जीडीपी का संकट: डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक

भरत झुनझुनवाला आर्थिक विश्लेषक By: डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक Sep 22nd, 2020 8:00 am

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

इस अवधि में इनका उत्पादन प्रभावित हुआ है और अपने को जीवित रखने के लिए इन्होंने ऋण लेकर अपने को जीवित रखा है जैसे आईसीयू में मरीज को कुछ समय के लिए भर्ती किया जाता है। इस ऋण को विकास नहीं मान सकते हैं। यह ऋण लेना संकट को बताता है। कुल मिलाकर परिस्थिति यह है कि सरकार द्वारा जो 23.9 प्रतिशत की जीडीपी में गिरावट बताई जा रही है, वह वास्तव में इससे अधिक है। यद्यपि अरुण कुमार द्वारा 58 प्रतिशत की जो गिरावट बताई जा रही है, उसके पीछे कोई ठोस आंकड़े नहीं दिए गए हैं, इसलिए वह वास्तविकता से अधिक दिखती है। बहरहाल इतना स्पष्ट है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है…

देश की आय को मापने के लिए देश में हुए उत्पादन का अनुमान लगाया जाता है, जैसे किसानों द्वारा कितने माल पर जीएसटी ऐड किया गया, रेलवे ने कितनों को यातायात उपलब्ध कराया, बिजली की कितनी बिक्री हुई इत्यादि। इन आधारों पर आकलन किया जाता है कि देश में कितना उत्पादन हुआ होगा। चूंकि हर ढाबेवाले से पूछना कठिन है कि उसने कितनी रोटी बेची। सरकारी अनुमान के अनुसार इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही यानी अप्रैल से जून 2020 में देश के कुल उत्पादन में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई है। लेकिन जवाहरलाल यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफेसर अरुण कुमार के अनुसार अप्रैल में जीडीपी में 75 प्रतिशत की गिरावट आई है, मई में 60 प्रतिशत की और जून में 40 प्रतिशत की, यानी औसत 58 प्रतिशत की गिरावट पहली तिमाही में आई है। इस प्रकार सरकार और अरुण कुमार के अनुमान में दुगने से ज्यादा का अंतर दिखता है। मैं समझता हूं कि वास्तविकता इन दोनों के बीच है। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने जो जीडीपी का अनुमान लगाया है, वह कंपनियों द्वारा प्रकाशित परिणाम के आधार पर लगाया है जो कि सही विधि है।

लेकिन कोविड संकट के दौरान पहली तिमाही में विशेषता यह है कि केवल कुछ बड़ी कंपनियों जैसे मोबाइल टेलीफोन, बिजली एवं ई-कॉमर्स का ही कारोबार ठीक-ठाक चला है। तमाम छोटी कंपनियों की हालत गड़बड़ रही है। लेकिन इन छोटी कंपनियों द्वारा अपने परिणाम प्रकाशित नहीं किए गए हैं। इसलिए यदि केवल प्रकाशित परिणामों के आधार पर जीडीपी का आकलन करें तो वह बड़ी सफल कंपनियों के आधार पर हो जाता है जो कि अर्थव्यवस्था की सही स्थिति को नहीं बताता है। सरकार के अनुमान में दूसरी समस्या यह है कि असंगठित क्षेत्र जिसमें किराना दुकान, दर्जी, टैक्सी, छोटे स्कूल, डाक्टर, ढाबे इत्यादि आते हैं, इनके आंकड़े एकत्रित करना पहली तिमाही में असंभव था। इसलिए सरकार ने इनके द्वारा उत्पादन में आई गिरावट का अनुमान कैसे लगाया है, इसका ब्यौरा उपलब्ध नहीं है। इसलिए सरकार द्वारा जो 23.9 प्रतिशत की गिरावट बताई गई है, उस पर विश्वास नहीं होता है। सरकार ने यह भी कहा है कि इस तिमाही में कृषि में 3.4 प्रतिशत की जीडीपी में वृद्धि हुई है। इस पर भी संदेह उत्पन्न होता है। अरुण कुमार के अनुसार अप्रैल में हमारी मंडियों में 50 प्रतिशत की आवक कम हुई है।

मेरा अपना प्रत्यक्ष अनुभव है कि नींबू का मूल्य जो 40 रुपए प्रति किलो पूर्व में था, वह इस अवधि में गिरकर 25 रुपए हो गया है। यदि फल-सब्जी के दाम गिरते हैं तो जीडीपी उसी अनुपात में गिरता है। जैसे एक किलो नींबू यदि 25 रुपए में बिके तो वह जीडीपी में 25 रुपए की वृद्धि करता है। वही नींबू यदि 40 रुपए में बिके तो जीडीपी में 40 रुपए की वृद्धि होती है। क्योंकि इस अवधि में कृषि उत्पादों के दाम में गिरावट आई है, इसलिए कृषि की जीडीपी में वृद्धि हुई, इस पर विश्वास करना कठिन हो जाता है। यह मान भी लें कि कृषि में 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो भी कृषि क्षेत्र को अर्थव्यवस्था में आगे बढ़ाने में भरोसा करना उचित नहीं होगा। कारण यह कि जीडीपी में कृषि का हिस्सा मात्र 14 प्रतिशत है। 14 प्रतिशत में यदि 3.4 प्रतिशत की वृद्धि हो तो कुल जीडीपी में 0.24 प्रतिशत की वृद्धि कृषि के कारण हो सकती है जो कि नगण्य है। जीडीपी के कमजोर होने का एक और आंकड़ा छोटे उद्यमों को दिए गए ऋण का है। रिजर्व बैंक के अनुसार बैंकों द्वारा मझोले, छोटे एवं अति छोटे उद्योगों को मार्च 2020 में 11.49 लाख करोड़ रुपए का ऋण दिया गया था।

अप्रैल-मई में इसमें गिरावट आई। जून में यह सुधरा और 11.32 लाख करोड़ तक पहुंच गया जो कि मार्च से कम था। लेकिन विचारणीय यह है कि छोटे उद्योगों को जो तीन लाख करोड़ रुपए का सरकार ने ऋण का पैकेज जारी किया था, उसके बावजूद कुल ऋण में वृद्धि क्यों नहीं हुई? ऐसा प्रतीत होता है कि बैंकों ने छोटे उद्योगों को दिए गए ऋणों की टोपी घुमाई यानी पुराने ऋण का भुगतान ले लिया और नए ऋण उन्हें दे दिए। इस प्रकार कुल ऋण पूर्ववत रहे। यह एक और संकट का द्योतक है। इस अवधि में इनका उत्पादन प्रभावित हुआ है और अपने को जीवित रखने के लिए इन्होंने ऋण लेकर अपने को जीवित रखा है जैसे आईसीयू में मरीज को कुछ समय के लिए भर्ती किया जाता है। इस ऋण को विकास नहीं मान सकते हैं। यह ऋण लेना संकट को बताता है। कुल मिलाकर परिस्थिति यह है कि सरकार द्वारा जो 23.9 प्रतिशत की जीडीपी में गिरावट बताई जा रही है, वह वास्तव में इससे अधिक है। यद्यपि अरुण कुमार द्वारा 58 प्रतिशत की जो गिरावट बताई जा रही है, उसके पीछे कोई ठोस आंकड़े नहीं दिए गए हैं, इसलिए वह वास्तविकता से अधिक दिखती है। बहरहाल इतना स्पष्ट है कि हमारे देश की अर्थव्यवस्था की हालत अच्छी नहीं है। इस परिस्थिति में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने भारत सरकार को सलाह दी है कि वह अपने निर्यात बढ़ाए और वैश्वीकरण को और पुरजोर तरीके से अपनाए जिससे विदेशी पूंजी मिले इत्यादि। ऐसा ही हम पिछले छह वर्षों से करते आ रहे हैं, लेकिन हमारा जीडीपी लगातार गिर ही रहा है। इस समय इस नीति को अपनाना और ज्यादा घातक होगा। कारण यह कि संकट के समय जब हम वैश्वीकरण को अपनाते हैं तो दूसरे देशों में बना सस्ता माल अपने देश में प्रवेश करता है और हमारे उपभोक्ता के रोजगार साथ-साथ समाप्त हो जाते हैं।

 रोजगार समाप्त होने से उसके हाथ में क्रय शक्ति नहीं बचती है और वह माल दुकान में पड़ा रह जाता है तथा बिक नहीं पाता। इसलिए हमारे सामने विकल्प यह है कि हम जनता को रोजगार उपलब्ध कराएंगे अथवा सस्ता माल? मैं समझता हूं कि रोजगार उपलब्ध कराना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। रोजगार उपलब्ध हो तो व्यक्ति महंगा माल भी बर्दाश्त कर लेता है। लेकिन यदि रोजगार न हो तो दुकान में रखा सस्ता माल भी व्यर्थ है। इसलिए सरकार को चाहिए कि तत्काल विदेश से आने वाले तमाम माल पर आयात कर में भारी वृद्धि करे जिससे देश के बंद उद्योगों का काम फिर से चालू हो जाए। इन उद्योगों का माल बिकने से इनके द्वारा रोजगार उत्पन्न किए जाएंगे जिससे पुनः बाजार में माल की मांग उत्पन्न होगी और अर्थव्यवस्था चल निकलेगी। लेकिन इस प्रक्रिया को अपनाने में जनता को महंगा माल स्वीकार करना पड़ेगा। इसलिए सरकार को चाहिए कि जनता को अपने विश्वास में ले। उन्हें बताए कि विदेश में बने सस्ते माल के स्थान पर हमें देश में बने महंगे माल को खरीदना चाहिए, जिससे कि देश में रोजगार उत्पन्न हो और अर्थव्यवस्था चल निकले।

ई-मेलः bharatjj@gmail.com

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