तिब्बत और भीमराव अंबेडकर: कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार

कुलदीप चंद अग्निहोत्री ( वरिष्ठ स्तंभकार ) By: कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार Sep 5th, 2020 12:08 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

स्पष्ट है तिब्बत से विश्वासघात किए जाने से चीन की सेना लद्दाख की सीमा पर पहुंच जाएगी। उन दिनों लद्दाख जम्मू-कश्मीर का ही हिस्सा था। चीन की ओर संकेत करते हुए ही अंबेडकर कहते हैं, ‘कोई भी विजेता यदि कश्मीर पर अधिकार कर लेता है तो वह सीधा पठानकोट पहुंच सकता है। मैं जानता हूं कि वह दिल्ली में प्रधानमंत्री भवन तक भी पहुंच सकता है।’ भारत और चीन के बीच स्थित विशाल तिब्बत की स्वतंत्रता खत्म हो जाने से सीमा पर क्या स्थिति हो सकती है, इसका अनुमान अंबेडकर ने सत्तर साल पहले ही लगा लिया था। हर मरहले पर अंबेडकर तो सत्य सिद्ध होते रहे, लेकिन मौके की हर सरकार तिब्बत के मामले में नेहरू की नीति पकड़े रही। अब स्थिति बदली है और तिब्बत को लेकर अंबेडकर फिर प्रासंगिक हो गए हैं। कुछ दिन पहले लद्दाख में ब्लैक टॉप चोटी को लेकर चीनी सेना के साथ जो संघर्ष हुआ था, उसमें जो एकमात्र आहुति हुई, वह एक तिब्बती ने ही दी…

जब से भारत और चीन में तिब्बत सीमा को लेकर लद्दाख में विवाद बढ़ा है तब से तिब्बत का प्रश्न फिर से चर्चा का विषय बन गया है। तिब्बत पर चीन ने 1950 में कब्जा करना शुरू किया था और 1959 तक आते-आते यह कब्जा पूरा हो गया था। उस समय सरदार पटेल ने नेहरू को चेताया था, लेकिन नेहरू हिंद-चीन दोस्ती के अंतरिक्ष में घूम रहे थे। तिब्बत पर कब्जा करने के बाद हिंदुस्तान पर हमला करने में चीन को कितनी देर लगती, 1962 में चीन ने यही किया। तभी से भारत-तिब्बत सीमा पर वास्तविक नियंत्रण सीमा बन गई और चीन के नियंत्रण में आ गई।

यह तनाव उसके बाद कभी बंद नहीं हुआ। सेना के लोग कहते हैं कि यह पहली बार हुआ है कि भारत ने 2020 में चीन को उसी की भाषा में जवाब दिया है। लेकिन इससे एक और प्रश्न उभर आया है, वह तिब्बत का प्रश्न है। मुझे कई लोगों के फोन आ रहे हैं कि तिब्बत के प्रश्न पर भीमराव अंबेडकर का क्या मत था? जब भीमराव अंबेडकर ने मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र दिया था तो उन्होंने अपने वक्तव्य में नेहरू की विदेश नीति की कटु आलोचना की थी। भीमराव अंबेडकर राष्ट्रवादी चिंतन के पुरोधा थे। नेहरू राष्ट्र की भावना को अंतरराष्ट्रीयता के मार्ग में बाधा मानते थे। वह राष्ट्रीयता को संकीर्णता का पर्याय मानते थे। वैसे भी वह भारत को राष्ट्र न मान कर ‘नेशन इन दि मेकिंग’ मानते थे।

अभी तक चीन और तिब्बत को लेकर भारत नेहरू की नीति का ही अनुसरण करता आया था। लेकिन अब वह नीति बदली है। पहली बार चीन ने कहा है कि भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा को बदल रहा है। तभी यह बात फिर चर्चा में आई है कि तिब्बत को लेकर बाबा साहिब अंबेडकर की नीति क्या थी? इस विषय पर अंबेडकर का राज्यसभा में दिया गया एक वक्तव्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। उनका यह वक्तव्य 1954 का है, जब चीन का तिब्बत पर कब्जा शुरू हो चुका था और नेहरू ने पंचशील की कहानियां लिखनी शुरू कर दी थीं। तब अंबेडकर ने राज्यसभा में सिंह गर्जना करते हुए कहा था, ‘हमारे प्रधानमंत्री उस पंचशील को ढो रहे हैं जो माओ के दिमाग से निकली है और तिब्बत पर हमले को मान्यता देती है। मुझे आश्चर्य है कि नेहरू इस पंचशील को गंभीरता से ले रहे हैं। आप जानते हैं कि पंचशील बौद्ध धर्म का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। यदि माओ को पंचशील में थोड़ी सी भी आस्था होती तो वह अपने देश के बौद्धों के साथ ऐसा बुरा व्यवहार न करते। राजनीति में पंचशील का कोई स्थान नहीं है। राजनीति में नैतिकता की अवधारणा स्थायी नहीं होती।

वह समय के अनुसार बदलती रहती है। आज आप नैतिकता के आधार पर वचन पालन करने की बात करते हैं। कल आप नैतिकता के आधार पर ही वचन भंग कर सकते हैं। मेरा विश्वास है जब स्थिति पक जाएगी तो नेहरू को मेरी बात समझ आ जाएगी।’ और सचमुच जैसा अंबेडकर ने कहा था वैसा ही हुआ। पंचशील संधि में चीन ने वचन दिया था कि वह तिब्बत की आंतरिक व्यवस्था में दखलअंदाजी नहीं करेगा। वह तिब्बत को स्वायत्त क्षेत्र रखेगा, लेकिन चीन ने तिब्बत को अपना उपनिवेश बना लिया और वहां की शासन व्यवस्था पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की साम्यवादी व्यवस्था लागू कर दी गई। अंबेडकर दूरदृष्टि वाले थे। उन्होंने 1954 में ही यह अंदाजा लगा लिया था कि यदि तिब्बत पर चीन का कब्जा हो गया तो समय पाकर चीन भारत पर भी हमला करेगा। अंबेडकर को शायद यह भी अनुमान हो गया था कि तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद चीन और पाकिस्तान आपस में भारत के खिलाफ एकजुट हो जाएंगे। 1954 के इसी वक्तव्य में अंबेडकर ने कहा था, ‘मैं सोचता हूं कि भारत पर कभी भी आक्रमण हो सकता है। भारत पाकिस्तान और दूसरे मुस्लिम देशों से घिर गया है। मैं नहीं जानता क्या होने वाला है। भारत ने ल्हासा तिब्बत पर चीन को अधिकार कर लेने दिया। परोक्ष रूप में नेहरू ने चीन की पूरी सहायता की है कि वे तिब्बत को पारकर अपनी सेना भारत की सीमा पर ले आएं।’

स्पष्ट है तिब्बत से विश्वासघात किए जाने से चीन की सेना लद्दाख की सीमा पर पहुंच जाएगी। उन दिनों लद्दाख जम्मू-कश्मीर का ही हिस्सा था। चीन की ओर संकेत करते हुए ही अंबेडकर कहते हैं, ‘कोई भी विजेता यदि कश्मीर पर अधिकार कर लेता है तो वह सीधा पठानकोट पहुंच सकता है। मैं जानता हूं कि वह दिल्ली में प्रधानमंत्री भवन तक भी पहुंच सकता है।’ भारत और चीन के बीच स्थित विशाल तिब्बत की स्वतंत्रता खत्म हो जाने से सीमा पर क्या स्थिति हो सकती है, इसका अनुमान अंबेडकर ने सत्तर साल पहले ही लगा लिया था। हर मरहले पर अंबेडकर तो सत्य सिद्ध होते रहे, लेकिन मौके की हर सरकार तिब्बत के मामले में नेहरू की नीति पकड़े रही। अब स्थिति बदली है और तिब्बत को लेकर अंबेडकर फिर प्रासंगिक हो गए हैं।

कुछ दिन पहले लद्दाख में ब्लैक टॉप चोटी को लेकर चीनी सेना के साथ जो संघर्ष हुआ था, उसमें जो एकमात्र आहुति हुई, वह एक तिब्बती नईमा तेनजिन ने ही दी। तिब्बत के पठार पर यदि भारत और चीन का संघर्ष तेज हो जाता है तो क्या तिब्बत के चीन की गुलामी से मुक्त हो जाने की संभावना भी बनती है, इस प्रश्न पर तिब्बत में तो चर्चा शुरू हुई ही है, भारत में रह रहे तिब्बती भी आशावान दिखाई देते हैं। यद्यपि अभी इन प्रश्नों पर विचार करने का समय नहीं आया है, लेकिन यदि दक्षिण चीन सागर में सचमुच टकराव हो जाता है तो चीन के भीतर ही दरारें पड़ने की संभावना बढ़ती है। वहां भी कम्युनिस्ट तानाशाही के खिलाफ आवाजें तेज होने लगेंगी। लेकिन भारत के लिए तिब्बत के प्रश्न पर भारत के हित में सक्रिय होने के रास्ते कैसे निकल सकते हैं? जो नई वैश्विक व्यवस्था उभर रही है और अपनी विस्तारवादी नीतियों के कारण चीन अकेला पड़ता जा रहा है, उसमें तिब्बत एक बार फिर भारत की विदेश नीति के केंद्र में आ सकता है।

 ईमेलः kuldeepagnihotri@gmail.com

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