कश्मीर में भ्रम फैलाने की कोशिश : कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार

कुलदीप चंद अग्निहोत्री ( वरिष्ठ स्तंभकार ) By: कुलदीप चंद अग्निहोत्री, वरिष्ठ स्तंभकार Oct 17th, 2020 12:10 am

डा. कुलदीप चंद अग्निहोत्री

वरिष्ठ स्तंभकार

अब इन सभी ने मिल कर जम्मू-कश्मीर को पुराने कैदखाने में लाने के लिए पीपुल्स एलायंस बनाया है। बड़ों की बड़ी बातें। बस इतना ही कि इस एलायंस में शेख भी हैं, सैयद भी, चीन भी है और पाकिस्तान भी। नहीं हैं तो कश्मीरी नहीं हैं, दलित नहीं हैं, जम्मू वाले नहीं हैं और लद्दाख वाले तो हो ही नहीं सकते, क्योंकि चीन ने स्पष्ट कह दिया है कि हमारा सारा झगड़ा इसलिए है क्योंकि लद्दाख में अब सड़कें बन रही हैं, पुल बन रहे हैं….

सार्वजनिक रूप से यह घोषणा करने के बाद कि भारतीय संविधान में अनुच्छेद 370 की दोबारा बहाली चीन की सहायता से की जाएगी, अब्दुल्ला परिवार और सैयद परिवार अपनी-अपनी पार्टियों नेशनल कान्फ्रेंस व पीडीपी के झंडे तले एकत्रित हुए। अब्दुल्ला परिवार के सदस्यों में पिछले कुछ दशकों से पारिवारिक खटखट चल रही है, इसलिए परिवार ने एक दूसरी पार्टी अवामी नेशनल कान्फ्रेंस के नाम से भी पंजीकृत करवा रखी है। संकट की इस घड़ी में वह भी इस पारिवारिक मिलन कार्यक्रम में हाजिर थी। सोशल डिस्टैंसिंग के कारण थोड़ा दूर बैठ कर  तीन और नुमाइंदे भी इस चर्चा में शिरकत कर रहे थे। एक नुमाइंदे सीपीएम के थे, दूसरे पीपुल्स कान्फ्रेंस के सज्जाद गनी लोन और जेके पीपुल्स मूवमेंट के जावेद मीर भी हाजिर थे। ये सब महानुभाव अब्दुल्ला के घर में बैठ कर ही आगे की रणनीति बना रहे थे। मकसद स्पष्ट कर ही दिया गया था। संघीय संविधान में अनुच्छेद 370 को दोबारा फिट करना। लेकिन कश्मीर घाटी के इन छह दलों ने इतना ध्यान जरूर रखा कि इनमें जम्मू या लद्दाख का कोई प्रतिनिधि या राजनीतिक दल घुस न पाए। वैसे अब्दुल्ला परिवार और सैयद परिवार ने यह रणनीति शुरू से ही घोषित कर रखी है कि जम्मू और लद्दाख की ओर से बोलने का अधिकार उनके पास सुरक्षित है। आखिर ये गंभीर चर्चाएं हैं। जम्मू या लद्दाख के लोग इस प्रकार की चर्चाओं में क्या करेंगे? उनका काम केवल कश्मीर वालों द्वारा दिखाए गए रास्ते पर चलना भर है। वैसे इस कान्फ्रेंस में जम्मू-कश्मीर के गुज्जरों का भी कोई प्रतिनिधि नहीं था। गुज्जरों का नाम सुनते ही कश्मीरी नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। क्या जमाना आ गया है कि अब एक कश्मीरी को गुज्जरों से भी बात करनी पड़ेगी। वैसे इस पारिवारिक मिलन जमावड़े में कोई ऐसा सज्जन नहीं दिखाई दिया जिसके नाम के पीछे शेख लगा हो।

जिस कश्मीरी के नाम के पीछे शेख लगता है, वह दलित समाज का हिस्सा होता है। जो नाम के आगे शेख लिखता है, वह ब्राह्मण होता है। यह जमावड़ा शेखों और सैयदों का था या फिर लोन समाज के क्षत्रिय इसमें बैठे थे। दलितों, हांजियों, गुज्जरों, सोफियों, दर्जी, नानबाइयों और अन्य पिछड़ी जातियों का कोई प्रतिनिधि नाम के लिए भी इस जमावड़े में नहीं बुलाया गया था। बड़े लोगों की बड़ी बातें। जब बैठक में सैयद लोग आ गए हैं तो बाकी तो उनकी छाया में ही रहेंगे। सैयद समुदाय कश्मीरियों को यह एहसास समय-समय पर करवाता रहता है। शेख अब्दुल्ला परिवार का दुर्भाग्य है कि वह कश्मीरियों का साथ छोड़ कर सत्ता प्राप्ति के लालच में एसटीएम यानी सैयद, तुर्क और मुगल मंगोल की झोली में जा बैठा है। वैसे तो इस परिवार ने यह काम शेख साहिब के समय में ही शुरू कर दिया था। वह  अमरीका के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर को आजाद मुल्क बनाना चाहते थे। उस समय कश्मीरियों को इसकी भनक लग गई और सरकार ने शेख साहिब को सुपुर्दे जि़न्दान कर दिया। उसके बाद शेख साहिब खुल कर एसटीएम के चरणों में जा बैठे। रायशुमारी मुहाज, जमायते इस्लामी और न जाने कितने रूप धार-धार कर एसटीएम, मुफ्ती, पीरजादेह शेख साहिब के अंग-संग नाचते रहे। एसटीएम को शेख परिवार को आगे रखने का एक लाभ रहता ही था कि कश्मीरियों का सारा गुस्सा शेख परिवार पर निकलता था और लाभ एसटीएम को होता था।

पंजाबी में एक कहावत है ‘खान पीन नूं बांदरी डंडे खान नूं रीछ।’ लेकिन जब सैयदों ने देखा कि अब इस रीछ में दमखम नहीं बचा है और कश्मीरियों की नजर में यह बेकार हो चुका है तो वे पीडीपी के रूप में खुद ही आगे आ गए। लेकिन आगे चाहे बांदरी हो या रीछ, कश्मीरियों के हिस्से तो शोषण और दमन ही लिखा था। अनुच्छेद 370 के कारण न तो बांदरी को हाथ लगाया जा सकता था और न ही रीछ को पकड़ा जा सकता था। आम कश्मीरी को इस बांदरी और रीछ की कहानी से मुक्ति कैसे मिले? जिस दिन नरेंद्र मोदी की सरकार ने अनुच्छेद 370 की दीवार तोड़ कर आम कश्मीरी को राहत दी, उसी दिन इन बड़े लोगों के पारिवारिक क्लब में तहलका मच गया। यह तहलका चीन और पाकिस्तान में भी मचा। अब अब्दुल्ला परिवार और सैयद परिवार को लगता है कि पाकिस्तान के भरोसे ज्यादा देर नहीं बैठा जा सकता। पाकिस्तान हथियार और आतंकवादी ही भेज सकता है और वह तो वह निरंतर भेज ही रहा है।

उसका उत्तर सुरक्षा बल और पुलिस दे देती है। लेकिन पाकिस्तान तो अब खुद ही चीन के सहारे रेंग रहा है तो सीधा चीन से ही क्यों न संपर्क साध लिया जाए। गुपकार रोड पर मीटिंग बुलाने से पहले फारूक अब्दुल्ला दो बातें स्पष्ट कर ही चुके थे। पहली तो यह कि कश्मीरी भारत के साथ रहने की बजाय चीन के साथ रहना ज्यादा पसंद करेंगे। दूसरा यह कि चीन की सहायता से  अनुच्छेद 370 को बहाल करवाया जाएगा। अब यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि अपने घर में बड़ों की इस बैठक में अब्दुल्ला परिवार ने चीन के साथ हुई इस सारी डिवेलपमेंट का खुलासा किया या नहीं। इस जमावड़े में सीपीएम के तारगामी भी हाजिर थे, इसलिए चीन के साथ हुई बातचीत का खुलासा न हुआ हो, ऐसा माना नहीं जा सकता। वैसे इस बड़ों के क्लब की बैठक में सोनिया कांग्रेस के अध्यक्ष गुलाम अहमद मीर भी शामिल होने वाले थे।

सोनिया कांग्रेस ने तो चीन के साथ पारस्परिक हितों को लेकर बाकायदा एक एमओयू कर रखा है। इसलिए वे बेहतर तरीके से चीन की आगामी भूमिका पर प्रकाश डाल सकते थे, लेकिन उन्होंने अब्दुल्ला परिवार को सूचित कर दिया था कि मैं चीनी वायरस का टेस्ट करवा रहा हूं, इसलिए आ नहीं पाऊंगा। अलबत्ता गुपकार घोषणा में तो सोनिया कांग्रेस थी ही। अब इन सभी ने मिल कर जम्मू-कश्मीर को पुराने कैदखाने में लाने के लिए पीपुल्स एलायंस बनाया है। बड़ों की बड़ी बातें। बस इतना ही कि इस एलायंस में शेख भी हैं, सैयद भी, चीन भी है और पाकिस्तान भी। नहीं हैं तो कश्मीरी नहीं हैं, दलित नहीं हैं, जम्मू वाले नहीं हैं और लद्दाख वाले तो हो ही नहीं सकते, क्योंकि चीन ने स्पष्ट कह दिया है कि हमारा सारा झगड़ा इसलिए है क्योंकि लद्दाख में अब सड़कें बन रही हैं, पुल बन रहे हैं, रेल लाने की तैयारियां हो रही हैं। वे दिन कितने अच्छे थे जब  अनुच्छेद 370 था, लद्दाख जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, शेखों और सैयदों का राज था। लद्दाख में सड़क के लिए एक पत्थर तक नहीं लगता था, पुल तो बहुत दूर की बात थी। इसलिए यदि गुपकार में हो रही बैठक में लद्दाख  को बुला लिया जाता तो चीन नाराज न हो जाता? लगे रहो फारूक अब्दुल्ला एमबीबीएस। लेकिन आप कश्मीरी भाषा भूल कर इतनी जल्दी चीनी भाषा सीख लेंगे, इसका अंदाजा न था।

 ईमेलःkuldeepagnihotri@gmail.com

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