बाढ़ का कहर और समाधान: डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक By: डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक Sep 1st, 2020 12:07 am

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

इन समस्याओं का पहला समाधान यह है कि हम फरक्का के आकार को बदलें। गेट के माध्यम से हुगली में पानी पहुंचाने के स्थान पर फरक्का के पूरब जालंगी नदी की ड्रेजिंग करके गंगा के पानी को हुगली तक ले जाएं। तब फरक्का के कारण जो गाद और पानी में असंतुलन बन रहा है, वह समाप्त हो जाएगा। आधा पानी और आधी गाद बांग्लादेश को जाएगी और आधा पानी और आधी गाद हुगली को जाएगी। सुंदरबन को ज्यादा गाद मिलेगी और कटाव कम हो जाएगा। दूसरा, हमें टिहरी, हरिद्वार और नरोरा को हटाने पर विचार करना चाहिए ताकि बड़ी बाढ़ आना पुनः शुरू हो जाए और गंगा अपने पेटे में जमा गाद को समुद्र तक पहुंचा सके…

बिहार में प्रत्येक वर्ष की तरह इस वर्ष भी बाढ़ का कहर जारी है। इस समस्या की शुरुआत आज से 200 वर्ष पूर्व हुई थी। 19वीं सदी में प्रायः हुगली नदी सूख जाती थी। कलकत्ता बंदरगाह पर जहाजरानी स्थगित हो जाती थी और कलकत्ता में पीने के पानी का अभाव हो जाता था। इस समस्या से निजात पाने के लिए हमने 70 के दशक में फरक्का बैराज का निर्माण किया और गंगा के आधे पानी को हुगली में डाला, जबकि आधा पूर्ववत बांग्लादेश को जाता रहा। यह प्रयोग इस हद तक सफल रहा कि आज हुगली 12 महीने जीवित है। कलकत्ता में पीने का पानी उपलब्ध है और कुछ हद तक जहाजरानी भी संचालित हो रही है। लेकिन इससे तीन गंभीर समस्याएं पैदा हो गई हैं। पहली समस्या यह है कि फरक्का बैराज में गेट लगे हुए हैं जिनके नीचे से पानी बांग्लादेश को जाता है। इन गेटों के पीछे के तालाब की ऊपरी सतह से पानी फीडर कनाल के माध्यम से हुगली को जाता है। बैराज के पीछे तकरीबन 10 किलोमीटर लंबा तालाब बन गया है। इस तालाब में गाद नीचे बैठती है, फलस्वरूप गेट के नीचे से निकलने वाले पानी में गाद की मात्रा ज्यादा होती है। बांग्लादेश को यद्यपि पानी तो आधा ही जाता है, लेकिन मेरे आकलन में गाद शायद 80 प्रतिशत जाती है। इसी असंतुलित वितरण का दूसरा परिणाम यह होता है कि हुगली में यद्यपि आधा पानी जाता है, लेकिन गाद केवल 20 प्रतिशत जाती है। हुगली में गाद कम जाने से हुगली के मुहाने पर सुंदरबन में गाद कम पहुंचती है। ज्ञात हो कि समुद्र की भी नैसर्गिक भूख होती है। वह गाद खाने को लालायित रहता है। गंगा द्वारा गाद को पर्याप्त मात्रा में न लाने से समुद्र ने सुंदरबन को काटना शुरू कर दिया है। फरक्का बैराज के निर्माण के बाद से यह कटान द्रुत गति से हो रहा है।

दूसरी समस्या यह है कि फरक्का बैराज में रुकावट के कारण इसके पीछे गंगा के बहाव का वेग कम हो गया है। कुछ जानकारों का आकलन है कि बक्सर तक वेग कम हो गया है। वेग कम होने से गंगा अपने पेटे में गाद को अधिक मात्रा में जमा कर रही है। परिणामस्वरूप उसका चैनल छिछला होता जा रहा है। इस कारण गंगा कोसी और गंडक जैसी नदियों के पानी को ग्रहण करके समुद्र तक कम पहुंचा पा रही है। अतः संपूर्ण बिहार बाढ़ की चपेट में आ रहा है। इस समस्या को टिहरी बांध तथा हरिद्वार एवं नरोरा बैराजों ने और गंभीर बना दिया है। टिहरी बांध में गाद भारी मात्रा में जमा हो रही है और हरिद्वार तथा नरोरा बैराजों से बरसात के मौसम में पानी के साथ-साथ गाद भारी मात्रा में निकल रही है। इसलिए नरोरा के नीचे गाद कम मात्रा में बह रही है, लेकिन साथ-साथ जो बड़ी बाढ़ आती थी, वह भी समाप्त हो गई है। पूर्व में यद्यपि गंगा गाद की मात्रा ज्यादा लाती थी, लेकिन हर पांच-दस वर्षों में एक बड़ी बाढ़ आती थी जिसमें गंगा जमा हुई गाद को ढकेल कर समुद्र तक ले जाती थी और अपना चैनल साफ कर लेती थी। तत्पश्चात चार-पांच साल तक बाढ़ का कहर कम हो जाता था। गाद के समुद्र तक पहुंचने से गंगासागर का कटाव भी रुक जाता था। वर्तमान में टिहरी, हरिद्वार और नरोरा के कारण गाद तो कम जा रही है जिससे गाद का जमाव भी कम हो रहा है, लेकिन साथ-साथ बड़ी बाढ़ भी कम आ रही है। परिणाम यह है कि कम मात्रा में आने वाली गाद जमा हो रही है, परंतु बड़ी बाढ़ के अभाव में वह समुद्र तक नहीं पहुंच रही है। फलस्वरूप इलाहाबाद-बक्सर के बाद गंगा का पेटा ऊंचा होता जा रहा है। उतने ही पानी को पहुंचाने के लिए गंगा बगल की भूमि को काट रही है, जैसे छोटी व मोटी रोटी के स्थान पर व्यक्ति को बड़ी और पतली रोटी परोसी जाए। गंगा के बहने वाले पानी की गहराई अब कम, लेकिन चौड़ाई ज्यादा है और वह दोनों किनारों को काटती चल रही है। कम मात्रा की गाद के समुद्र तक न ढकेले जाने के कारण वह भयावह होती जा रही है।

तीसरी समस्या यह है कि हमने बांग्लादेश से समझौता कर रखा है कि हर समय आधा पानी भारत और आधा पानी बांग्लादेश को जाएगा। बाढ़ के समय भी आधा पानी बांग्लादेश को और आधा पानी भारत को जाता है। फलस्वरूप हुगली में बड़ी बाढ़ का आना अब पूर्णतया बंद हो गया है। इसके कारण बिलकुल अलग प्रभाव पड़ता है। समुद्र में ज्वार तेजी से आता है और अपने साथ भारी मात्रा में बालू को लाता है, लेकिन भाटा धीमी गति से वापस जाता है और समुद्र के द्वारा लाई गई बालू वहीं छूट जाती है। पूर्व में बड़ी बाढ़ के समय यह बालू भी गंगा ढकेलकर समुद्र तक पहुंचा देती थी, लेकिन अब बड़ी बाढ़ बंद होने के कारण और बची बाढ़ का आधा पानी भी बांग्लादेश को जाने के कारण यह बालू वहीं जमा रह जाती है। कलकत्ता से हल्दिया तक गंगा का पेटा ऊंचा हो गया है और जहाजरानी प्रभावित हो गई है। आज जहाजों के आगे-आगे एक ड्रेजर नदी के चैनल को साफ करता चलता है और तब ही जहाज आ पाते हैं। फरक्का बनाकर हमने हुगली में पानी डाला जिससे कुछ समय के लिए जहाजरानी शुरू भी हुई, लेकिन आज जहाजरानी पुनः प्रभावित हो गई है। फरक्का का कलकत्ता को पीने का पानी उपलब्ध करने का उद्देश्य तो पूरा हुआ, लेकिन जहाजरानी सफल नहीं हुई और साथ में हमने सुंदरबन के कटाव को और बिहार में बड़ी बाढ़ को भी न्योता दिया।

इन समस्याओं का पहला समाधान यह है कि हम फरक्का के आकार को बदलें। गेट के माध्यम से हुगली में पानी पहुंचाने के स्थान पर फरक्का के पूरब जालंगी नदी की ड्रेजिंग करके गंगा के पानी को हुगली तक ले जाएं। तब फरक्का के कारण जो गाद और पानी में असंतुलन बन रहा है, वह समाप्त हो जाएगा। आधा पानी और आधी गाद बांग्लादेश को जाएगी और आधा पानी और आधी गाद हुगली को जाएगी। सुंदरबन को ज्यादा गाद मिलेगी और कटाव कम हो जाएगा। दूसरा, हमें टिहरी, हरिद्वार और नरोरा को हटाने पर विचार करना चाहिए ताकि बड़ी बाढ़ आना पुनः शुरू हो जाए और गंगा अपने पेटे में जमा गाद को समुद्र तक पहुंचा सके। इन बांध और बैराजों द्वारा सिंचाई का जो लाभ है, उसे भूजल संग्रहण के माध्यम से हासिल किया जा सकता है। तीसरा, हमें बांग्लादेश से समझौता करना होगा कि मानसून के समय 15 दिन तक 80 प्रतिशत पानी हुगली को और 15 दिन तक 80 प्रतिशत पानी बांग्लादेश को मिले जिससे कि दोनों देशों में नदियों के पेटे में जमा गाद को नदी समुद्र तक ढकेल कर ले जाए। इस संपूर्ण विषय पर एक बार फिर मौलिक पुनर्विचार करने की जरूरत है।

ई-मेलः bharatjj@gmail.com

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