से शिक्षण-प्रशिक्षण कारगर एवं प्रभावी नहीं हो सकता, बेशक उसे स्वयं शिक्षक ही प्रयोग कर रहा हो। शिक्षक का कोई भी विकल्प नहीं है। प्रभावशाली शिक्षण में शिक्षक की महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। शिक्षक का विद्यार्थी के बौद्धिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शारीरिक, आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक तथा संवेगात्मक विकास में बहुत सकारात्मक प्रभाव रहता है। विद्यार्थी एक अच्छे शिक्षक को अपना उदाहरण मान कर उसका अनुसरण करते हैं। कंप्यूटर के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाएं मानवीय भावनाओं का स्पंदन तथा संप्रेषण नहीं कर सकती। इसमें कोई संदेह नहीं कि कोरोना काल में आनलाइन कक्षाओं ने विद्यार्थियों का बहुत नुकसान होने से बचाया है, परंतु तकनीकी साधनों से शिक्षण से भी बहुत से विपरीत एवं हानिकारक परिणाम सामने आए हैं। अर्थव्यवस्था और सामाजिक जीवन के अतिरिक्त कोरोना वायरस ने पठन-पाठन एवं दुनिया की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित किया है। कोरोना वायरस संक्रमण से स्कूल से लेकर उच्च स्तरीय शिक्षा पूरी दुनिया में लगभग ठप हो गई है। हालांकि स्कूलों, कालेजों तथा विश्वविद्यालयों में ज़ूम, गूगल क्लासरूम, माइक्रोसॉफ्ट टीम, स्काइप के साथ-साथ यूट्यूब तथा व्हाट्सऐप आदि के ऑनलाइन शिक्षण का विकल्प अपनाया है जो कि इस महामारी के संकट काल में एकमात्र रास्ता है।

शिक्षा के कुछ क्षेत्रों में ऑनलाइन शिक्षा का इस तरह से गुणगान तथा महिमा मंडन किया जा रहा है जैसे कि शिक्षा व्यवस्था की हर समस्या का समाधान हमें मिल गया हो। निःसंदेह कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षण ने अध्यापक तथा विद्यार्थियों की दूरी को कम तो किया है, परंतु यदि हम सत्य स्वीकार करें तो प्रभावी शिक्षण की दृष्टि से यह औपचारिकता मात्र ही है। कक्षीय परिवेश में सह-अस्तित्व, सहयोग, व्यापक साझेदारी, सामूहिकता एवं वैचारिक सहिष्णुता का भाव छात्रों में विकसित होता है। इसके साथ ही शिक्षक का आचरण तथा उसके विभिन्न क्रियाकलाप उसके मन मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डालते हैं। कक्षा में विद्यार्थियों का अंतर-व्यवहार सामाजिक, आर्थिक पृष्ठभूमि, तर्क-वितर्क, बहस, विवेचन आदि विभिन्न क्रियाकलाप तथा शिक्षक की मौजूदगी का विद्यार्थी पर जीवन भर के लिए असर रहता है। ऑनलाइन शिक्षा विद्यार्थी को  ज्ञान से भरा हुआ एक रोबोट तो बना सकती है, लेकिन एक सामाजिक, संवेदनशील तथा चरित्रवान नागरिक नहीं बना सकती। शिक्षण-प्रशिक्षण की इस महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया में शिक्षक एक मुख्य एवं महत्त्वपूर्ण घटक एवं अवयव है। बिना शिक्षक के शिक्षा अपूर्ण एवं अधूरी है।

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