शिक्षा और भीमराव अंबेडकर : कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार

कुलदीप चंद अग्निहोत्री ( वरिष्ठ स्तंभकार ) By: कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार Sep 12th, 2020 12:10 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

बाबा साहेब का अभिमत स्पष्ट है। शिक्षा जनहितकारी होनी चाहिए। शिक्षा से प्राप्त योग्यता का उपयोग वंचित समाज के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए, न कि उसके शोषण के लिए। शिक्षा का उद्देश्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय होना चाहिए, न कि स्व हिताय स्व सुखाय। यही कारण है कि अंबेडकर शिक्षा और शील को एक-दूसरे का पूरक मानते थे। शील के बिना शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। शीलवान व्यक्ति पारंपरिक अर्थ में शिक्षित न भी हो तो चल सकता है, क्योंकि शील साधना अपने आप में ही शिक्षा है। लेकिन शिक्षित व्यक्ति शीलविहीन हो, इससे बड़ी त्रासदी और कोई नहीं हो सकती। अंबेडकर कहते हैं, ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा का महत्त्व है, लेकिन शिक्षा के साथ ही मनुष्य का शील भी सुधरना चाहिए। शील के बिना शिक्षा का मूल्य शून्य है।’ …

नई शिक्षा नीति इस समय देश भर में चर्चा का विषय बनी हुई है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि शिक्षा को सामाजिक बदलाव का मुख्य साधन मानने वाले बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर के विचारों का अवलोकन कर लिया जाए। बाबा साहेब शिक्षा, शिक्षक व सदाचार पर विचार प्रकट करते हैं। वह शिक्षा का महत्त्व रेखांकित करने के साथ-साथ उसको प्राप्त करने पात्र की भी चर्चा करते हैं। वह कहते हैं, ‘शिक्षा दुधारी तलवार है। इसलिए उसे चलाना खतरे से भरा रहता है। चरित्रहीन व विनयहीन सुशिक्षित व्यक्ति पशु से भी अधिक खतरनाक होता है। यदि सुशिक्षित व्यक्ति की शिक्षा गरीब जनता के हित की विरोधी होगी, तो वह व्यक्ति समाज के लिए अभिशाप बन जाता है। ऐसे सुशिक्षितों को धिक्कार है। शिक्षा से चरित्र अधिक महत्त्व का है। युवकों की धर्म विरोधी प्रवृत्ति देखकर मुझे दुख होता है। कुछ लोगों का मानना है कि धर्म अफीम की गोली है। परंतु यह सत्य नहीं है। मेरे अंदर जो अच्छे गुण हैं अथवा मेरी शिक्षा के कारण समाज का जो कुछ हित हुआ होगा, वे मेरे अंतर्मन की धार्मिक भावना के कारण ही हैं। मुझे धर्म चाहिए। परंतु धर्म के नाम पर चलने वाला पाखंड नहीं।’ बाबा साहेब का अभिमत स्पष्ट है। शिक्षा जनहितकारी होनी चाहिए। शिक्षा से प्राप्त योग्यता का उपयोग वंचित समाज के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए, न कि उसके शोषण के लिए। शिक्षा का उद्देश्य बहुजन हिताय बहुजन सुखाय होना चाहिए, न कि स्व हिताय स्व सुखाय। यही कारण है कि अंबेडकर शिक्षा और शील को एक-दूसरे का पूरक मानते थे। शील के बिना शिक्षा का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता है। शीलवान व्यक्ति पारंपरिक अर्थ में शिक्षित न भी हो तो चल सकता है, क्योंकि शील साधना अपने आप में ही शिक्षा है। लेकिन शिक्षित व्यक्ति शीलविहीन हो, इससे बड़ी त्रासदी और कोई नहीं हो सकती।

अंबेडकर कहते हैं, ‘इसमें कोई संदेह नहीं कि शिक्षा का महत्त्व है, लेकिन शिक्षा के साथ ही मनुष्य का शील भी सुधरना चाहिए। शील के बिना शिक्षा का मूल्य शून्य है। ज्ञान तलवार की धार जैसा है। तलवार का सदुपयोग अथवा दुरुपयोग उसको पकड़ने वाले पर निर्भर करता है। वह उससे किसी का खून भी कर सकता है और किसी की रक्षा भी कर सकता है। यदि पढ़ा-लिखा व्यक्ति शीलवान होगा तो वह अपने ज्ञान का उपयोग लोगों के कल्याण के लिए करेगा। लेकिन यदि उसका शील अच्छा नहीं होगा तो वह अपने ज्ञान से लोगों का अकल्याण भी कर सकता है।’ भीमराव अंबेडकर ने स्वयं अपनी शिक्षा का उपयोग अपनी सुख-सुविधा के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए किया। उनके विचार में शिक्षा का इतना महत्त्व है तो शिक्षा देने वाले शिक्षक का महत्त्व तो उससे भी कई गुणा बढ़ जाता है क्योंकि शिक्षा केवल किताबों से नहीं मिलती, वह शिक्षक के आचरण व व्यवहार से भी मिलती है। शिक्षा संस्कार बनाती है और संस्कार शिक्षक के आचरण से ही बनते हैं। इसलिए शिक्षा के मामले में बाबा साहेब शिक्षक की भूमिका और चयन को लेकर अत्यंत सतर्क रहते थे। वह मानते थे कि, ‘शिक्षक राष्ट्र का सारथी होता है। इसलिए शिक्षक बुद्धि से होशियार, वृत्ति से निरीक्षक व मर्मज्ञ होना चाहिए क्योंकि शिक्षा के द्वारा मनुष्य का आत्मिक उन्नयन होता है और वह तभी हो सकता है जब शिक्षक योग्य होगा।’ शिक्षा के क्षेत्र में अपने इन्हीं सपनों को पूरा करने के लिए उन्होंने आठ जुलाई 1945 को मुंबई में पीपुल्ज एजुकेशन सोसायटी की स्थापना की। इसके उद्देश्यों में निर्धनों को शिक्षा प्रदान करना, अनुसूचित जातियों में शिक्षा के प्रति रुचि पैदा करना और उच्च शिक्षा के लिए उन्हें आर्थिक सहायता देना शामिल था। लेकिन यह सोसायटी सभी वर्गों की शिक्षा के लिए प्रयास करने के लिए थी और उसने ऐसा किया भी। उन्होंने 1949 में अपने एक मित्र को लिखा, ‘महाविद्यालय का प्राचार्य किसे नियुक्त किया जाए, इसको लेकर चिंता में हूं। वेतन मात्र के लिए काम करने वाला प्राचार्य, संस्था को अपना मानकर त्याग व आस्थापूर्वक कार्य नहीं करता। वह केवल स्वयं का विचार करता है। लेकिन मुझे तो योग्य प्राचार्य चाहिए।’ शिक्षा और शिक्षक के मामले में बाबा साहेब जाति भेद से कहीं दूर थे। उनके अपने मिलिंद महाविद्यालय के किसी ब्राह्मण आचार्य ने उनसे एक दफा पूछा कि आप इतने ब्राह्मण विरोधी क्यों हैं?

अंबेडकर का जवाब मार्मिक था, ‘मेरे मित्र, यदि मैं ब्राह्मण विरोधी होता तो तुम इस महाविद्यालय में न होते। मेरी संस्था के शिक्षक बहुधा ब्राह्मण ही हैं। मेरा विरोध ब्राह्मण जाति से नहीं, बल्कि ब्राह्म्ण्य से है।’ शिक्षक कैसा होना चाहिए, अंबेडकर यहीं नहीं रुके। छात्र भी कैसा होना चाहिए, उन्होंने इस पर भी विचार किया। इसको उन्होंने उदाहरण से स्पष्ट किया। ‘इस देश में ऐसा भी समय था जब रानाडे, गोखले, तिलक, सर फिरोजशाह मेहता और उनके जैसे कई दर्जनों ऐसे छात्र निर्माण हुए जिनमें ज्ञान के प्रति जबरदस्त आस्था थी तथा आत्मीयता थी। उनमें जिद थी, अनुशासन था, आस्था और उम्मीदें थीं। उनके कंधों पर एक प्रकार की जिम्मेदारी है, इसका उन्हें पूर्ण एहसास था, परंतु आजकल के छात्रों में यह एहसास अथवा अनुशासन है ही नहीं।’ इस तरह बाबा साहेब एक ऐसी शिक्षा नीति की संकल्पना करते हैं जिसमें जनकल्याण की अवधारणा सर्वोपरि है। शिक्षक के लिए जहां कुछ कर्त्तव्य तय किए गए, वहीं छात्रों के लिए भी कुछ कर्त्तव्य तय किए गए। शिक्षा को पाने के बाद छात्र का लक्ष्य केवल अपना विकास करना नहीं है, बल्कि कमजोर वर्गों के कल्याण के लिए कार्य करना भी है। इस तरह आज के आपाधापी के युग में उनकी शिक्षा नीति की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। आज के शिक्षकों तथा छात्रों को उनके विचारों को आत्मसात करना चाहिए।

 ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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