हमारे ‘भविष्य’ का भविष्य: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

pro. NK Singh (अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार) By: प्रो. एनके सिंह, अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार Sep 18th, 2020 9:05 am

प्रो. एनके सिंह

अंतरराष्ट्रीय प्रबंधन सलाहकार

शिक्षा प्रणाली पढ़ाई के लिए मॉनिटर की जानी चाहिए, उतनी कक्षाएं लगाई जाएं जितनी संभव हों, छात्रों को व्यावहारिक शिक्षा देना ज्यादा जरूरी है। क्रास कल्चरल मैनेजमेंट को वरिष्ठ कक्षाओं में एक कोर्स के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक प्रबंधन, जो कि भविष्य की व्यवस्था होगी, को नींव मिल सके। उच्च शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। अनुसंधान को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मैंने पीएचडी के कई छात्रों का इंटरव्यू लिया। मेरा अनुभव है कि ज्यादातर थेसिस साहित्यिक चोरी के रूप में आते हैं अथवा ‘आउटराइट लिफ्टिंग’ होते हैं। मैंने एक युवती से अन्य प्रोफेसर्स के सामने उसी की थेसिस में से कुछ सवाल किए तो वह उसका जवाब नहीं दे पाई…

आज हम विश्व के आर्थिक और राजनीतिक इतिहास में परिवर्तन के मुहाने पर खड़े हैं। एक ओर अमरीका चीन की धमकियों का सामना कर रहा है, साथ ही भारत भी उसकी विस्तारवादी नीति से उपजी स्थितियों में उसका मुकाबला कर रहा है। विस्तारवाद के प्रति चीन की भूख उसके आसपास के द्वीपों को लील रही है। चीन की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह समुद्र तक पहुंच चाहता है, विशेषकर तेल के आयात के लिए। दूसरी ओर कोविड-19 ने मानवजाति के लिए विश्व का सबसे बड़ा संकट पैदा कर दिया है। इसके कारण विश्व के कई देशों में वहां की अर्थव्यवस्थाएं लुढ़क रही हैं। यह स्थिति भय और चिंता का नया वातावरण पैदा कर रही है, लेकिन साथ ही यह इन संभावित खतरों का समाधान ढूंढने के लिए मानव सृजन को चुनौती भी लेकर आई है। इस संदर्भ में यह बात महत्त्वपूर्ण हो जाती है कि हम इस बात पर चिंतन करें कि हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा तथा उनके सेहत संबंधी विकास के लिए हम क्या सुरक्षा उपाय कर सकते हैं।

यह भी सोचना है कि नवाचार के लिए बौद्धिक उपलब्धियां क्या हो सकती हैं? किसी भी राष्ट्र के भविष्य को तराशने के लिए शिक्षा बहुत बड़ा हथियार होती है। कोरोना वायरस के कारण शिक्षा को ऐसी क्षति हुई है जिसे कभी पूरा नहीं किया जा सकेगा। शिक्षा देने की जो हमारी विधियां हैं, उनकी अपनी सीमाएं हैं। पढ़ाई की पूरी प्रणाली बंद पड़ी है। देशभर में 903 विश्वविद्यालय और 39050 कालेज बंद हैं। अब बच्चों को पढ़ाने के लिए नए उपाय ढूंढने के लिए शिक्षक मजबूर हुए हैं। सामाजिक दूरी तथा संक्रमण के भय द्वारा उत्पन्न किए गए शून्य को भरने के लिए हमने आईटी, एआई तथा कोडिंग को छीन लिया। शैक्षणिक संस्थान बंद हैं, लेकिन शिक्षा तक अपनी पहुंच बनाए रखने के लिए छात्रों ने डिजीटल उपाय किए हैं। पढ़ाई को वर्चुअल क्लासिज तथा विविध अन्य डिजीटल तकनीक के जरिए शुरू किया गया है। परंतु हमने वह प्रणाली खोजी है, जिसे हम नई मांग के लिए प्रयोग करते हैं। ऐसे ही समय में भारत ने नई शिक्षा प्रणाली तथा उसकी नीति की ओर ध्यान दिया है।

वर्ष 1986 तथा वर्ष 1992 की शिक्षा नीति में सुधार करते हुए भारत नई शिक्षा नीति में प्रविष्ट हुआ है। इससे पहले भारत नीति में परिवर्तन का लाभ लेने में फंड के अभाव में विफल रहा। अब जो शिक्षा नीति अपनाई गई है, उसकी कई फैशनेबल विशेषताएं हैं। सबसे पहले दस जमा दो के मॉडल में परिवर्तन करते हुए पांच जमा तीन जमा तीन जमा चार का मॉडल अपनाया गया है। पहले इसने पांचवीं कक्षा से शिक्षा के अधिकार का लाभ दिया था, जो कि अब तीसरे वर्ष शुरू हो जाएगा। नई शिक्षा नीति में यह लचीलापन है कि यह छात्रों की जरूरत के अनुसार अनुकूलता को उपलब्ध करवाती है। दूसरे, इसके जरिए छोटी कक्षाओं से ही शिक्षा का व्यावसायीकरण किया गया है। अब स्कूल स्तर पर पसंद की यह स्वतंत्रता होगी कि कोई इतिहास के साथ भौतिकी को भी पढ़ सकता है। यह सभी वर्गीकृत विषयों को हटाती है ताकि पसंद की पूरी स्वतंत्रता उपलब्ध करवाई जा सके। वर्ष 2022 से कालेजों में प्रवेश के लिए एक प्रवेश परीक्षा होगी। नई शिक्षा नीति एक नए संगठन, जिसे हायर एजुकेशन कमीशन कहा जाएगा, को ऐजाद करती है जो वर्तमान विश्वविद्यालय अनुदान आयोग तथा अखिल भारतीय तकनीकी आयोग परिषद को जोड़ेगा। इस बात में कोई संदेह नहीं कि शिक्षा क्षेत्र का बहुत अधिक नियंत्रण तथा ‘माइक्रो चैक’ है, किंतु भय यह है कि दो संगठनों का एक में विलय भारत में लालफीताशाही को कम नहीं करता है, बल्कि बढ़ाता है। प्रणाली में सुधार करने तथा क्वालिटी कंट्रोल को शुरू करने की बहुत ही जरूरत है।

ऐसा नियंत्रण स्व-अनुशासन तथा स्व-नियंत्रण ज्यादा होना चाहिए। पर्यवेक्षण कम से कम होना चाहिए ताकि पढ़ाई को तंदुरुस्त किया जा सके। प्रबंधन में मसले अब संगठन और मैथ्ड़ ग्रुप का खास ध्यान चाहते हैं, बजाय इसके कि अध्यापक या नौकरशाह हों। हमें टेस्टिंग सिस्टम में सुधार की जरूरत है। अनुभव से सीखने को अब ज्यादा महत्त्व दिया जाना चाहिए। यह पढ़ाई का नया तरीका होगा। रिपोर्ट परियोजना आधारित लर्निंग में एकेडमिक इनपुट्स का आउटकम नहीं बनाती है। हमें सृजन और नवाचार पर फोकस करना चाहिए। वर्तमान की शिक्षा प्रणाली में सृजन तथा नवाचार को कोई स्थान नहीं है। यह पढ़ाई को नीरस बना देता है तथा छात्र अनुभव नहीं बटोर पाते हैं।

शिक्षा प्रणाली पढ़ाई के लिए मॉनिटर की जानी चाहिए, उतनी कक्षाएं लगाई जाएं जितनी संभव हों, छात्रों को व्यावहारिक शिक्षा देना ज्यादा जरूरी है। क्रास कल्चरल मैनेजमेंट को वरिष्ठ कक्षाओं में एक कोर्स के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए ताकि अंतरराष्ट्रीय और वैश्विक प्रबंधन, जो कि भविष्य की व्यवस्था होगी, को नींव मिल सके। उच्च शिक्षा पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। अनुसंधान को उच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। मैंने पीएचडी के कई छात्रों का इंटरव्यू लिया। मेरा अनुभव है कि ज्यादातर थेसिस साहित्यिक चोरी के रूप में आते हैं अथवा ‘आउटराइट लिफ्टिंग’ होते हैं। मैंने एक युवती से अन्य प्रोफेसर्स के सामने उसी की थेसिस में से कुछ सवाल किए तो वह उसका जवाब नहीं दे पाई। जब उसका इंटरव्यू खत्म हुआ तो अन्य प्रोफेसर हंस कर बोले कि आपको पता नहीं कि यह उसकी थेसिस नहीं है, किसी ने इसे ‘लोडेड’ किया है। हमारी शिक्षा प्रणाली में दंड पर ज्यादा जोर दिया जाता है, जबकि रिवार्ड पर कम जोर दिया जाता है। खोज अथवा पेटेंट के लिए हमें छात्रों तथा शिक्षकों को उच्च पुरस्कार व सम्मान देना चाहिए। पेटेंट की संख्या के आधार पर किसी का वेतन तय किया जाना चाहिए। शिक्षकों को अनिवार्य रूप से वर्तमान समस्याओं के समाधान पाने के लिए अनुसंधान करना चाहिए। कोरोना वायरस के उपचारात्मक उपाय निकालने के लिए भी गहन अनुसंधान की जरूरत है। अनुसंधान में महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों पर अनिवार्य रूप से उच्च पुरस्कार व सम्मान मिलना चाहिए। नई शिक्षा नीति का एक लाभ यह भी है कि इसमें बच्चे छोटी उम्र ही हुनर को सीख पाएंगे तथा अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कुछ उपाय कर पाएंगे।

ई-मेलः singhnk7@gmail.com

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