आयात कर बढ़ाकर मांग बढ़ाइए: डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक

भरत झुनझुनवाला By: डा. भरत झुनझुनवाला, आर्थिक विश्लेषक Oct 27th, 2020 12:08 am

भरत झुनझुनवाला

आर्थिक विश्लेषक

आयात कर को बढ़ाने में विश्व व्यापार संगठन आड़े नहीं आता है। इसलिए सरकार के पास विकल्प है कि बीते छह वर्षों से लागू की जा रही हानिप्रद नीति का त्याग करे और आयात करों में भारी वृद्धि करे। वर्तमान में जो औसत आयात कर 20 प्रतिशत है, उसको तत्काल दो गुना करके 40 प्रतिशत कर दे। ऐसा करना विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत संभव है। वर्तमान में सरकार को आयात कर से 170 लाख करोड़ रुपए प्रति वर्ष का राजस्व मिल रहा है। आयात कर दो गुना कर देने से आयात की मात्रा में कुछ कमी आएगी, फिर भी मेरा अनुमान है कि सरकार को 150 करोड़ की अतिरिक्त आय हो सकती है। इस रकम से देश के 135 करोड़ नागरिकों को प्रत्येक के खाते में 1100 रुपए अथवा प्रत्येक परिवार के खाते में 5500 रुपए प्रति वर्ष की रकम ट्रांसफर की जा सकती है…

देश की अर्थव्यवस्था लगातार मंद पड़ती जा रही है। जून में तमाम संस्थाओं का आकलन था कि इस वर्ष देश की आय यानी जीडीपी में पांच प्रतिशत की गिरावट आएगी जो वर्तमान आकलन के अनुसार 10 प्रतिशत की गिरावट में तबदील हो गई है। मेरा अनुमान है कि आने वाले समय में गिरावट की दर में और वृद्धि होगी क्योंकि कोरोना का संकट शीघ्र ही दूर होता नहीं दिख रहा है। इस पृष्ठभूमि में सरकार में उत्साह है कि ट्रैक्टर और निजी कारों की बिक्री में इजाफा हो रहा है। विशेषकर ट्रैक्टर की खरीद में पिछले वर्ष की तुलना में गत माह 75 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कार एवं मोटर साइकिल की बिक्री में लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। प्रश्न है कि जब देश की अर्थव्यवस्था में गिरावट आ रही है तो ट्रैक्टर, कार और मोटर साइकिल की खरीद क्योंकर बढ़ रही है?

मेरा आकलन है कि प्रवासी मजदूरों की कमी होने के कारण देश के तमाम किसानों ने मजबूरी में ट्रैक्टर खरीदे हैं। इसी प्रकार सार्वजनिक यातायात जैसे बस और मेट्रो आदि की आवाजाही बंद होने के कारण लोगों ने कार और मोटर साइकिल खरीदी है। यह खरीद खुशहाली में नहीं की गई है। व्यवसायी और किसान के सामने इनकी खरीद के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं था। यह खरीद बीमारी के समय खरीदी गई मसाज करने की मशीन की तरह है। विकट परिस्थिति में की गई खरीद को विकास का जामा नहीं  पहनाना चाहिए। इस परिस्थिति में सरकार ने बैंकों को आदेश दिया है कि वे निवेशकों और उपभोक्ताओं को भारी मात्रा में ऋण दें। निवेशक द्वारा लिए गए ऋण और उपभोक्ता के द्वारा लिए गए ऋण के चरित्र में मौलिक अंतर होता है। निवेशक ऋण लेकर उसका निवेश करता है जैसे वह कारखाना लगाता है अथवा दुकान खोलता है। इन निवेश से निवेशक समेत देश को अतिरिक्त आय होती है जो पूर्व में नहीं हो रही थी। जैसे किसी निवेशक ने बिजली के स्विच बनाने का कारखाना लगाया तो उस स्विच के उत्पादन में निवेशक और देश दोनों को ही अतिरिक्त आय होगी। उस आय से निवेशक ऋण और ब्याज दोनों की अदायगी कर लेता है। इस प्रकार का ऋण लाभप्रद होता है। लेकिन खपत के ऋण का चरित्र बिलकुल अलग होता है। खपत के लिए यदि आज आप ऋण लेते हैं तो उस ऋण पर दिए गए ब्याज से अंततः आपकी खपत कम होती है।

जैसे मान लीजिए आपके पास आज 100 रुपए की आय है और इसमें तत्काल वृद्धि के लिए आपने बैंक से 100 रुपए का ऋण लिया। इस 100 रुपए के ऋण पर आप आने वाले वर्ष में 15 रुपए का ब्याज अदा करेंगे और 15 रुपए मूल ऋण की अदायगी करेंगे। इस प्रकार आने वाले वर्ष में आपके पास खर्च के लिए 100 के स्थान पर केवल 70 रुपए रह जाएंगे। यानी वर्तमान में आपकी खपत 100 रुपए से बढ़कर 200 रुपए अवश्य हो जाएगी, लेकिन आने वाले लंबे समय में वह 100 से घटकर 70 रुपए हो जाएगी। ये ऋण अनुत्पादक होने के कारण नई आय पैदा नहीं करते हैं और अंत में उपभोक्ता पर बोझ बन जाते हैं। वर्तमान समय में जब आम आदमी की आय पहले ही दबाव में है, उसे ऋण लेकर अपने ऊपर ब्याज का अतिरिक्त बोझ नहीं लेना चाहिए। उपभोक्ता को ऋण देकर बाजार में मांग बढ़ाना समस्या का उपाय नहीं है। बाजार में मांग बढ़ाने का दूसरा उपाय है कि सरकार द्वारा कुछ रकम लोगों के खाते में सीधे ट्रांसफर कर दी जाए। सरकार ऋण लेकर यह रकम ट्रांसफर कर सकती है, लेकिन लिए गए ऋण की रकम की भरपाई सरकार को अगले वर्ष टैक्स लगाकर उसी जनता से करनी पड़ेगी। इस प्रकार के ट्रांसफर से केवल तत्काल लाभ होगा, जबकि आने वाले समय में नुकसान होगा, बिलकुल वैसे ही जैसे ऋण लेने से होता है। दूसरा उपाय है कि सरकार नोट छापे। लेकिन यह भी एक प्रकार का अप्रत्यक्ष टैक्स होता है क्योंकि नोट छपने से महंगाई बढ़ती है और पुनः आम आदमी की क्रय शक्ति में गिरावट आती है। अतः सरकार यदि टैक्स लगाकर अथवा नोट छापकर रकम ट्रांसफर करती है तो इससे अल्पकाल में लाभ हो सकता है, लेकिन आने वाले समय में इसका नुकसान होगा। जनता के खाते में सीधे रकम ट्रांसफर करने के लिए आय अर्जित करने का तीसरा उपाय है कि सरकार आयात कर में वृद्धि करे। बीते छह वर्षों में सरकार के राजस्व में आयात कर के हिस्से में भारी गिरावट आई है। पूर्व में सरकार के कुल राजस्व में 18 प्रतिशत आयात कर का होता था। आज यह घटकर 12 प्रतिशत रह  गया है।

अर्थ हुआ कि सरकार ने आयात करों में कटौती करके आयातों को प्रोत्साहन दिया है और राजस्व में हानि बर्दाश्त की है। बताते चलें कि विश्व व्यापार संगठन में हमने आश्वासन दे रखा है कि हम औसत 48 प्रतिशत से अधिक आयात कर नहीं लगाएंगे। लेकिन वर्तमान में हमारे आयात कर 20 प्रतिशत के औसत से भी कम हैं। आयात कर को बढ़ाने में विश्व व्यापार संगठन आड़े नहीं आता है। इसलिए सरकार के पास विकल्प है कि बीते छह वर्षों से लागू की जा रही हानिप्रद नीति का त्याग करे और आयात करों में भारी वृद्धि करे। वर्तमान में जो औसत आयात कर 20 प्रतिशत है, उसको तत्काल दो गुना करके 40 प्रतिशत कर दे। ऐसा करना विश्व व्यापार संगठन के अंतर्गत संभव है। वर्तमान में सरकार को आयात कर से 170 लाख करोड़ रुपए प्रति वर्ष का राजस्व मिल रहा है। आयात कर दो गुना कर देने से आयात की मात्रा में कुछ कमी आएगी, फिर भी मेरा अनुमान है कि सरकार को 150 करोड़ की अतिरिक्त आय हो सकती है।

इस रकम से देश के 135 करोड़ नागरिकों को प्रत्येक के खाते में 1100 रुपए अथवा प्रत्येक परिवार के खाते में 5500 रुपए प्रति वर्ष की रकम ट्रांसफर की जा सकती है। इस रकम से देश की जनता बाजार में माल खरीद सकती है। बाजार में मांग उत्पन्न हो जाएगी। इसके साथ ही आयात करों में वृद्धि होने से देश में अपना उत्पादन बढ़ेगा। लोगों को रोजगार मिलेगा और खपत एवं उत्पादन का सुचक्र पुनः स्थापित हो जाएगा। देशवासियों की निष्ठा स्वदेशी उत्पादों की खपत में बढ़ेगी, साथ ही सरकार की साख भी बढ़ेगी। मेरे आकलन में देश को मंदी से उबारने के लिए सरकार के पास आयात कर की दरों में वृद्धि के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। इस तरह सरकार को अपनी नीति में बदलाव करना चाहिए।

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